सिलेंडरों का पता नहीं, लकड़ी के चूल्हे पर बन रहा मिड-डे-मील

सिलेंडरों का पता नहीं, लकड़ी के चूल्हे पर बन रहा मिड-डे-मील

सिलेंडरों का पता नहीं, लकड़ी के चूल्हे पर बन रहा मिड-डे-मील

 

जिला संवाददाता नरेश गुप्ता की रिपोर्ट


सिलेंडरों का पता नहीं, लकड़ी के चूल्हे पर बन रहा मिड-डे-मील

सिधौली सीतापुर:  

प्राथमिक विद्यालय टिकौली में छात्र- छात्राओं के मिड-डे-मील बनाने के लिए खरीदे गए कु¨कग गैस सिलेंडरों का अता पता ही नहीं है।

लिहाजा विद्यालय में रसोइया चूल्हे पर लकड़ी जला भोजन बनाने को विवश हैं। सरकार ने सभी उच्च व प्राथमिक विद्यालयों में छात्र-छात्राओं को धुंए रहित भोजन बनाने के लिए हजारों रुपए प्रधान और प्रधानाध्यापक के संयुक्त खाते में भेजे थे।

सभी विद्यालयों में गैस सिलेंडर, चूल्हे व रेगुलेटर खरीदे गए थे। सरकार की मंशा थी कि रसोइया छात्र-छात्राओं को स्वच्छ भोजन मुहैया कराये और रसोइया को धुआं न लगे और वह स्वस्थ रहे, लेकिन विभागीय लापरवाही के चलते खरीदे गए गैस सिलेंडर का अता-पता ही नहीं है।

क्षेत्र के दर्जनों परिषदीय विद्यालयों के पड़ताल में कइयों प्रधानाध्यापकों को गैस सिलेंडर खरीद के बाबत जानकारी ही नहीं है। यही हाल ग्राम प्रधानों का भी है। अधिक पहली बार ग्राम प्रधान बने प्रधानों को विद्यालयों में गैस सिलेंडर की जानकारी ही नहीं है।

हालांक  कुछ विद्यालय ऐसे भी है, जहां की रसोइया गैस सिलेंडर पर ही खाना बनाते हुए मिलीं। 2007 से 2009 के बीच परिषदीय विद्यालयों में पांच हजार रुपये की दर से सरकार ने गैस सिलेंडर खरीदने की व्यवस्था की थी। इसी दौरान सभी विद्यालयों के प्रधानाध्यापकों ने सिलेंडर खरीद भी ली।

गैस की उपलब्धता के बावजूद विभागीय अधिकारियों की लापरवाही और ग्राम प्रधान व स्कूल प्रशासन के रुचि न लेने से लकड़ी पर ही खाना बनता रहा। लापरवाही का आलम यह रहा कि गैस सिलेंडर खरीदने के बाद कहां है किसी जिम्मेदार ने जानने की जहमत ही नहीं उठाई। कुरेदने पर पता चला कि गैस सिलेंडर या तो ग्राम प्रधान उठा ले गए अथवा शिक्षक।

यही नहीं किसी विद्यालय में सिलेंडर चोरी हो गए तो किसी विद्यालय का शिक्षा विभाग के अधिकारियों ने कुछ दिन के लिए उधार लिया, जो वापस ही नहीं किया। ऐसी स्थिति में सरकार के लाखों रुपए के गैस सि¨लडर ग्राम प्रधानों व शिक्षा विभाग ने डकार लिए।

ऐसी स्थिति में छात्रों को न शुद्ध भोजन मिल पा रहा है और न रसोइयों को स्वच्छ वातावरण मिल पा रहा है। धुंए के गुबार के बीच आंखें पोछ-पोछ भोजन पकाने को रसोइया विवश हैं।

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