पत्रकारों के हित और उत्थान के लिए बने सख्त कानून व्यवस्था

पत्रकारों के हित और उत्थान के लिए बने सख्त कानून व्यवस्था

पत्रकारों के हित और उत्थान के लिए बने सख्त कानून व्यवस्था

 

आजादी से लेकर आज तक पत्रकार और उसकी पत्रकारिता ही ऐसा समाज को जागरूक करने का माध्यम रहा है जिससे हमारे समाज में फैल रहे कुरीतियों अव्यवस्था भ्रष्टाचार आदि के साथ कई सूचनाओं को एक जगह से दूसरे जगह पर पहुंचाने का जरिया बना रहा. 

चौथे स्तंभ के तौर पर देखे जाने वाले प्रबल स्तंभ को सबसे ज्यादा समाज में खतरा भी होता है फिर भी पत्रकार अपनी जान जोखिम में डालकर, सामाजिक आर्थिक राजनीतिक धार्मिक जैसे पहलुओं पर समाज को जागरूक करने का पूरा प्रयत्न सदियों से करता आ रहा है. 

आज देश में कानून और सुरक्षा की बात की जाए तो सिर्फ पत्रकारों के विकास और उनसे जुड़े सुरक्षा न्याय जैसे शब्दों का कहीं भी जिक्र नहीं होता है. जैसे पत्रकारों को सुरक्षा की आवश्यकता ही नहीं पड़ती. एक तरफ तो हर तबके के लोग संविधान में किसी ना किसी सख्त कानून व्यवस्था से जुड़े हुए हैं जबकि पत्रकारों के हित की बात की जाए तो, ना तो जीविकोपार्जन के लिए कोई मदद ना ही समाज में पत्रकारों की कोई सुनिश्चित न्याय व्यवस्था प्राप्त है और इसी वजह से हर प्रशासनिक और राजनीतिक लोग समाज में इन्हें ही दबाने की कोशिश करते हैं. 

 

कुछ दिनों से तो यह देखा जा रहा है जब किसी मामले की गंभीरता और प्रकाशित करने की बात आती है तो क्षणिक लाभ वास्ते पत्रकारों पर दबाव बनाया जाता है और नहीं तो पत्रकारों पर मुकदमा दर्ज कर दी जाती है. आखिर पत्रकार खबरों को गोपनीय रखता है तो दलाल जैसे शब्दों से नवाजा जाता है और उसे उजागर करता है तो मुकदमे का डर दिखा दिया जाता है जिस वजह से सही पत्रकारिता का जोखिम भरा काम छोड़, पत्रकार विभिन्न सरकारी दफ्तरों से निकले हुए प्रेस नोट या संबंधित थाने के चंगुल में निरंतर फंसा रहता है. 

ऐसा तो है ही नहीं कि पत्रकारों का अपना परिवार नहीं होता है पत्रकार अपनी जान को दांव पर लगा लेता है किंतु अपने परिवार की जान कैसे दाव पर लगा सकता है उस पर तो उसका हक भी नहीं होता. ऐसे तमाम पत्रकार फिर भी समाज के उत्थान और सामाजिक भाईचारे को बचाने के लिए निरंतर प्रयत्नशील होते हैं. 

पिछले कई सालों से नई सरकारें चुन कर आती हैं और फिर भी किसी का ध्यान पत्रकार के हित के ऊपर आकर्षित नहीं होता. पार्टियों के राजनेता और देश प्रदेश के प्रशासनिक अधिकारी अपना काम निकालते हैं. अगर किसी मुद्दे पर सवाल जवाब कर लिया तो धमकियों के साथ देख लेने जैसे शब्दों का प्रयोग भी पत्रकारों के लिए होने लगता है. 

 

कई बार तो राष्ट्रीय और राज्य सुरक्षा का हवाला देकर पत्रकारों को दबाने की कोशिश की जाती है वहीं सूचना के प्रसार में प्रदेश और देश सरकार द्वारा रुकावटें डालकर पत्रकारों और पत्रकार के परिवारों को रोकने का प्रयास भी किया जाता है. जिससे पत्रकार डरा सहमा अपनी छवि को बचाने में लग जाता है जिससे सच्ची पत्रकारिता का उसके जीवन से मानो पलायन ही हो जाता है.

पिछले सालों में तो भ्रष्टाचार और सामाजिक उत्थान जैसे मसलों पर कई पत्रकारों ने अपनी जाने भी गवाइ है जो मामला अब ठंडे बस्ते में पड़ चुका है. या तो सरकार को पत्रकारों के विकास के लिए भी नियम कानून बनाने चाहिए और नहीं तो पत्रकारों के कार्य में जो बाधा असामाजिक लोगों के द्वारा निरंतर बनाई जाती है. उसे रोकने के लिए सख्त कानून व्यवस्था मुहैया करवाना सरकार की प्राथमिकता में होनी चाहिए. 

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