सरकारी बजट के पैसे नहीं बरसात के मेघ बुझायेंगे  तालाबों की प्यास

सरकारी बजट के पैसे नहीं बरसात के मेघ बुझायेंगे  तालाबों की प्यास

          (ब्यूरो रिपोर्ट सीतापुर)

 

सीतापुर विशेष पशु पक्षियों को कैसे मिले पानी, सूखे पड़े हैं तालाब

 

सरकारी बजट के पैसे नहीं बरसात के मेघ बुझायेंगे  तालाबों की प्यास

जिला संवाददाता नरेश गुप्ता की रिपोर्ट

सिधौली सीतापुर ,

उत्तर प्रदेश के जनपद  सीतापुर  में प्रशासन के तमाम निर्देशों के बावजूद तालाबों में पानी भरने का काम ग्राम प्रधान व पंचायत अधिकारी द्वारा नहीं कराया जा रहा है। ऐसे में तपिशभरी धूप व गर्मी के बीच मवेशियों के लिए पेयजल संकट गहराता जा रहा है। ग्रामीणों ने इसे लेकर आवाज भी उठाई, लेकिन ध्यान नहीं दिया जा रहा है। यह मनमानी किसी एक ग्राम पंचायत में नहीं बल्कि कटेहरी विकास खंड की इक्का-दुक्का ग्राम पंचायतों को छोड़कर सभी जगह है। तालाब न भरे होने से हैंडपंपों का जलस्तर पर भी लगातार गिरता जा रहा है।

 

गर्मी को देखते हुए जिला प्रशासन ने सभी ग्राम प्रधानों व पंचायत अधिकारियों का तालाबों में पानी भरवाने का निर्देश दिया है। इसके बावजूद इस निर्देश का पालन कहीं होता नहीं दिख रहा है। इक्का-दुक्का तालाबों को छोड़ दिया जाए तो कहीं पानी नहीं है।

जिन तालाबों में पानी है, उनमें से भी ज्यादातर में ग्रामीणों के प्रयास से पानी भरा गया है। गुलरिया, रनुवापारा ,अर्जुनपुर, मास्टर बाग, खमरिया कान्ह मऊ अर्जुनपुर  बेड़शापुर ,जजौर, नयागांव, बरगदिया,  ऊंचा खेरा, गंगागंज, बलवंत पुर, कठवा ,ससेना, पृथ्वीपुर ,मनवा ,टिकौली , मऊ, उमापुर, रघुनाथपुर,  मदनापुर, सहित दर्जनों गांव ऐसे हैं जहां तालाब खुद ही प्यासे हैं। ग्राम पंचायत व ग्राम प्रधान बजट न होने का रोना रो रहे हैं। 

प्रशासन भी बजट की व्यवस्था करने के बजाए सिर्फ फरमान ही दे रहा है। अधिकांश  ग्राम पंचायत के ग्रामीणों  ने जिला प्रशासन से अविलंब तालाबों में पानी भरवाए जाने की मांग की है। उधर, जिला प्रशासन ने कहा कि तालाबों में पानी भरवाना सुनिश्चित किया जा रहा है। इसमें शिथिलता बर्दाश्त नहीं होगी। किंतु जमीनी स्तर पर सब खोखले वादे ही सामने आते हैं कभी भी जमीनी स्तर पर मौखिक विवेचना ही नहीं की गई सिर्फ ऐसी कूलर युक्त  दफ्तरों में बैठकर कागजों पर सूखे तालाबों में पानी भरवा दिया जाता है

और शायद फिर बजट के रुपए आपस में बंदरबांट हो जाते हैं निष्कर्ष यह होता है के तालाबों में ज्यों के त्यों  ही धूल उड़ती रहती है अब तो शायद इन तालाबों की प्यास मेघ के बादल ही पूछा पाएंगे क्योंकि सरकारी बजट के पैसों से तालाबों में पानी नहीं भ्रष्टाचारियों की जेभे भरा करती हैं

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