बेटी पढाओ, बेटी बचाओ 

बेटी पढाओ, बेटी बचाओ 

यह नारा बहुत ही जोर शोर से शुरू हुआ. आज कितने प्रतिशत लोग इसे मानते है. इसका आंकड़ा हमारे पास नहीं है. जिसके कारण हम अभी कुछ भी कह पाने में असमर्थ है. परंतु आज ही बेटी पढाओ, बेटी बचाओ नारे के तहत जो खबर उत्तराखंड से आ रही है. वह आपको भी सोचने पर मजबूर कर देगी.

इस आधुनिकीकरण में विज्ञान ने कितनी तरक्की की है. 

बावजूद इसके आज भी बेटियों के पांव में रुढ़िवादी परम्परा की बेडिया पड़ी हुई है. 

आज भी बेटियां उसी प्रकार अपनी स्वतंत्रता से जीने के लिय संघर्षरत है. जैसे हमने अंग्रेजों की गुलामी से संघर्ष करके  स्वतंत्रता पाई थी. 

उसके पश्चात भी हम गर्व से कहते है. देश में महिला सशक्तिकरण हो रहा है. 

क्या वास्तव में यही महिला सशक्तिकरण है? 

जहा नेपाल सीमा से लगे उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले के गांव में महिलाएं अपने जीवन को संवारने के लिए संघर्ष कर रही है. क्या यही महिला सशक्तिकरण है? 

जहा बेटियां विद्यालय पढ़ने जाती है. कहते है, कहते रहेँगे. 

पढ़ना लिखना सीखो ये भूख से मरने वालों॥ 

पढ़ना लिखना सीखो मेहनत करने वालों॥ 

क ख ग पढ़ना पहचानो अलिफ़ को पढ़ना सीखो 

अ आ इ ई को हथियार बना के लड़ना सीखो॥ 

परंतु विद्यालय जाते समय रास्ते पर मंदिर होने की वजह से लड़कियों को महावारी के दौरान 5 दिन विद्यालय जाने से रोका जाता है. 

क्या यही स्वतंत्र भारत का बेटियों के लिय चलाया गया अभियान है. बेटी पढाओ, बेटी बचाओ?   जरा सोचिय? 

यह विद्यालय के प्रबंधन की कैसी मानसिकता है? 

जो बेटियों को महावारी के कारण 5 दिन विद्यालय आने से रोकता है. 

जरा इस विषय पर अधिक से अधिक लोगों को जानकारी दे. यह महावारी है, महामारी नहीं. 

इस प्रक्रिया के द्वारा महिलाओं के शरीर से रक्त साफ होता है. 

जो प्रक्रिया प्रकृति की ही देन है. जिससे महिलाओं का शरीर स्वस्थ बना रहता है. वह किसी के लिए आपदा कैसे हो सकता है? 

जरा सोचिए? 

क्या आज भी संकीर्ण सोच, संकीर्ण मानसिकता और रुढ़िवादी परम्पराए हमें और हमारे अपनों की तरक्की में बाधा तो नहीं है. 

इतिश्री

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