पर्यावरण का कैंसर बने है मानक विहीन ईट भट्ठे और किसान की पराली’ जलाने से हवा में ‘फैलता जहर’

पर्यावरण का कैंसर बने है मानक विहीन ईट भट्ठे और किसान की पराली’  जलाने से हवा में ‘फैलता जहर’


राजधानी लखनऊ 
स्वतंत्र प्रभात की खास रिपोर्ट 


अवैध ईंट भट्‌ठों पर विभाग की हिला हवाली 

क्षेत्र में चल रहे मानक विहीन ईट भट्‌ठे

जिला संवाददाता नरेश गुप्ता की रिपोर्ट

अटरिया, सिधौली ,सीतापुर -

 (स्वतंत्र प्रभात)

मानक विहीन संचालित हो रहे ईंट भट्ठा के खिलाफ कार्रवाई नहीं होने से अवैध ईट भट्‌ठों की संख्या बढ़ती जा.अवैध ईंट भट्‌ठों पर विभाग की नजर नहीं सीतापुर के सिधौली अटरिया
क्षेत्र में मानक विहीन ईट भट्‌ठे चल रहे हैं। इन लोगों के खिलाफ कार्रवाई नहीं होने से अवैध ईट भट्‌ठों की संख्या बढ़ती जा रही है

क्षेत्र में मानकों की धज्जियां उड़ा रहे अनगिनत ईट भट्‌ठे चल रहे हैं। इन लोगों के खिलाफ कार्रवाई ना होने से अवैध ईट भट्‌ठों की संख्या बढ़ती जा रही है। इससे पर्यावरण तो प्रदूषित हो रही रहा है। साथ ही राजस्व को होने वाले आय का भी नुकसान हो रहा है।



किसी अन्य विभाग की तो बात छोड़िए खनिज विभाग ने भी कोई ठोस कार्रवाई नहीं की। हालांकि कुछ स्थानों में कागजी कार्रवाई करते अवैध वसूली कर खानापूर्ति की जा रही है। इससे ईंट भट्‌ठा संचालकों के हौसले इतने बुलंद हो गए हैं ये लोग बड़े पैमाने पर ईट का निर्माण कर शासकीय व निजी जमीन के खनन करने में लगे हुए हैं। उत्तर प्रदेश के जनपद सीतापुर कमलापुर सिधौली अटरिया ही नहीं ग्रामीण स्थानों पर ऐसे ईट भट्ठे संचालित किए जा रहे हैं

जिनका मानक से दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं है । इसके बाद भी कार्रवाई नहीं हो रही है। रायल्टी छूट कुम्हार को आबादी, वनक्षेत्र निस्तार स्थल, पाठशाला, सड़क, शासकीय भवन से तय दूरी पर ईट भट्ठा संचालित करना है। खनिज विभाग के अधिकारियों द्वारा प्रकरण तैयार कर कार्रवाई न करना शासकीय आर्थिक क्षति को दर्शाता है। इन अवैध ईट भट्‌टों के संचालकों से मिलीभगत कर कागजी कार्रवाई करने की खानापूर्ति की जा रही है।



इतना ही नहीं उत्खनन व परिवहन पर नियंत्रण ए‌वं रोक के लिए सरपंच, पंचायत विभाग के पदाधिकारियों को भी खनिज मैनुअल के नियमों को भी ताख पर रख छोड़ा है।

नियमों का भट्ठा बैठा रहे ईंट-भट्ठा वाले

वायु को प्रदूषित करने और जमीन की उर्वरा शक्ति को कम करने में ईंट भट्ठे महती भूमिका निभा रहे हैं। भट्ठा प्रदूषण न फैलाए, इसके लिए इनके संचालन का नियम काफी सख्त रखा गया है। उत्तर प्रदेश में इस समय अधिकांश भट्टे मानक विहीन तरीके से संचालित किए जा रहे है इलाहाबाद उच्च न्यायालय व नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने बगैर पर्यावरण सर्टिफिकेट के ईंट-भट्ठों के संचालन पर रोक लगा रखी है। सख्ती के बावजूद ईंट-भट्ठा संचालक न पर्यावरण की चिन्ता कर रहे हैं और न ही सामाजिक सरोकार का निर्वहन। पेश है

ईंट-भट्ठा चलाने के नियम

आबादी से 200 मीटर दूर होना चाहिए भट्ठा
मिट्टी खनन के लिए खनन विभाग की अनुमति जरूरी
लोहे के बजाय सीमेंट की होनी चाहिए चिमनी
पर्यावरण लाइसेंस व प्रदूषण विभाग से एनओसी जारी होनी चाहिए
ईंट-भट्ठा चलाने के लिए जिला पंचायत, प्रदूषण विभाग और पर्यावरण विभाग की अनुमति लेना जरूरी
तय है प्रदूषण का मानक


एक ईंट-भट्ठे से सामान्यत: 750 एसएमपी तक प्रदूषण होता है। इसको कम करने की कवायद जारी है। नई टेक्नोलॉजी से प्रदूषण को कम करने का प्रयास किया जा रहा है। लगातार बढ़ रहे प्रदूषण को कम करने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने एनसीआर में स्थित सभी ईंट-भट्ठों को नई टेक्नोलॉजी से हाई ड्राफ्ट बनाने के निर्देश दिए थे। इनमें कोयले से पका कर ईंट बनाई जाती हैं, जिससे सफेद धुआं आसमान में जाएगा और हाई ड्राफ्ट फैन कोयले की राख बनाएगा। इस विधि से भट्ठा लगाने से हवा में केवल 250 एसएमपी तक प्रदूषण रह जाएगा

 

ईंट-भट्ठों के आधुनिकीकरण की मुहिम

ईंट-भट्ठों के माध्यम से कम से कम प्रदूषण फैले, इसको ध्यान में रखकर उनके आधुनिकीकरण की मुहिम शुरू की गई है। एनजीटी के आदेश के बाद यह कदम उठाया गया है। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा जारी निर्देशों में कहा गया है कि सभी ईंट-भट्ठा संचालक अपने भट्ठों को नेचुरल ड्राट से इन्डयूज्ड ड्राट क्लीन में परिवर्तित करें।

ईंट-भट्ठों को जिगजैग विधि में परिवर्तित कराने को कहा गया है। इस विधि से ईंट भट्ठे से निकलने वाली राख वातावरण में नहीं फैलती है, जिसके कारण प्रदूषण कम होता है। नियमानुसार सिस्टम अपग्रेड न करने पर बोर्ड और जिला प्रशासन द्वारा ईंट-भट्ठों को बंद किया जा सकता है। इसके अलावा ईंट निर्माण के लिए मिट्टी खनन करने से पहले भी अनुमति लेनी होगी। इस अनुमति के बाद बोर्ड से जल और वायु की सहमति प्राप्त करनी होगी। एनओसी लेने के बाद ही ईंट-भट्ठे का संचालन किया जा सकता है।



कौन कर सकता है कार्रवाई

-नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल
नगर निगम
-विकास प्राधिकरण
-प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड
-जिला प्रशासन



एक ईंट-भट्ठे से सामान्यत: 750 एसएमपी तक प्रदूषण होता है। इसको कम करने की कवायद जारी है। नई टेक्नोलॉजी से प्रदूषण को कम करने का प्रयास किया जा रहा है। लगातार बढ़ रहे प्रदूषण को कम करने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने एनसीआर में स्थित सभी ईंट-भट्ठों को नई टेक्नोलॉजी से हाई ड्राफ्ट बनाने के निर्देश दिए थे।

इनमें कोयले से पका कर ईंट बनाई जाती हैं, जिससे सफेद धुआं आसमान में जाएगा और हाई ड्राफ्ट फैन कोयले की राख बनाएगा। इस विधि से भट्ठा लगाने से हवा में केवल 250 एसएमपी तक प्रदूषण रह जाएगा


 
खसरे में दर्ज होगा पराली जलाने का मुकदमा

पराली जलाने के मुकदमे से किसान आसानी से पार नहीं पा सकेंगे। इसका उल्लेख राजस्व अभिलेख खसरे में भी दर्ज किया जाएगा। इसकी प्रक्रिया शुरू कर दी गई है।
पराली (फसल अवशेष) जलाने से होने वाले होने वाले प्रदूषण पर नेशनल ग्रीन ट्रिब्युनल (एनजीटी) और सुप्रीम कोर्ट का रुख सख्त है। इस पर अंकुश लगाने के लिए प्रशासन भी सख्ती बरत रहा है। धड़ाधड़ नोटिस जारी किए जा रहे हैं। नोटिस के बाद भी पराली जलाने वाले किसानों पर सीधी एफआईआर दर्ज कराई जा रही है। अब तक बहुत से किसानों पर कार्रवाई की जा चुकी है।

लेकिन, अब किसानों पर दर्ज हुए मुकदमे का ब्योरा उनके खसरे में भी दर्ज किया जाएगा। मुकदमा जारी रहने तक ये खसरे में दर्ज बना रहेगा। मुकदमा समाप्त होने पर ही ये खसरे से हटेगा। भविष्य में ये किसानों के लिए मुश्किल खड़ी कर सकता है। चुनाव लड़ने या अन्य किसी सरकारी योजना का लाभ लेने में ये आड़े आ सकता है।


किसान पराली न जलाएं, इसके लिए उन्हें लगातार जागरूक किया जा रहा है। उन्हें पराली जलाने के अलावा खेत से फसलों के अवशेष हटाने के अन्य विकल्प भी बताए जा रहे हैं। इसका असर भी हुआ है। बावजूद, कई किसान अब भी पराली जला रहे हैं। उनके खिलाफ कार्रवाई की जा रही है। उप जिलाधिकारी, तहसीलदार और पुलिस क्षेत्राधिकारियों को निर्देश दिए गए हैं कि भ्रमणशील रहकर इस पर नजर रखें।


सरकार ने ही पराली जलाना सिखाया और अब वही अर्थदंड लगा रही है

यानि जिस तरह सरकारों ने 90 के दशक में बिना सोचे पराली जलाना किसानों को सिखाया, उसी तरह अब यह आदेश करना कि पराली जलाने वाले किसान परअर्थदंड लगाया जायेगा कहां तक सही है? इससे पता चलता है कि सरकारें इस गंभीर मुद्दे के प्रति बिलकुल उदासीन है, वरना किसानों की आर्थिक मदद की जाए, साथ ही पराली के निस्तारण के लिए किसानों से सलाह लेकर एक ठोस नीति बनाई जाए।



कुछ सालों पहले तक खेतों में काम करने वाले मजदूर अनाज या धान लेकर काम करते थे। आज किसानों को मजदूरी का भुगतान नकदी में करनी पड़ती है। इसी कारण अब किसान सोचते हैं कि पांच सौ से सात सौ रुपये में मज़दूरों को लाकर कई दिनों तक खेत साफ करने से बेहतर है कि अर्थदंड ही चुका देंगे, वह भी तब यदि कोई सरकारी कार्यवाही होगी।

कैसे निकलेगा समाधान?

अब इसका समाधान यह है कि सरकार और किसान को तालमेल बैठाना होगा,किसानों के दिमाग से यह बात निकालनी होगी कि पराली जलाने से फसल को नुकसान पहुंचाने वाले कीट मर जाते हैं और खेत की उपजाऊ शक्ति बढ़ जाती है।उन्हें यह बताना होगा कि इससे खेत में फसल को लाभ पहुंचाने वाले कीट और केंचुए भी मर जाते हैं।साथ ही खेत की नमी कम हो जाती है।इसके लिए किसानों को जागरूक करने के साथ कृषि वैज्ञानिकों को भी पराली के उपयोग का समाधान खाद बनाकर या इससे बिजली बनाकर या इसके अन्य सकारात्मक प्रयोग पर शोध करना होगा।

वरना हर वर्ष दस पांच दिन किसानों को कोसने का एक रिवाज़ सा बन जाएगा, उस किसान को, जिसके उगाये अन्न की बदौलत हम दिन रात मेहनत करते हैं।

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