भारतीय इतिहास को भारतीय दृष्टिकोण से लिखने की जरूरत - अमित शाह

भारतीय इतिहास को भारतीय दृष्टिकोण से लिखने की जरूरत - अमित शाह

BHU में बोले गृहमंत्री शाह जिस सम्राट स्कंदगुप्त ने कश्मीर को स्वंतत्र किया उनपर अध्ययन के लिए 100 पेज भी उपलब्ध नहीं

काशी हिंदू विश्वविद्यालय में आयोजित दो दिवसीय अंतराष्ट्रीय संगोष्ठी में बतौर मुख्य अतिथि हुए शामिल

भारत अध्ययन केंद्र की ओर से स्‍कंदगुप्‍त विक्रमादित्‍य पर संगोष्ठी का किया गया आयोजन

वाराणसी-

केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह गुरुवार को एक दिवसीय दौरे पर बनारस पहुंचे। अमित शाह काशी हिंदू विश्वविद्यालय की दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी गुप्तवंशक-वीर स्कंदगुप्त विक्रमादित्य के शुभारंभ के अवसर पर बतौर मुख्य अतिथि शामिल हुए।

इस दरमियान उनके साथ मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ मौजूद थे। बीएचयू स्वतंत्रता भवन सभागार में आयोजित संगोष्ठी का उद्घाटन करने के साथ ही गृहमंत्री अमित शाह बतौर मुख्य वक्ता ‘गुप्तवंशैक-वीर : स्कंदगुप्त विक्रमादित्य का ऐतिहासिक पुन: स्मरण व भारत राष्ट्र का राजनीतिक भविष्य’ विषय पर विचार भी व्‍य‍क्‍त किया। बीएचयू में स्‍कंदगुप्‍त विक्रमादित्‍य पर संगोष्ठी का आयोजन भारत अध्ययन केंद्र की ओर से किया गया है।

हिंदू संस्कृति को आगे बढ़ा रहा है विश्वविद्यालय

अपने संबोधन में गृहमंत्री ने कहा कि पंडित मदन मोहन मालवीय जी ने जब काशी हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना की तब उनकी सोच जो भी रही हो, लेकिन स्थापना के उसके इतने वर्षों बाद भी ये विश्वविद्यालय हिंदू संस्कृति को अक्षुण रखने के लिए अडिग खड़ा है ट। हिंदू संस्कृति को आगे बढ़ा रहा है।

मैं कहता हूं कि सम्राट स्कन्दगुप्त ने भारतीय संस्कृति, भारतीय भाषा, भारतीय कला, भारतीय साहित्य, भारतीय शासन प्रणाली, नगर रचना प्रणाली को हमेशा से बचाने को प्रयास किया है, ये सत्य है। सैकड़ों साल की गुलामी के बाद किसी भी गौरव को पुनः प्रस्थापित करने के लिए कोई व्यक्ति विशेष कुछ नहीं कर सकता, एक विद्यापीठ ही ये कर सकता है।

भारत का अभी का स्वरूप और आने वाले स्वरूप के लिए हम सबके मन में जो शांति है, उसके पीछे का कारण ये विश्वविद्यालय ही है।

मौर्य वंश और गुप्त वंशने भारतीय संस्कृति को विश्व के अंदर सर्वोच्च स्थान पर प्रस्थापित किया

अमित शाह ने कहा कि महाभारत काल के 2,000 साल बाद 800 साल का कालखंड दो प्रमुख शासन व्यवस्थाओं के कारण जाना गया।

मौर्य वंश और गुप्त वंश। दोनों वंशों ने भारतीय संस्कृति को तब के विश्व के अंदर सर्वोच्च स्थान पर प्रस्थापित किया।

गुप्त साम्राज्य की सबसे बड़ी सफलता ये रही कि हमेशा के लिए वैशाली और मगध साम्राज्य के तकराव को समाप्त कर एक अखंड भारत के रचना की दिशा में गुप्त साम्राज्य आगे बढ़ा था।

चंद्रगुप्त विक्रमादित्य को इतिहास में बहुत प्रसिद्धि मिली

उन्होंने कहा चंद्रगुप्त विक्रमादित्य को इतिहास में बहुत प्रसिद्धि मिली है। लेकिन उनके साथ इतिहास में बहुत अन्याय भी हुआ है।

उनके पराक्रम की जितनी प्रसंशा होनी थी, उतनी शायद नहीं हुई। तब सम्राट स्कंदगुप्त ने अपने पिता से कहा कि मैं इसका सामना करूंगा और उसके बाद 10 साल तक जो अभियान चला, उसमें समग्र देश के अंदर हूणों का विनाश करने का पराकम्र स्कंदगुप्त ने ही किया।

तकक्षिला विश्वविद्यालय को तहस-नहस कर दिया गया

आगे कहा कि जिस तकक्षिला विश्वविद्यालय ने कई विद्वान, वैद्, खगोलशात्र और अन्य विद्वान दिए, उस तकक्षिला विश्वविद्यालय को तहस-नहस कर दिया गया। अपने इतिहास को संजोने, संवारने, अपने इतिहास को फिर से रीराइट करने की जिम्मेदारी, देश की होती है, जनता की होती है, देश के इतिहासकारों की होती है। हम कब तक अंग्रेजों को कोसते रहेंगे।

इतिहास में सत्य का तत्व है

आज देश स्वतंत्र है, हमारे इतिहास का संशोधन करके संदर्भ ग्रन्थ बनाकर इतिहास का पुन: लेखन करके लिखें। मुझे भरोसा है कि अपने लिख इतिहास में सत्य का तत्व है इसलिए वो जरूर प्रसिद्ध होगा।

स्कंदगुप्त ने कश्मीर को भी स्वतंत्र किया

सम्राट स्कंदगुप्त ने कश्मीर को भी स्वतंत्र किया और देश को भी आक्रमण से बचाया, मगर इतनी बड़ी घटना इतिहास में कहीं दिखी नहीं।

स्‍कंदगुप्‍त के पराक्रम और उनके शासन चलाने की कला पर चर्चा की जरूरत है। स्‍कंदगुप्‍त के इतिहास को पन्‍नों पर स्‍थापित कराने की जरूरत है। इतनी ऊंचाई पर रहने के दरमियान शासन व्‍यवस्‍था के लिए उन्‍होंने शिलालेख बनाए।

स्‍कंदगुप्‍त ने रेवेन्‍यू निय‍म भी बनाए जो आज की जरूरत है। लंबे गुलामी के दौर के बाद भी उनके बारे में कम ही जानकारी उपलब्‍ध है।

स्कंदगुप्त का बहुत बड़ा योगदान दुर्ग की रचना

स्कंदगुप्त का बहुत बड़ा योगदान दुर्ग की रचना, नगर की रचना और राजस्व के नियमों को संशोधित करके शासन व्यवस्था को आगे बढ़ाने में है।

लेकिन दुर्भाग्य की बात है कि आज स्कंदगुप्त पर अध्ययन के लिए कोई 100 पेज भी मांगेगा, तो वो उपलब्ध नहीं हैं। सभागार में इतिहासकार बैठे हुए हैं, सबसे आग्रह है कि भारतीय इतिहास का नए दृष्टिकोण से लेखन की जरूरत है।

1857 की क्रांति भी इतिहास न बनती

गृहमंत्री ने संबोधन में कहा कि वीर सावरकर न होते तो 1857 की क्रांति भी इतिहास न बनती, उसे भी हम अंग्रेजों की दृष्टि से देखते। वीर सावरकर ने ही 1857 को पहला स्वतंत्रता संग्राम का नाम दिया। देश में दो सौ व्‍यक्तित्‍व रहे हैं, 25 साम्राज्‍य रहे हैं जिन्‍होंने विश्‍व को विद्या दी। अंग्रेजों के जाने के बाद इतिहासकारों के साथ नए दृष्टिकोण से लिखने की जरूरत है। नया जो लिखा जाएगा और लंबा चलेगा, चिरंजीव होगा।

भारत का सम्मान प्रधानमंत्री के नेतृत्व में बढ़ा है

उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सराहना करते हुए कहा कि आज प्रधानमंत्री के नेतृत्व में देश फिर से एक बार अपनी गरिमा पुन: प्राप्त कर रहा है। आज पूरी दुनिया के अंदर भारत का सम्मान उन्हीं के नेतृत्व में बढ़ा है। भारत दुनिया के अंदर सबसे बड़ा लोकतंत्र है इसकी स्वीकृति आज जगह-जगह पर दिखाई पड़ती है। पूरी दुनिया आज भारत के विचार को महत्व देती है।

भारत के वैश्चिक आयाम विषयों पर की जाएगी परिचर्चा

दो दिवसीय अंतरराष्‍ट्रीय आयोजन के क्रम में महात्‍मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय वर्धा के कुलाधिपति प्रो. कमलेश दत्‍त त्रिपाठी ने भी वक्‍तव्‍य दिया।

आयोजन के दरमियान अलग अलग सत्रों में गुप्‍तवंशैक वीर के उदय, हूण आक्रमण, तत्‍कालीन राजनीतिक चुनौतियां, स्‍कंदगुप्‍त का पराक्रम, गुप्‍ताकालीन भारत के वैश्चिक आयाम आदि विषयों पर परिचर्चा की जाएगी।

कार्यक्रम में ये थे मौजदू

कार्यक्रम की अध्‍यक्षता बीएचयू के कुलपति प्रो. राकेश भटनागर, विशिष्‍ट वक्‍ता भारत अध्‍ययन केंद्र के शताब्‍दी पीठ आचार्य प्रो. कमलेश दत्‍त त्रिपाठी हैं।

वहीं कार्यक्रम में केंद्रीय मंत्री महेंद्र नाथ पांडेय, जापान से प्रो. ओइबा ताकाकी, प्रो. ईयामा मातो, मंगोलिया से डॉ. उल्जित लुबराजाव, थाइलैंड से डॉ. नरसिंह चरण पंडा, डॉ. सोम्‍बत, श्रीलंका से डॉ. वादिंगला पन्‍नलोका, वियतनाम से प्रो. दोथूहा, अमेरिका से डॉ. सर्वज्ञ के द्विवेदी, नेपाल से डॉ. काशीनाथ न्‍यौपने शामिल हैं।

वहीं आयोजन में आइसीएसएसआर की ओर से प्रो. दीनबंधु पांडेय, राष्‍ट्रीय संग्राहालय महानिदेशक प्रो. बुद्ध रश्मि पांडेय, भारतीय इतिहास संकलन योजना के पूर्व अध्‍यक्ष डॉ. बाल मुकुंद पांडेय के अलावा अन्‍य विषय विशेषज्ञ भी आयोजन में शामिल हुए।

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