संसदीय संस्थाओं में महिलाओं का प्रतिनिधित्व

संसदीय संस्थाओं में महिलाओं का प्रतिनिधित्व

             हितेन्द्र शर्मा

 

राजनीतिक विद्धान “आम आदमी” की चिंता में शायद "आम औरत" शब्द अपने शब्दकोश में शामिल करना ही भूल गए। हिमाचल प्रदेश के लगभग 50 लाख से भी अधिक मतदाताओं की सूची में आधी महिलाएं है और पुरुषों की तुलना में महिलाओं के मतदान का प्रतिशत भी अधिक रहता है। दुर्भाग्यवश महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी को सिर्फ वोट डालने तक ही सीमित रखा गया है। हिमाचल प्रदेश विधानसभा में भी महिलाओं की भागीदारी नाममात्र की है।  

महिलाओं के प्रति राजनीतिक दलों की गंभीरता महिला आरक्षण बिल से ही साफ़ हो जाती है। 33 फीसदी महिला आरक्षण का ज्ञान बांटने वाले सभी राजनैतिक दल और नेता देवभूमी की चार लोकसभा सीटों पर एक भी महिला को अपना प्रत्याशी नही बना सके। क्या विधानसभा, लोकसभा और मंत्रिमंडल, में महिला प्रतिनिधित्व की कमीभारतीय राजनीति में अभी भी पुरुषवादी सोच का प्रतीक नही है?

दलील कि टिकट तो पार्टी हाईकमान, पार्टी/संगठन के समर्पित नेताओं को ही प्रदान करते है, भले ही नेताजी पार्टी में आज ही क्यों न शामिल हुए हो क्योंकिजो उम्मीदवार जीतने की क्षमता रखता है सभी राजनीतिक दल उसके सामने नतमस्तक रहते हैं। दोहरे चरित्र वाले यह राजनैतिक योद्धाचुनावी रैलीयों व बैठको सफल बनाने के लिए भी महिलाओं के नृत्य प्रदर्शन को हथियार बनाकर मैदान में भीड़जुटाते है।

यदि महिलाओं की भागीदारी इसी तरह से कम रही तो यह बेहद चिंताजनक हैं।क्योंकि महिलाएं अब अपने मताधिकार का अधिक इस्तेमाल करने लगी हैं। समाज में संतुलित विकास बनाए रखने के लिए लिंग समानता बहुत जरूरी है। शास्त्रों में भी लिखा है कि – “यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:”।

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