आंकड़ों की जुबानी हिमाचल में बढ़ते नशे की कहानी

आंकड़ों की जुबानी हिमाचल में बढ़ते नशे की कहानी

राजेश वर्मा

ड्रग एडिक्शन मतलब नशे की आदत एक ऐसी जरूरत है जिसे व्यक्ति उसके भयंकर परिणामों को जानते हुए भी नहीं छोड़ पाता। वह खुद को असहाय महसूस करता है। आज प्रदेश भी युवाओं में बढ़ती नशाखोरी की गंभीर समस्या से जूझने को मजबूर है।

हिमाचल पुलिस विभाग द्वारा जारी पिछले तीन साल के आंकड़ों के मुताबिक अफीम के 2015-16 में 15 केस, 2016-17 में 30 तो 2017-18 में 22 केस दर्ज किए गए। भांग के मामले में2015-16 में 391, 2016-17 में 663 व2017-18 में 536 केस दर्ज हुए। हेरोइन के 2015-16 में 52, 2016-17 में 131 तो 2017-18 में 150 मामले दर्ज हुए। शराब के मामले  2015-16 में 1694 केस, 2016-17में 2370 तो 2017-18 में 2571 केस प्रदेश भर में दर्ज किए गए। अन्य मादक पदार्थों को लेकर वर्ष 2015-16 में 179, वर्ष 2016-17में 232 तो 2017-18 में 254 केस पुलिस विभाग ने दर्ज किए।

इन सब आंकड़ों से एक बात तो साफ हो रही है कि पिछले कुछ वर्षों से प्रदेश में अन्य मादक पदार्थों की तुलना सिंथेटिक ड्रग्स के मामलों में लगातार वृद्धि हो रही है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण 216-17 के आंकड़ों के मुताबिक शराब पीने के मामले में प्रदेश ने पड़ोसी राज्यों को भी पछाड़ दिया है जहां प्रदेश में यह 39.7 प्रतिशत व्यक्ति शराब पीते हैं तो वहीं पंजाब में 34 प्रतिशत, हरियाणा में 24.5 प्रतिशत तो वहीं चंडीगढ़ में 39.3 प्रतिशत व्यक्ति शराब का सेवन करते हैं। प्रदेश तंबाकू के उपभोग के मामले में भी उपरोक्त राज्यों में अग्रणी है प्रदेश के 40.5 प्रतिशत व्यक्ति इसका सेवन करते हैं जबकि चंडीगढ़ में 22.5 प्रतिशत तो हरियाणा में 35.8 प्रतिशत व्यक्ति इसका सेवन करते हैं। प्रदेश के सबसे बड़े स्वास्थ्य संस्थान आईजीएमसी के एक स्वतंत्र रिपोर्ट के अनुसार प्रदेश के लगभग 40 प्रतिशत युवाओं को नशे की गर्त में जाने का खतरा बना हुआ है। राजधानी शिमला में 54 प्रतिशत लड़के तो 24 प्रतिशत लड़कियां मादक पदार्थों के सेवन की आदी बन चुकी हैं।

इस रिपोर्ट में यह बात भी सामने आई 29.3 प्रतिशत विद्यार्थी सिगरेट पीते हैं। 24.45 प्रतिशत शराब का सेवन तो 20.87 प्रतिशत भांग पीने व 4.4 प्रतिशत विभिन्न तरह के कफ़ सिरप लेने, 3.4 प्रतिशत अफीम आदि अन्य मादक पदार्थों का सेवन करने के आदी हो चुके हैं। क्या यह आंकड़ें चौंकाने वाले नहीं? क्या यह सब प्रदेश के लिए चिंताजनक नहीं? नशाखोरी पर विभिन्न सरकारी व गैर सरकारी स्तोत्रों द्वारा जारी किए आंकड़ों से हमें साफ पता चलता है की हम व हमारे बच्चे आज कहां जा रहे हैं। 

प्रदेश सरकार व राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य और स्नायु विज्ञान संस्थान (निमहैन्स)  द्वारा संयुक्त रूप में 2014-15 में किए गए सर्वेक्षण की जो आई रिपोर्ट के अनुसार 10-24 वर्ष के आयुवर्ग के किशोर व युवाओं के बीच पूरे प्रदेश में यह सर्वे हुआ जिसमें 2895 व्यक्तियों से पूछे गए सवालों के जवाब के आधार पर यह रिपोर्ट बनाई गई। इनमें लड़के व लड़कियों की बराबर संख्या थी जिनमें ज्यादातर पढे लिखे व अविवाहित हैं। स्वास्थ्य संबंधी सर्वेक्षण में इनमें से 44.39% अंडर वेट,  मोबाइल पर पूरी तरह निर्भर 19.62%, दिमागी व शारीरिक थकान से 15.54% व हिंसक प्रवृत्ति के 8.19% बच्चे पाए गए। इसमें से 41.5% लड़के धुम्रपान के आदी पाए गए। जबकि शराब पीने वालों में लडकों की संख्या 7.91% थी इसी तरह इंजेक्शन के रूप में नशा लेने वाले 0.76% व अन्य सूंघने वाले नशों में 0.35% लडके संलिप्त पाए गए।

कुलमिलाकर इस रिपोर्ट के आधार पर प्रदेश का 7.36 % युवाओं की पृष्ठभूमि जीवन में कम से कम एक बार धूम्रपान करने से जुड़ी पाई गई। इसी तरह इस रिपोर्ट के अनुसार इस आयु वर्ग के 8.2% लड़के वर्तमान में धूम्रपान में संलिप्त हैं। 15-18 वर्ष के युवकों में 16.43% ऐसे हैं जो 15 वर्ष की आयु से पहले धूम्रपान शुरू कर देते हैं। 7.8% किशोर प्रदेश में शराब को कभी न कभी पी चुके हैं जबकि 5.35% वर्तमान में शराब पीते हैं। इनमें लडके 9.40% व लडकियों का अनुपात 1.07 %। इनमें 60% ऐसे हैं जिन्होंने 18 वर्ष की आयु से पहले ही शराब को पी लिया था और इनके पीछे मानसिक तनाव व दोस्तों का दबाव भी कारण है केवल शराब ही नहीं भांग इत्यादि का सेवन भी इनमें देखने को मिला। घरों में शादी या अन्य पारिवारिक समारोहों में भी किशोर शराब पीना एक फैशन और शान समझते हैं जो कि इस सर्वे में भी किशोरों ने माना। कुछेक के लिए घर की समस्याएं एक वजह थी तो कुछेक में व्यक्तिगत समस्याओं की। नशाखोरी के लिए इन किशोरों ने या तो ज्यादा जेब खर्च के लिए घर वालों पर दबाव बनाया या फिर घर से सामान चोरी कर पैसा हासिल किया वहीं इसके अलावा कुछेक ने नशे के लिए दोस्तों से भी उधार लिया। यदि किशोरावस्था में ही नशे की यह प्रवृत्ति होगी तो आगे चलकर कुछ ही वर्षों में नशे का आदी कोई भी आसानी से बन जाएगा।  
दुर्भाग्यवश हेरोइन नशा करने वालों के बीच खासी लोकप्रिय है यह वही चीज है जिसे आज कल चिट्टे के नाम से हर कोई जानता है।

इसी चिट्टे ने पंजाब ही नहीं पूरे देश में अपने पैर पसार लिए हैं आए दिन जगह-जगह छापेमारी के दौरान धरपकड़ के ऐसे बहुत से मामले रोजाना देखने सुनने को मिल रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि अपने साथ के लोगों की देखा देखी, साथियों के दबाव और पढ़ाई-लिखाई की चिंता के कारण कई बच्चे तो 11 साल की उम्र से ही नशे के लिए ड्रग्स लेना शुरु कर देते हैं। इतनी कम उम्र में नशे की तरफ जाना हमें सामाजिक पतन की तरफ ले जाने वाली बात है।  मौजूदा दौर में तो 18 वर्ष तक की आयु तक पहुंचते पहुंचते बहुत से बच्चे इसकी गिरफ्त में आ जाते हैं 18 से कम आयु का मतलब 12वीं तक स्कूली शिक्षा पूरी करते करते वह नशे के आदी होकर यहां से निकलते हैं

यह एक गंभीर चेतावनी है। बेघर बच्चों के बीच तो यह समस्या और भी गंभीर है। रिपोर्ट में पाया गया कि भारत के करीब दो करोड़ बेघर बच्चों में से 40 से 70 फीसदी किसी ना किसी तरह के ड्रग्स के संपर्क में आते हैं और इनमें से कई को तो पांच साल की उम्र से ही नशे की लत लग जाती है और ऐसे बच्चे आगे चलकर इस नशीले पदार्थों के अवैध व्यापार को खुद चलाने लग जाते हैं। ऐसा भी नहीं है कि नशा केवल गरीब व समाज से पिछड़े लोगों में ही पनपा है अब तो समाज के ऊंचे तबके के लोगों के बीच भी फैल चुका है। समाज के साधन सम्पन्न वर्ग के युवाओं में आधुनिक सिंथेटिक ड्रग ज्यादा तेजी से फैल रहा है क्योंकि यह नशा भारी कीमत अदा कर हासिल कर होता है और अमीर तबके के युवाओं को मां बाप पैसे की कोई कमी महसूस नहीं होने देते जिस कारण वह उसी पैसे को नशाखोरी में खर्च करना शुरू कर देते हैं।

भारत जैसे विकासशील देश के लिए यह एक गंभीर समस्या है। इसके परिणाम भयानक हैं। बीमारियों, हिंसा, अपराध, खून-खराबे आदि की बढ़ोतरी में योगदान करने वाली इस नशाखोरी की यदि आर्थिक और सामाजिक कीमत आंकी जाए, तो वह हजारों करोड़ में होगी। शराब, सिगरेट, ड्रग्स, गुटखा या खैनी का सेवन थोड़ी मात्रा में भी शरीर को नुकसान पहुंचाता है, लेकिन जब यह लत बन जाती है , तो स्थिति बेकाबू होने लगती है। भारत विश्व में सर्वाधिक युवा जनसंख्या वाला देश है।

इसमें भी कोई शक नहीं है कि ये युवा ही राष्ट्र का भविष्य हैं। ऐसे में उनमें इस नशाखोरी के खिलाफ एक सतत अभियान चलाने की आवश्यकता है। हम सब  इससे अनभिज्ञ होने का आडम्बर कर रहे हैं या फिर बेबस होकर इसलिए मूकदर्शक बने हुए हैं कि मेरा कौन सा सगा नशाखोरी से जुड़ा है जबकि यह भूल रहे हैं की एक न एक दिन यह जहर हमारे अपनों को कब अपने जाल में जकड़ ले कोई पता नहीं। इससे निपटने की जिम्मेदारी युवाओं के अभिवावकों के साथ समाज और सरकार की भी बनती है। 

 

 

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