क्रांतिकारियों की भूमि बलिया के रेलवे स्टेशनों की दुर्दशा

क्रांतिकारियों की भूमि बलिया के रेलवे स्टेशनों की दुर्दशा

 

बलिया :

आजादी के 70 साल बीत जाने के बाद भी बागियों का जिला,अंग्रेजों को धूल चटाने वाला क्रांतिकारियों का जिला जहां बच्चा बच्चा अपने आप में क्रांतिकारी है.वहां के कई ऐसे रेलवे स्टेशन आज भी अंधेरे के साए में अपने 70 साल पुरानी याद संजोए ट्रेनों का इंतजार करते नजर आते हैं.

जहां प्लेटफॉर्म पर कुछ पल के लिए जनरेटर चलाकर ट्रेनों को क्रॉस कराया जाता है.जहां के लाखों यात्री असुविधा होने के बावजूद भी टकटकी लगाए,चोर उचक्के से सहमे,अपने सूटकेस बैग जैसे सामान को मजबूत हाथों से पकड़े हुए,

घंटों इंतजार में रेलवे स्टेशनों के वही पुरानी प्रतिक्षालय सैड के नीचे,लगी कुर्सियों पर बैठे किसी भी तरीके से अपने मंजिल तक सुरक्षित पहुंचने की दुआएं भगवान से मांगते हैं.

हम बात कर रहे हैं जिला बलिया के  सुरेमन पुर,दलछपरा,रेवती, सहतवार,छाता,बांसडीहां, सागरपाली,फेफना,चितबड़ागांव जैसे रेलवे के लोकल स्टेशनों की,जहां कई दशक बीत जाने के बाद भी रेलवे प्रशासन का ध्यान इन स्टेशनों पर नहीं है.वही पुरानी प्लेटफॉर्म,ऊपर प्रतीक्षालय के रूप में टीनशेड,

यात्रियों को बैठने के लिए पुराने टाइप के कुर्सियों का, रात्रि में बिजली का,महिला शौचालय,पानी,गंदगी, साफ सफाई, जानवरों का जमावड़ा, इंटरनेट की असुविधा जैसे तमाम बेइंतजाम्मी इन स्टेशनों का दौरा कर देखा जा सकता है.आजादी के 70 साल बाद भी विकास का ढिंढोरा पीटने वाले नेता और रेलवे प्रशासन को कौन समझाए कि इतना बदतर विकास का लड्डू बागी बलिया के लोग ना जाने कितने सालों से चख रहे हैं. 

देश की टॉप नेतृत्व की क्षमता रखने वाला जिला की बदहाली

हिंदुस्तान की धरती पर सबसे पहला जिला,अपने देश की आजादी से 5 साल पहले1942 में आजाद घोषित करने वाला बलिया, देश की टॉप नेतृत्व की क्षमता रखने वाला जिला,जितनी भी सरकारें आई उनके टॉप लीडर्स इन्हीं क्षेत्रों से संबंधित होने के बावजूद भी जिले के रेलवे स्टेशनों का यह दुर्दशा देखने को मिल रहा है,जिले से अन्य जिले में,

अलग-अलग प्रांतों के स्टेशनों पर पूर्वांचल से राजधानी की ओर जाने वाली ट्रेनों में सबसे ज्यादा यात्री इस जिले के होते हैं. इसका मुख्य कारण जिला में कल कारखानों का ना होना और जीविकोपार्जन के लिए प्रतिदिन हजारों की संख्या में युवाओं का यहां से अन्य राज्यों में पलायन करना,इसके साथ हर तीसरा और चौथा व्यक्ति सेना या पुलिस में भर्ती हो चुका है जिसकी वजह से भी उनके परिवारवालों का वहां से आना जाना निरंतर लगा रहता है.

इन सभी बातों को सरकार और रेलवे प्रशासन भली-भांति जानते हुए भी पिछले कई सालों से नेताओं के लिए मुद्दा बनाए हुए हैं. प्रधानमंत्री की भूमि  से लेकर सुबे के कैबिनेट मंत्रियों का पैतृक निवास नेता प्रतिपक्ष का जन्म स्थान बहुत सारे दिग्गज जो उत्तर प्रदेश के शासन और सत्ता से जुड़े हुए हैं फिर भी बलिया के रेलवे स्टेशनों का यह दुर्दशा है तो अन्य जिलों का क्या हाल होता होगा इसका अंदाजा आप खुद भी लगा सकते हैं.  

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