मेरा दर्द न जाने कोय

मेरा दर्द न जाने कोय

 गाय सनातन संस्कृति की अनमोल धरोहर है। गाय हिंदू धर्म में केंद्र बिंदु रही है,पौराणिक कथाओं में गाय के शरीर में 33 कोटि के देवताओं का वास माना जाता रहा है।हिंदू धर्म में गाय को मां का दर्जा दिया जाता है लेकिन आज उसी गाय और गोवंश की दुर्दशा किसी से छुपी नहीं।समय का चक्र कहें या मानव की उदासीनता या फिर से प्रशासन और शासन की अनदेखी वजह कुछ भी हो

लेकिन आज गोवंश भूख और प्यास से तिल तिल कर मरने को मजबूर है।आज जगह जगह पर यह गोवंश लोगों के लिए मुसीबत का सबब बन रहे हैं।सड़कों पर इनके रहने से जहाँ एक तरफ आए दिन दुर्घटनाएं होती हैं वहीं दूसरी तरफ किसान अपनी फसलों की रक्षा के लिए अनेक कटीले तार लगाने को मजबूर है।इन्हीं कटीले तारों से घायल होकर के गोवंश सड़  कर मर रहे हैं। गाय,जो कभी मनुष्य के लिए वरदान हुआ करती थी आज वही अभिशाप बनने को मजबूर है।लोग जिस गाय को माता कहकर बुलाते थे और जिसकी पूंछ पकड़कर मोक्ष प्राप्त करने की इच्छा रखते थे वही लोग आज गाय को आवारा पशु घोषित कर चुके हैं।

कुछ संगठन गौ रक्षा के नाम पर हिंसा तक करने को आमादा हो जाते हैं लेकिन जमीनी हकीकत सेवा की आज भी कोसों दूर है।लोग सोशल मीडिया पर गौ रक्षा और गौ सेवा के नाम पर लंबे लंबे ज्ञान तो दे रहे हैं लेकिन वही लोग गायों को पालने के बजाय उन्हें आवारा घूमने के लिए छोड़ देते हैं।गौ सेवा का ज्ञान केवल किताबी रह गया है,ऐसा नहीं है कि गौ सेवा के नाम पर सरकार उदासीन है।सरकार ने अनेक गौशालाओं का निर्माण कराने का संकल्प लिया इसमें से कुछ बन भी रहे हैं और कुछ संचालित भी होने लगे लेकिन इनकी व्यवस्थाएं भगवान भरोसे ही कही जा सकती है।जितनी गौशालाओं का निर्माण हो रहा है और जितनी आवश्यकता है ऊंट के मुंह में जीरे जैसा ही है। संचालित गौशालाओं का हाल बेहाल है,वहां पशुओं को ना तो खाने का उचित प्रबंध है ना ही रहने का।यही हाल रहा तो 1 दिन 33 कोटि देवताओं को शरीर में धारण करने वाली अमृत रूपी पय दान करने वाली मोक्ष दायिनी गौ मां इतिहास का विषय ना बन जाए।

गोवंश के प्रति लोगों की उदासीनता से न केवल पारिस्थितिकी तंत्र बिगड़ेगा बल्कि भारतीय संस्कृति हिंदू धर्म के केंद्र बिंदु मानी जाने वाली गौ मां इतिहास के पन्नों में सिमट के रह जाएगी जिसके परिणाम भयावह होंगे। हम भूल रहे हैं कि हमारे आराध्य भगवान श्री कृष्ण ने 100000  गायें चरा करके गौ सेवा का अनुपम संदेश दिया था।कामधेनु जो कि समस्त दुखों का नाश करने वाली मानी जाती है गाय ही है ऐसे में जिस तरह से समाज ने गाय और गोवंश को तिरस्कृत किया है यह अत्यंत सोचनीय है।v

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