मुहीम : स्वतंत्र प्रभात की टीम ने प्रदेश की राजधानी लखनऊ के स्वास्थ्य केन्द्रों का किया निरिंक्षण तो पायी ये खामियां

 

संवाददाता हर्षित मिश्रा की खास ​पेशकस

स्वतंत्र प्रभात की टीम ने लोगों को स्वास्थय को लेकर चलाई मुहीम

क्या डॉक्टरों की कमी से जूझ रहे प्रदेश (और देश) के सामने इस बीमारी का कोई इलाज नहीं है? 
क्या उत्तर प्रदेश में पूरे हुए वादे और नए इरादों के पीछे का सच पुराना ही रहेगा?
क्या सरकारी अस्पताल ऐसे ही भीड़, धक्कामुक्की, बदइंतजामी, डॉक्टरों और कर्मचारियों के खराब रवैये, बेड की कमी, दवाओं की कमी, दवाओं की कालाबाजारी जारी रहेगी?

लखनऊ। ऐसी घटनाएं देश के हर राज्य और हर शहर में होती होंगी, लेकिन चूंकि उत्तर प्रदेश के निवासी आजकल रोज ही किसी न किसी अखबार या टीवी चैनल पर प्रदेश सरकार द्वारा राज्य के विकास के लिए किए गए (या किए जा रहे) काम का बखान देख रहे हैं, इसलिए यह संशय होना स्वाभाविक है कि आखिर सच क्या है। 

सरकार ने गरीबों के इलाज के लिए सभी सरकारी अस्पताल में दवा सहित अन्य प्रकार की सुविधा उपलब्ध कराती है लेकिन कई दिनों से सदर अस्पताल में कई तरह की दवा नहीं मिलने के कारण उन लोगों को बाजार से दवा की खरीद करनी पड़ रही है।

जी हां वहीं आपको बता दें कि डॉक्टरों है कि मरीज का मर्ज दूर करने के बजाये मोटी मलाई काट जेब को गरम करने में तुले हुऐ है और कर्मचरियों की मनमानी इस कदर की मूलसुविधाये जैसे बेड, दवाओं व अन्य सामानों की कमी के साथ-साथ सरकारी तंत्र की संवेदनहीनता का सबसे बड़ा उदाहरण भी सरकारी अस्पतालों में ही दीखता है।

ये हाल है, राजधानी लखनऊ के सरकारी अस्पतालों या चिकित्सा केंद्रों का वाह

सिविल हास्पिटल
बता दे कि स्वंतत्र प्रभात की टीम ने मंगलवार सरकारी अस्पतालों में मरीजों का हाल जानने के लिए अस्पताल आये मरीज व तीमारदारों से वार्ता की तो उन्होंने बताया की लगभग दो माह से अस्पताल में कफ सिरफ मौजूद नहीं है। मरीजों ने बताया कि डाक्टर द्वारा तो कई प्रकार की दवा पर्चा पर लिखा जाता है लेकिन दवा काउंटर पर जाने पर पता चलता है कि बुखार तक की दवा मरीजों को बाजार जाना पड़ता है।

भाऊरावदेवरस
जो मरीज बाहर नहीं ले जाये जा सकते थे उन्हें वार्ड में ही हाथ के पंखों से हवा करके तीमारदारों ने किसी तरह संभाला। इतना ही नहीं इस दौरान लोग बूंद-बूंद पानी तक के लिये तरस गए। उधर, अफसरों की गैरजिम्मेदारी का आलम यह रहा कि इस दौरान किसी ने भी मरीजों और तीमारदारों की सुध नही ली। चिलचिलाती धूप ने लोगों को झुलसा कर रख दिया है। गर्मी की मार से मरीज भी अचानक बढ गए है। जिला अस्पताल में तो एक-एक बेड पर कई-कई मरीज लेटे हुए हैं।

लोकबंधु राजनारायण अस्पताल

लोकबंधु राजनारायण अस्पताल अस्पताल में सीसीटीवी कैमरे वैसी जगहों पर लगे हैं जहां से न तो चारों को और न ही असामाजिक तत्वों पर नजर रखी जा सकती है। बावजूद इसके आलम ये है कि, आईसीयू जैसे वार्ड में मरीजों के साथ उनके तीमतदारों को रहने दिया जाता है। जबकि वहां उनकी मरीजों की सेवा की पूरी जिम्मेदारी नर्सों पर होती है। सुरक्षा के नाम पर यहां कुछ भी नहीं है।

जी हां बता दें कि, यह है लोकबंधु राजनारायण अस्पताल सरकारी का जाहं कि अस्पताल में महिलाओं के वार्ड में दिन क्या रात में भी पुरुष आकर सोते हैं। महिला कक्ष में बेड पर सोए पुरुषों को कोई टोकने तक नहीं आता। लोकबंधु अस्पताल में हर दूसरे दिन एक मोबाइल फोन की चोरी होती है। चार्ज में लगा मोबाइल फोन छोड़कर जाना खतरे से खाली नहीं है। एक-एक मरीज के साथ चार-चार लोग एक ही वार्ड में रहते हैं।

क्या सरकारी अस्पताल ऐसे ही भीड़, धक्कामुक्की, बदइंतजामी, डॉक्टरों और कर्मचारियों के खराब रवैये, बेड की कमी, दवाओं की कमी, दवाओं की कालाबाजारी, समय से इस्तेमाल में न लाए जाने के कारण दवाओं और उपकरणों के बर्बाद हो जाने की खबरों के कारण चर्चा में रहेंगे?  

हालाकि सरकारी अस्पतालों मे भीड़ होना, बेड और स्ट्रेचर की कमी होना और डॉक्टर व अन्य कर्मचारियों, नर्स, तकनीशियन आदि की कमी होना आम बात है, लेकिन आज भी प्रदेश के अधिकतर लोगों के लिए सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं के अलावा कोई चारा भी तो नहीं जाएं भी तो कहां। 

वहीं आलम तो ये है कि आय दिन उनके कमरों में उनके परिचित, अधिकारी, निजी रिश्तेदार या दोस्तों की भीड़ रहती है जिनके इलाज के लिए फोन और पर्ची का इस्तेमाल होता है। इसी तरह पैरा-मेडिकल स्टाफ, वार्ड ब्वाय और लैब तकनीशियन भी अपने लोगों के लिए जुगाड़ में ही लगे ज्यादा दीखते हैं।

इसका सबसे ताजा उदाहारण चंद दिन पहले कानपुर का ऐसा मामला सामने आया था जहां एक जगह से दूसरी जगह भेजे जाने में हुई देर के कारण उसके बेटे की मौत हो गई थी। वहीं आलम ये है कि, जो घटनाएं चर्चा में आ गई उस मामले को संज्ञान में आते ही लेकर तत्काल विलम्ब न करते हुए आऐ मरीज को समस्या से निजात दिला दिया जाता है।

फिर क्या देश के हर राज्य और हर शहर में उन डॉक्टरों की वाह—वाही लूटते है लेकिन ऐसी में कहीं न कहीं गलत हम मीडिया वाले भी है जो उत्तर प्रदेश के निवासी आजकल रोज ही किसी न किसी अखबार या टीवी चैनल पर प्रदेश सरकार द्वारा राज्य के विकास के लिए किए गए (या किए जा रहे) काम का बखान देख रहे हैं। ऐसा नहीं की बात सिर्फ चिकित्सा सरकारी महकमे की हो ये आज की तरीख में ये हाल हल सरकारी विभागों का है, कोई विभाग दूध का धूला नहीं है।

छोटे-बड़े शहरों और कस्बों में हर गली में खुले हैं निजी अस्पताल 

निजी अस्पताल और तथा कथित नर्सिंग होम और मेडिकल रिसर्च सेंटर हर छोटे-बड़े शहरों और कस्बों में हर गली में खुले हैं लेकिन वहां न डॉक्टर हैं न स्टाफ, और किसी भी मरीज की हालत जरा भी बिगड़ने पर वे उन्हें नजदीक के सरकारी अस्पताल में ही भेजने की सलाह देते हैं.

निजी अस्पताल और तथा कथित नर्सिंग होम...
सरकारी अस्पतालों के वेतन आयोग की सिफारिशों के अनुरूप हर कुछ साल में वेतन बढ़ोतरी, मनचाही पोस्टिंग पर सालों साल बने रहने की सुविधा, यदि प्रशासनिक पद पर हों तो सामान और दवाओं की खरीदारी, अधीनस्थ कर्मचारियों की नियुक्ति, तबादला और प्रोन्नति का अधिकार, राजनीतिक दलों के नेताओं और सरकार के अधिकारियों से नजदीकी बढ़ाने के मौके भी उन्हीं को मिलते हैं।

वर्तमान सरकार ने पिछले चार सालों में केंद्रीय और प्रादेशिक योजनाओं को...

वर्तमान सरकार ने पिछले चार सालों में केंद्रीय और प्रादेशिक योजनाओं को मिलाकर एक वृहद एम्बुलेंस स्कीम शुरू की, सरकारी अस्पतालों में मुफ्त इलाज, ऑपरेशन और जांच के अलावा मुफ्त दवा देने का ऐलान किया। 

अस्पतालों में बेड, सामान और दवाओं की पड़ी है, भारी कमी

इसके साथ ही प्रदेश के मेडिकल कॉलेजों में एमबीबीएस की सीटें भी बढ़ाईं. बावजूद इसके साथ ही पिछले साल घोषित किए गए स्वास्थ्य बजट का बड़ा हिस्सा खर्च न किए जाने के कारण सभी अस्पतालों में बेड, सामान और दवाओं की भारी कमी है।

कई अस्पताल और चिकित्सा केंद्र प्राथमिक और सामुदायिक पड़े हैं बंद

सरकार के सूत्रों का मानना है कि कई अस्पताल और चिकित्सा केंद्र (प्राथमिक और सामुदायिक) बंद पड़े हैं क्योंकि वहां काम करने वाले लोग और सामान नहीं है। सरकारी अस्पतालों में काम कर रहे डॉक्टरों का कहना है कि कर्मचारी काम नहीं करते, और कर्मचारियों का आरोप है कि डॉक्टर मरीज देखने के बजाय निजी काम करते हैं। दोनों ही वर्गों को अपने-अपने काम और उसके बदले मे मिलने वाले वेतन और भत्तों से असंतोष है और वे जितना मिल रहा है उससे कहीं ज्यादा चाहते हैं.

यह कोई रहस्योद्घाटन नहीं है कि बड़े शहरों और जिला मुख्यालयों पर स्थित जिला अस्पतालों में चिकित्सा अधीक्षक की नियुक्ति राजनीतिक सिफारिश से होती है और उन्हें हटाना आम तौर पर आसान नहीं होता। उनमें से अधिकतर को अपने अस्पताल ठीक से चलाने के बजाय अपने पद को बनाए रखने की चिंता सर्वोपरि होती है। 

ऐसे में यदि कोई मरीज आए तो उसके लिए या तो इमरजेंसी में जगह होनी चाहिए या उसे ओपीडी में देखा जाना चाहिए। चूंकि इमरजेंसी में आकस्मिक चिकित्सा के लिए आए मरीजों के लिए बाद में सम्बंधित वार्ड में जगह नहीं होती, इसलिए वे इमरजेंसी में ही रहते हैं। तो अब नए आए मरीज को इंतजार करने या वापस भेजे जाने के अलावा कोई चारा है?

सरकार के पास काम न करने वालों पर कार्रवाई करने का विकल्प नहीं है क्यों

यही हाल छोटे अस्पतालों या चिकित्सा केंद्रों का भी है। जी हां सच तो यही है कि ऐसे सभी पद राजनीतिक कारणों से भरे जाते हैं और शायद भ्रष्टाचार भी एक कारण हो सकता है, इसलिए इन पदों पर बैठे लोग अपने काम करने मे रुचि न दिखाकर दोष किसी और पर या किसी और स्थिति पर डालने की फिराक में रहते हैं।

सरकार के पास काम न करने वालों पर कार्रवाई करने का विकल्प नहीं है क्योंकि डॉक्टरों और अन्य स्टाफ की कमी के कारण यदि सख्ती की जाती है तो जो अभी काम कर रहें हैं उनके भी छोड़कर चले जाने का डर है।

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