क्या सत्ता व्यवस्था अपनी आलोचना की जगह समाज में गढ़ा और मढ़ा है अर्बन नक्सल

सत्ताधारियों से प्रश्न पूछना कहीं अर्बन नक्सलवाद तो नहीं ? 

नई दिल्ली /आज सत्ता-व्यवस्था अपनी आलोचना बर्दाश्त नहीं करती वह ऐसे लोगों को 'नक्सल' घोषित कर रही,जो सवाल पूछते हैं.जो गरीबों,दलितों,आदिवासियों,अल्पसंख्यकों की लड़ाई लड़ते हैं.वे सब सरकार के निशाने पर हैं.अपनी सुरक्षा के लिए सरकारें नये शब्द, पद, मुहावरे गढ़ती और मढ़ती हैं.जिनमें से एक'अर्बन नक्सल' शब्द कुछ राजनीतिक दलों के लिए ढाल और कुछ नेताओं के लिए काम ना करने पर कोई प्रश्न ना पूछ लेे,तो भारत के बुद्धिजीवियों पर दबाव बनाने का कलयुगी यंत्र या एक गढ़ा और मढ़ा हुआ राजनीतिक दांव पेच है. 

इसका अर्थ उन शहरी पत्रकारों,कवियों,लेखकों, बुद्धिजीवियों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और संस्कृतिकर्मियों से है,जो गरीबों दलितों शोसीतो पीड़ितो कि मदद के लिए आवाज उठाते हैं और सत्ताधारी नेताओं से सवाल पूछने की हिम्मत जुटा लेते हैं.कुछ ने तो उन्हें नक्सलवाद,माओवाद के समर्थक तक बता दिया. इस पद की वास्तविकता और इसके पीछे सत्ता-व्यवस्था और सरकारों की नीतियों पर इसके साथ कम विचार किया गया है.शब्द पद और मुहावरों की निर्मिति जिन कारणों से की जाती है, उधर बहुत कम ध्यान दिया जाता है.क्या किसी को भी बिना सप्रमाण यह कहने की छूट है कि वह नक्सली या माओवादी है.

हथियारबंद संघर्ष ही है माओवाद नक्सलवाद

जब तक कोई व्यक्ति हथियारबंद संघर्ष की बात नहीं करता या लिखता, उसे माओवादी या नक्सली नहीं कहा जा सकता.पत्रकार,शोधकर्ता का माओवादियों के पास जाना,उनसे संवाद करना भी उन्हें माओवादी नक्सली सिद्ध नहीं करता.अगर कोई मार्क्स, लेनिन, माओ, चारू मजूमदार, स्टालीन, हो ची मिन्ह, चे ग्वेरा आदि की किताबें रखता है,उसे पढ़ता है,तब भी वह माओवादी नहीं है.नक्सली गतिविधियों में शामिल होना,उसकी नीतियों,कार्यनीतियों का समर्थन और प्रचार-प्रसार ही किसी को'अर्बन' या 'रूरल' नक्सल बना सकता है.आनंद तेलतुंबड़े देश के प्रमुख दलित चिंतक-विचारक हैं. स्टेन स्वामी आदिवासियों के हकों और अधिकारों की लड़ाई लड़ते हैं और केसत्यनारायण हैदराबाद के अंग्रेजी और विदेशी भाषा विश्वविद्यालय के संस्कृति अध्ययन विभाग के प्रोफेसर, दलित चिंतक, विद्वान और वरवर राव के दामाद हैं.इन सबको पुणे पुलिस ने'अर्बन नक्सल'घोषित किया.एक लोकतांत्रिक समाज में सभी राजनीतिक विचारधराओं पर विचार-विमर्श और बहस आवश्यक है.'अर्बन नक्सल' घोषित करने की पूरे देश में व्यापक स्तर पर प्रतिक्रिया हुई और एक ही दिन साठ हजार से अधिक लोगों ने 'मी टू अर्बन नक्सल'अपने को कहा. गिरीश कर्नाड ने गौरी लंकेश की पहली पुण्यतिथि पर विरोध के एक तरीके के तहत 'मी टू अर्बन नक्सल' का बोर्ड शरीर पर डाल रखा था.अब गौरी लंकेश की हत्या के सिलसिले में गिरफ्तार चार लोगों के वकील ने कर्नाड के साथ अभिनेता प्रकाश राज, बुद्धिजीवी लेखक केएस भगवान, अग्निवेश, उमर खालिद, कन्हैया कुमार, जिग्नेश मेवाणी सबका संबंध माओवादियों से मानकर पुलिस से एक एफआइआर की मांग की. सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई से पहले मुंबई में महाराष्ट्र पुलिस ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित की, जिस पर कोर्ट ने फटकार लगायी.इस तरह देखा जाए तो'सत्यमेव जयते' के देश में यह झूठ की जीत कभी नहीं हो सकती.सत्ता-व्यवस्था पर, सरकार की नाकामियों और वादाखिलाफियों पर सवाल हमेशा ही खड़े किये जाते रहेंगे. 

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