जय दधीचि ,

जय दधीचि ,

 भारतीय संस्कृति उत्सवों और महोत्सवों की संस्कृति है। पुनीत पावन  पूजनीय यह भारत की भूमि है। ये अवतारों की भूमि है ये भूमि संस्कारो की भूमि है, सारी देव सत्ता अनेकों रूपो में यहा पर  विद्यमान है भारत भूमि पर जन्म लेना ही इस बात का प्रमाण है के ईश्वर की परम कृपा हम सभी पर है तभी हम सभी भारतवासी है । ओर सबसे अच्छी बात यह है के भारत में होना ही भाग्य होता है

लेकिन भारत का होना सौभाग्य है ।कोई व्यक्ति पूरी दुनिया में कहीं भी जन्मे रहे वो अपने जीवन काल में अगर एक बार भी भारत आया हो और यहां की मिट्टी ,हवा पानी, में कुछ दिन बिताए तो यह उसके भाग्य की बात है लेकिन जो इस भूमि पर ही जन्मा हैं यही रह रहा है वो व्यक्ति सौभाग्यशाली होता है ।ओर आप और हम सभी सौभाग्यशाली है क्योंकि आप हम सभी भारतवासी है । ओर एक बात कहना चाहूंगा के भारत में जन्म लेना ओर यही पर रहना इस बात को भी प्रमाणित करता है के हम सभी उस परमेश्वर की नजदीकी में है हैं उसकी नजर में है हम उसके आंगन में है । उसकी कृपा और हमारे पूर्व पुन्यो का फल है के हम आप भारतीय है ।

भारत कि भूमी पावन ओर पवित्र भूमि है, इस भूमि पर सदियों से गंगा जमुना सहित अनेकों नदिया   अपना अमृत हमे पिला रही है ।यहां की प्रकृति को सभी ईश्वर स्वरूप मान पूजते है, यह भूमि राम कृष्ण सहित अनेकों अवतारों की भूमि है, यहां केलाश पर्वत पर आज भी शिव जी परिवार सहित विराजमान है , यही पर बद्रीविशाल है,यही पर केदार नाथ है, यही पर बाबा अमरनाथ है, बाबा महाकाल है बारह ज्योतिर्लिंगों में शिव संपूर्ण भारत में विराजित हैं ।

यही पर जगदम्बा भवानी 51 शक्तिपीठ के रूप में विराजमान है, जंहा गुरु शिष्य परम्परा आज भी है, यहां आज भी सदियों पुराने संस्कारो को पूरे मन, वचन से निभाया जाता है, यहां सभी में ईश्वर को देखा जाता है, गाय,नदिया,धरती, पर्वत,सागर,पेड़,सहित पूरे देश को पूजा जाता है यही वो देश भूमि है दुनिया में मात्र एक जहा पर मातापिता को ईश्वर की बराबरी में  पूजा जाता है।  ये वो भूमि है जहां कन्या पूजन किया जाता है यही पर बेटी के पैर धोकर उस पानी को पीकर कन्यादान किया जाता है, ये वो भूमि है जहा आने वाली बहू को लक्ष्मी का रूप मान कर प्रथम आगमन पर पूरा परिवार उसकी आरती उतारकर स्वागत कर घर में आमंत्रित करते है।

जहा बच्चा जन्म लेता है उसके पांचवे दिन  जलाशय किनारे जाकर जल देव से विनती की जाती है के है जल देव इस नव शिशु को सदैव आपने अमृत से तप्त रखना, छटे दिन  सूरज पूजा कर  सूर्य नारायण भगवान से प्रार्थना की जाती है के है नारायण इस नवशिशु को आप अपनी ऊर्जा से पोषित करना , धरती माता से विनती की जाती है के है माता इस बच्चे को भी तुम आपने द्वारा उत्पन्न अनाज से सदा धापे रखना ,यही पर चंद्र पूजन कर पति की लंबी आयु की प्रार्थना की जाती है, ओर अनेकों रीति रिवाजों को निभाया जाता है।यह भूमि ऋषि मुनियों की भूमि है जप,तप, हवन पूजन चिंतन मनन की भूमि है।

  ओर सबसे महत्वपूर्ण बात पुरे भारत के हर निवासी के ,हर समाज के लोगो  के लिए यह भी है के यह भूमि ऋषियों मुनियों की भूमि है और इसी भारत भूमि पर एक ऋषि हुए है जो महातपस्वी ,महाशक्ति, महाज्ञानी ,ओर    सर्व जगत कल्याण के लिए जिन्होंने अपनी देह को ही दान दे दी और महादानी  कहलाए  जिनको पूरी देव सत्ता और तीनों लोक दधीचि के नाम से जानते है , और शैव धर्म का पालन करने वाली गु र व समाज के सभी बंधुओ  का भाग्य है के आप  सभी उस कुल से है जिस कुल को देवगण भी  मान सम्मान  देते थे हम उसके कुल के है जिसको शैव धर्म  कहा जाता है  आज हम सभी भारतीय होकर सौभाग्यशाली तो है ही साथ ही हम दधीचि को पूजन वाले है ,दधीचि को मानने वाले है ,दधीचि जन्म महोत्सव मनाने वाले है ,हम सभी दधीचि कुल के है तो हम सभी के लिए हजारों हजारों गुना 

शोभाग्यशाली होना है,  क्योंकि हम हम ब्रह्म के अंश होने के साथ 

हम दधीचि वंश के है ,दधीचि जन्म उत्सव को मानने का सौभाग्य हम सभी गु र व समाज के लोगो को मिला है , 

हम उन दधीचि जी का जन्म उत्सव मना रहे है जो दक्ष प्रजापति के विशाल यज्ञ के आयोजन के मुख्य पुरोहित थे ,

जो शिवजी की बारात के प्रमुख प्रभारी थे, जिनके द्वारा सती के शरीर के अंगों को 51 शक्तिपीठ के रूप में इस देश में स्थापित किया था,

जिनके आश्रम में भगवान गणेश जी ओर कर्तिकजी शिक्षा ग्रहण करते थे, जिन्होंने महामृत्युंजय मंत्र ॐ त्र्यंबकं यजामहे ,,,,

 महामंत्र को सिद्ध कर लिया था, 

हम उन दाचिजी का जन्मोत्सव मना रहे है जिन्होंने अनेकों सिध्दियां प्राप्त कर अपार शक्ति अपने शरीर में समाहित कर लिथी , जिनके शरीर की रोम रोम शक्ति पुंज था ,  ओर एक सहज निवेदन पर लोक कल्याण के लिए अपने शरीर को दान देने की हामी भर दी और अपनी सारी शक्तियों को अपने शरीर की हड्डियों में उतार कर देह दान कर दिया और उन हड्डियों से एक शस्त्र बना देवराज इन्द्र ने वृता सुर नामक असुर का वध किया था

और दधीचि के बाद कोई भी ऐसा देह दानी आज तक नहीं हुआ है। हम सभी  हर वर्ष दधीचि जन्म उत्सव को मना कर परम शिव भक्त दधीचि महाराज और महादेव का आशीष प्राप्त कर अपने जीवन का कल्याण कर रहे है । 

 

हर हर महादेव

जय दधीचि

लेखक राजेश शर्मा उज्जैन

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