रामलीलाः देश-दुनियां में सबसे अधिक मंचित होने वाला लोकनाट्य

रामलीलाः देश-दुनियां में सबसे अधिक मंचित होने वाला लोकनाट्य

                                              
 डॉ.दीपकुमार शुक्ल (स्वतन्त्र टिप्पणीकार)

रामलीला भारतवर्ष का एक ऐसा लोकनाट्य है, जिसके सबसे अधिक मंचन होते हैं। वह भी विभिन्न भाषाओँ में। सम्भवता यह पहला लोकनाट्य होगा जो देश की सीमाओं को लांघकर विदेशों में भी भलीभांति पुष्पित और पल्लवित है।

इंडोनेशिया और मलेशिया जैसे मुस्लिम देशों में तथा थाईलैण्ड, वियतनाम एवं कम्बोडिया जैसे बौद्धधर्मी देशों में रामलीला के बहुतायत मंचन होते हैं।

इनके अलावा रूस, मारीशस, लोआस, त्रिनिडाड एवं टोबैगो, सूरीनाम, श्रीलंका, बांग्लादेश और नेपाल आदि अनेक देशों में रामलीला को विशेष महत्व प्राप्त है। इस तरह से रामलीला न केवल भारत का चर्चित लोकनाट्य है अपितु इसे विश्व के लोकनाट्य के रूप में भी प्रतिष्ठा प्राप्त है। यूनेस्को द्वारा वर्ष 2005 में विश्व की अमूर्त धरोहर के रूप में सम्मान प्राप्त रामलीला को राष्ट्रिय स्तर पर भी विशेष सम्मान देने की आवश्यकता है। 
 एक ही कथानक का लगभग एक ही तरह से हर बार मंचन होने के बावजूद भी रामलीला की लोकप्रियता आज भी निर्बाध है। एक दिन से लेकर एक माह तक की अवधि में मंचित होने वाली रामलीलाएं भारत की प्राचीन संस्कृति के सार्वभौमिक स्वरुप का दर्शन कराने में सर्वथा सक्षम हैं। रामलीला अयोध्या के राजा दशरथ के पुत्र राम के जीवन से जुड़ी घटनाओं का मात्र नाट्य रूपान्तरण नहीं है बल्कि यह भारतीय संस्कृति एवं सभ्यता के उच्च आदर्शों की एक सम्पूर्ण गाथा है। यह गाथा है उच्च मानवीय मूल्यों की। यह गाथा है उच्च आदर्शवादी समाज की। यह गाथा है आदर्शों के उच्चतम शिखर पर दृढ़ता से खड़ी राजनीति की। यह गाथा है आदर्श परिवार की। यह गाथा है मर्यादा की सीमाओं में बंधे ईमानदार एवं दृढ़ निश्चयी व्यक्तित्व की। इसीलिए अति प्राचीन होते हुए भी रामलीला में सर्वथा नवीनता का दर्शन होता है।   


एक प्रश्न आज तक अनुत्तरित है कि विश्व स्तर के इस लोकनाट्य का आदि प्रवर्तक कौन है। रामभक्तों की दृष्टि में श्रीराम की लीला अनादि है। उनके मतानुसार सृष्टि-चक्र के प्रत्येक कल्प में श्रीराम का अवतार होता है। जैसा कि श्रीरामचरितमानस की इस चैपाई से स्पष्ट भी है “कलप कलप प्रति प्रभु अवतरहीं। चारू चरित नानाबिधि करहीं।।” अतः प्रत्येक कल्प में रामलीला का भी मंचन होता है। एक किवदन्ती के अनुसार श्रीराम के वनगमन के पश्चात् अयोध्यावासी श्रीराम की याद में उनकी बाल लीलाएं किया करते थे। तभी से रामलीला की शुरुआत मानी जाती है। यद्यपि लोकगीतों में रामकथा का गायन जितना पुराना है, रामलीला को भी उतना ही प्राचीन मानना चाहिए। क्योंकि लोकगीतों एवं लोकनाट्यों का अन्तः सम्बन्ध नकारा नहीं जा सकता है।

यदि यह कहा जाये कि लोकनाट्य लोकगीतों का ही नाट्य रुपान्तरण हैं तो अतिसंयोक्ति नहीं होगी। सुदूर ग्रामीण अंचलों में अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ते रामकथा पर आधारित अनेक लोकनाट्य आज भी देखने को मिल जायेंगे। चित्रकूट क्षेत्र में ‘राउत’ जन समुदाय द्वारा खेले जाने वाले नाटक रामकथा पर ही आधारित होते हैं। उत्तरांचल का लोकनाट्य ‘रम्मान’, गुजरात का ‘भवाई’, महाराष्ट्र का ‘ललित’ तथा बंगाल का ‘जात्रा’ इसके प्रमुख उदाहरण हैं। ‘श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण’ को श्रीराम के समय का ही ग्रन्थ माना जाता है। लवकुश द्वारा रामकथा का गायन भी तभी किया गया था। उसके बाद से रामकथा का गायन किसी न किसी रूप में निरन्तर होता चला आ रहा है।

जो कि संस्कृत के छन्दबद्ध श्लोकों तथा लोकभाषा दोनों ही रूपों में प्रचलित हुआ। रामलीला की प्रतिष्ठा भी इसी के साथ-साथ होती चली गयी। महाभारत तथा हरिवंश पुराण में राम के चरित्र को लेकर नाटक का उल्लेख मिलता है। भवभूति का ‘उत्तर-रामचरितम’ तथा कालिदास का ‘हनुमान्नाटक’ तो मंच के लिए ही लिखा गया था। इस तरह गोस्वामी तुलसीदास जी के पूर्व भी रामलीला की समृद्ध परम्परा रही है। कुछ विद्वान मेधा भगत को रामलीला का आदि प्रवर्तक मानते हैं। एक जनश्रुति के अनुसार काशी के कतुआपुर मोहल्ले में स्थित फुटहे हनुमान के निकट निवास करने वाले मेधा भगत को एक बार श्रीराम ने स्वप्न में दर्शन देकर लीला मंचन का आदेश दिया था। इसी स्वप्न-प्रेरणा के आधार पर ही मेधा भगत ने अपने सहयोगियों के साथ रामलीला का मंचन प्रारम्भ किया था। उसके बाद तुलसीदासजी ने अपनी प्रसिद्ध कृति ‘रामचरितमानस’ के आधार पर मेधा भगत के सहयोग से रामकथा का मंचन प्रारम्भ कराके रामलीला को एक नया स्वरुप प्रदान किया। रामलीला का यही स्वरूप आज भारत तथा विश्व के अन्य देशों में लोकप्रियता के चरम पर है। 
देश-विदेश के विभिन्न क्षेत्रों में रामलीला का मंचन प्रायः विजयदशमी महोत्सव के अवसर पर ही होता है। जबकि कानपुर और इसके निकटवर्ती जनपदों में लगभग पूरे वर्ष जगह-जगह रामलीला के मंचन होते रहते हैं। उसमें भी रामलीला के प्रसंग विशेष ‘धनुषयज्ञ एवं लक्ष्मण-परशुराम संवाद’ को सर्वाधिक लोकप्रियता प्राप्त हुई है। भारत के इस भूभाग पर मंचित होने वाली रामलीला मात्र सनातन संस्कृति एवं सभ्यता के उच्च आदर्शों का निरूपण अथवा भक्तिमय धार्मिक चेतना के संचरण का साधन भर नहीं है। बल्कि साहित्यिक, सांस्कृतिक, आध्यात्मिक, सामाजिक, राजनीतिक तथा राष्ट्रीय चेतना के संवेगात्मक प्रवाहोत्कर्ष से ओतप्रोत शास्त्रार्थ के रूप में भी प्रतिष्ठित हुई है। इसी कारण यहाँ की रामलीला में अभिनय के चार प्रमुख अंगों आंगिक, आहार्य, वाचिक और सात्विक में सबसे अधिक महत्व वाचिक अर्थात संवाद को दिया जाता है। देश-दुनियां की सभी नाट्य विधाओं में प्रायः संवाद पूर्व में गढ़े हुए या लिखे हुए होते हैं।

जिन्हें अभिनेतागण याद करके मंच से प्रस्तुत कर देते हैं। जबकि कानपुर शैली के धनुषयज्ञ प्रसंग के 80 प्रतिशत संवाद पात्रों द्वारा तुरन्त गढ़कर प्रस्तुत किये जाते हैं। अर्थात दो पात्रों के बीच मंच पर होने वाली वार्ता विभिन्न बिन्दुओं पर तर्क-वितर्क युक्त चर्चा के रूप में होती है। इस चर्चा के बिन्दु साहित्यिक, सांस्कृतिक, आध्यात्मिक, सामाजिक, राजनीतिक तथा राष्ट्रिय आदि किसी भी विषय पर हो सकते हैं। परन्तु त्रेता युग की काल सीमा के अन्दर ही यह वार्ता सम्पन्न होती है। कानपुर की रामलीला में रावण-वाणासुर तथा लक्ष्मण-परशुराम का अभिनय करने वाले अभिनेताओं के लिए अभिनय के गुणों को ग्रहण करने से कहीं अधिक अध्ययनशील होना आवश्यक होता है। उक्त पात्र अपने अभिनय के देशकाल की सीमा में रहकर वर्तमान के अनेक ज्वलन्त मुद्द¨ं पर तर्क-वितर्क युक्त चर्चा करते हुए एक सारगर्भित निष्कर्ष समाज के सामने रख देते हैं। उनकी इस चर्चा में कई बार दर्शकगण भी सम्मिलित हो जाते हैं।

जिससे यह मंच मात्र अभिनय मंच न होकर ज्ञानपरक सामूहिक चर्चा या लोकबहस का मंच बन जाता है। एक अच्छे से अच्छा नाटक डेढ़ घण्टे से अधिक समय के बाद दर्शकों को बांधने में प्रायः विफल हो जाता है। परन्तु कानपुर शैली के लक्ष्मण-परशुराम संवाद के केवल दो पात्र सैकड़ों दर्शकों को तीन से चार घण्टे तक बड़े ही सहज रूप से बांधें रहते हैं। मेरा अपना रिकार्ड रात्रि 10 बजे से सुबह के 5 बजे तक संवाद करने का बना हुआ है। कानपुर जनपद के परौली ग्राम में 19 मार्च 2009 को यह कार्यक्रम सम्पन्न हुआ था। जिसमें मैं लक्ष्मण की भूमिका में था और स्व.डॉ.राजेन्द्र प्रसाद त्रिपाठी ने परशुरामजी का अभिनय किया था। 


बुन्देलखण्ड में राम वनवास के दृश्यों को सर्वाधिक लोकप्रियता प्राप्त है। उसमें भी जालौन जनपद में केवट-राम संवाद अत्यधिक लोकप्रिय है। दोनों कलाकारों के बीच फिल्म पैरोडी में होने वाले प्रतिस्पर्धात्मक सवाल-जवाब दर्शकों को कई घण्टों तक बांधे रहते हैं। इस तरह की सभी रामलीलाएं व्यावसायिक कलाकारों द्वारा ही मंचित होती हैं। अव्यावसायिक कलाकारों द्वारा मंचित रामलीलाअ¨ं में काशी के रामनगर की रामलीला विश्व की सर्वश्रेष्ठ रामलीला मानी जाती है। जो कि ध्वनि, प्रकाश की आधुनिक तकनीक से दूर प्राचीन एवं पारम्परिक स्वरुप में ही मंचित होती है। मिर्जापुर की 600 वर्ष पुरानी रामलीला प्रतिदिन अलग मंच के लिए जानी जाती है। जालौन जनपद के कोंच की रामलीला भी अपना अलग स्थान रखती है।

लखनऊ के ऐशबाग की रामलीला आधुनिक तकनीक से जुड़कर भी प्राचीन स्वरुप का दर्शन कराती है। कानपुर देहात के अकबरपुर की मैदानी रामलीला अति लोकप्रिय है। कानपुर शहर के परेड ग्राउंड की रामलीला अपना विशेष स्थान रखती है। लेकिन कानपुर जनपद के पतारा, पड़री लालपुर, भदरस, टिकरा एवं बाघपुर ग्राम की रामलीलाएं प्राचीन शैली के लिए जानी जाती हैं। फतेहपुर जनपद के कुंवरपुर की रामलीला 500 वर्ष से भी अधिक प्राचीन है।

इसके अलावा कौशाम्बी, प्रयागराज, चित्रकूट, बनारस, अयोध्या, बरेली, जसवन्तनगर (इटावा), फिरोजाबाद, आगरा, मथुरा तथा दिल्ली सहित देश के विभिन्न हिस्सों में रामलीला के अनेक प्राचीन एबं प्रभावी मंचन होते हैं। अंडमान निकोबार द्वीप समूह में भी हिन्दी भाषी रामलीला मंचित ह¨ती है। यहाँ के नरेश चन्द्र लाल रामलीला के प्रचार-प्रसार में अहम् भूमिका निभा रहे है। उड़ीसा के दासपल्ला (नयागढ़) की रामलीला रूप-सज्जा, मंच-सज्जा तथा संवाद अदायगी के लिए जानी जाती है। पुतलों वाली रामलीला का प्रभावी मंचन उ.प्र. के खजुहा (फतेहपुर), उदयपुर (राजस्थान) तथा हैदराबाद (आन्ध्र प्रदेश) में होता है।  


देश के कोने-कोने में मंचित होने वाली रामलीला भारत की प्राचीन संस्कृति को स्वयं में समेटे हुए अनेकता में एकता का संदेश सदियों से देती चली आ रही है। रामलीला के संरक्षण एवं संवर्धन के लिए अयोध्या शोध संस्थान का प्रयास अति सराहनीय है। अन्य सरकारी संस्थाओं को भी इस ओर विशेष ध्यान देना चाहिए। त्रिनिडाड एवं टोबैगो की सरकार ने रामलीला के सरक्षण एवं संवर्धन के लिए 3 जुलाई 2012 को एक अधिनियम पारित करके राष्ट्रिय रामलीला परिषद् का गठन किया था। भारत सरकार को भी कुछ ऐसा ही प्रयास करना चाहिए।

    डॉ.दीपकुमार शुक्ल (स्वतन्त्र टिप्पणीकार)
 

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