अत्यधिक संघर्षपूर्ण जीवन रहा देश के प्रथम ट्रांसजेण्डर जज का

अत्यधिक संघर्षपूर्ण जीवन रहा देश के प्रथम ट्रांसजेण्डर जज का

 डॉ.दीपकुमार शुक्ल (स्वतन्त्र पत्रकार) 

मंजिलें उन्हीं को मिलती हैं जिनके सपनों में जान होती है। पंख से कुछ नहीं होता हौंसलों से उड़ान होती है।। उत्साह और लगन के साथ किये जाने वाले सतत प्रयास व्यक्ति को सदैव बुलन्दियों तक पहुंचाते हैं, परिस्थितियां चाहे जितनी भी विपरीत क्यों न हों। एक ट्रांसजेण्डर के जीवन में संघर्ष की शुरुआत उसी दिन से हो जाती है

जब उसके ट्रांसजेण्डर होने की जानकारी परिवार और समाज को होती है। उसका सर्वाधिक समय समाज में अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ने में ही व्यतीत होता है। इसी संघर्ष के चलते अनेक किन्नरों के सपने बीच में ही दम तोड़ देते हैं। अपना अस्तित्व बनाये रखते हुए

रोटी, कपड़ा और मकान के लिए समूह बनाकर भीख मांगना ही उनका पेशा बन जाता है और समाज में रहकर भी वे समाज की मुख्य धारा से पूरी तरह पृथक रहते हैं। ताली बजाकर अपनी उपस्थिति दर्ज कराना, लोंगों का मनोरंजन करना और दुआएं देकर बख्शीश प्राप्त करना ही एक ट्रांसजेण्डर की दिनचर्या बन जाती है।

लेकिन जब कोई व्यक्ति मुश्किलों को ही सीढ़ियाँ बना ले तो फिर मंजिल पाने से भला उसे कौन रोक सकता है। ऐसा ही कुछ कर दिखाया देश के तीन ट्रांसजेण्डर्स जोयिता मण्डल, विद्या बालन (काम्बले) और स्वाति बिधान बरुआ ने। जीवन की अनगिनत विपरीत परिस्थितियों से संघर्ष करते हुए

ये तीनों ही ट्रांसजेण्डर आज लोक अदालत के न्यायाधीश पद पर आसीन हैं। जो अपने आप में न केवल अप्रतिम उदाहरण है बल्कि इस समुदाय के लिए एक नयी रोशनी भी है। पश्चिम बंगाल की जोयिता मण्डल को देश का पहला ट्रांसजेण्डर न्यायाधीश माना जाता है।

क्योंकि इसके पूर्व किसी ट्रांसजेण्डर के न्यायाधीश बनने का प्रमाण देश तो क्या पूरी दुनियां में उपलब्ध नहीं है। इसलिए इन्हें विश्व के प्रथम ट्रांसजेण्डर न्यायाधीश के रूप में भी प्रतिष्ठा प्राप्त हुई है। देश के दूसरे और तीसरे ट्रांसजेण्डर न्यायाधीश के रूप में क्रमशः महाराष्ट्र की विद्या बालन (काम्बले), तथा असम की स्वाति बिधान बरुआ का नाम लिया जाता है। 

31 वर्षीय जोयिता मण्डल को पश्चिम बंगाल के दिनाजपुर जिले में स्थित इस्लामपुर की लोक अदालत में 8 जुलाई 2017 को न्यायाधीश के पद पर नियुक्ति प्राप्त हुई थी। वह “नयी रोशनी” नाम से एक संस्था का भी सं्चालन करती हैं। कोलकाता में जन्मी जोयिता मण्डल बचपन से ही स्वयं को लड़के की बजाय

लड़की के रूप में अधिक सहज महसूस करती थीं। लेकिन घर के सदस्य इन्हें लड़का मानते थे और इनका नाम ज्वयंत रखा था। बचपन से ही पढ़ाई में तेज जोयिता मण्डल ने जब प्राइमरी और माध्यमिक स्तर तक की शिक्षा पूर्ण करके कलकत्ता विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया तो इन्हें सहपाठी छात्रों की फब्तियों का जमकर सामना करना पड़ा। बात जब बर्दाश्त से बाहर हो गई तो इन्होंने पढ़ाई ही छोड़ दी। 

जोयिता मण्डल ने एक साक्षात्कार में बताया कि जब वह 18 वर्ष की थीं तब दुर्गा पूजा के समय उनका मन लड़कियों की तरह सजने संवरने का हुआ और वह ब्यूटी पार्लर जा पहुँचीं। लेकिन जब वह उसी रूप में घर पहुंची तो घरवालों ने इनको इतना पीटा

कि वह कई दिनों तक बिस्तर से नहीं उठ पायीं। घरवाले इन्हें डॉक्टर के पास भी इस भय से नहीं ले गये कि कहीं इनके किन्नर होने का राज न खुल जाए। घर और समाज से मिली उपेक्षा से त्रस्त आकर जोयिता ने वर्ष 2009 में घर छोड़ दिया और दिनाजपुर आ गईं।

तब इनके पास एक भी रूपया नहीं था। बस अड्डे और रेलवे स्टेशन पर रातें व्यतीत कीं। होटल वाला खाना तक नहीं खिलाता था, वह पैसे देकर कहता कि हमें दुआ देकर चले जाओ। कुछ दिनों तक काल सेन्टर में नौकरी की मगर वहां भी इनका मजाक उड़ाया गया।

हर तरफ से मिली उपेक्षा के बाद आखिरकार जोयिता ने किन्नरों के डेरे में जाने का निर्णय लिया और किन्नरों के साथ नाचने गाने का दौर शुरू हो गया। लेकिन पढ़ाई के प्रति इनकी रूचि समाप्त नहीं हुई। अतः इन्होंने मुक्त शिक्षा प्रणाली के तहत शिक्षा ग्रहण करना शुरू कर दिया।

इसी के साथ किन्नरों तथा समाज के असहाय लोगों के लिए कुछ करने का जज्बा भी इनके अन्दर जागृत हुआ। अतएव वर्ष 2010 में किन्नरों के अधिकारों की लड़ाई लड़ने के लिए जोयिता ने “नयी रोशनी” नाम से एक संस्था बनायी। यह संस्था निराश्रित बुजुर्गों के लिए आश्रय बनाने का काम भी करने लगी।

इस संस्था के माध्यम से जोयिता मण्डल ने रेड लाईट एरिया में रहने वाली महिलाओं तथा उनके बच्चों के राशन कार्ड व आधार कार्ड बनवाने तथा उन्हें पढ़ाई के लिए प्रेरित करने का काम भी शुरू कर दिया। इस तरह से जोयिता ने समाज सेवा को एक अभियान की तरह शुरू किया।

जोयिता मण्डल कहती हैं कि उन्होंने कभी हालात से हारना नहीं सीखा, वह हर मुसीबत को अपने लिए सफलता का नया मार्ग मानती हैं। उन्हें इस बात का कतई अफसोस नहीं है कि वह किन्नर हैं। बतौर जोयिता जिस शहर में कभी कोई मुझे भीख भी नहीं देता था, उस शहर में जज के रूप में सफेद कार में बैठकर जब मैं निकलती हूं

तो अभिवादन करने वालों की लाइन लग जाती है। यह देखकर अच्छा भी लगता है और यह भी सोचती हूं कि ऐसा ही प्यार और सम्मान मेरे जैसे हर इंसान को मिलना चाहिए। इसलिए अब मेरी कोशिश समाज में बाकी किन्नरों को भी सम्मानजनक स्थान दिलाने की है। गुजारिश है कि हमें भी दूसरे लोगों की तरह मौके दिए जाएं।

हम भी बहुत अच्छे जज, वकील, इंजीनियर, प्रोफेसर, साइंटिस्ट, डॉक्टर्स बन सकते हैं। क्योंकि बाकी कुछ होने से पहले हम लोग इंसान हैं। क्या बिडम्बना है कि हम ट्रांसजेंडर को शुभ मानते हैं, उनकी दुआएं भी लेते हैं मगर इज्जत नहीं देते हैं। अपने न्यायाधीश बनने के बारे में जोयिता मण्डल ने बताया

कि डिस्ट्रिक लीगल अथॉरिटी के एडिशनल जज सुब्रतो पोली ने हमें लोक अदालत के जज के रूप में एक अवसर दिया है। विधिक सहायता प्राधिकरण के सचिव द्वारा गठित लोक अदालत की तीन सदस्यों वाली पीठ में एक मौजूदा या फिर सेवानिवृत्त न्यायाधीश, एक वकील और एक सामाजिक कार्यकर्ता होता है।

दिनाजपुर के जिला जज सुब्रतो पोली के प्रयास से जोयिता मण्डल को समाजसेवी मानते हुए न्यायाधीश के रूप में नियुक्त किया गया है। 8 जुलाई 2017 को न्यायाधीश के रूप में नियुक्ति प्राप्त करने के बाद जोयिता मण्डल ने कहा था कि यह न केवल भारत बल्कि पूरे विश्व का प्रथम उदाहरण है कि एक ट्रांसजेण्डर को न्यायाधीश बनाया गया है।

डॉ.दीपकुमार शुक्ल (स्वतन्त्र पत्रकार )
125/5ए, योगेन्द्र विहार, खाड़ेपुर, नौबस्ता, कानपूर - 208021
 मो. 9450329314 

    
 

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