हिंदुस्तान की रगों में हमेशा ज़िंदा रहेंगे सरदार भगत सिंह 

हिंदुस्तान की रगों में हमेशा ज़िंदा रहेंगे सरदार भगत सिंह 

देश की आज़ादी के लिए अपनी जवानी और जिंदगानी क़ुर्बान करने का जज़्बा तो हज़ारों दीवानों में था किंतु उनमें से एक ऐसा मतवाला था जिसने अपनी शहादत की स्क्रिप्ट ख़ुद तैयार की और देश में पनप रही आज़ादी की चिंगारी को धधकती ज्वाला बनाने के लिए हँसते हँसते फाँसी के फंदे पर झूल गया। भगत सिह का जन्म पंजाब प्रांत में लयालपुर जिले के बंगा गाँव में 28 सितंबर 1907 को पिता किशन सिंह और माता विद्यावती के घर हुआ। बचपन से ही मेधावी बालक भगत सिंह में राष्ट्रीयता कूट कूट कर भरी थी, तभी तो उन्होंने अंग्रेज़ों के स्कूल में पढ़ने से मना कर आर्य समाज के दयानंद आंग्लो विद्यालय में दाख़िला लिया। 

जब भगत सिंह १२ वर्ष के हुए तो उसी दौरान अमृतसर में 13 अप्रैल 1919 को हुए जलियांवाला बाग में निर्मम हत्याकांड की घटना हुई, जिसने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया। रौलेट एक्ट के विरोध में स्वर्ण मंदिर के निकट स्थित जलियाँवाला बाग़ में आयोजित सभा में ब्रिटिश अधिकारी जनरल डायर अपने सिपाहियों के साथ पहुँचा, और उसके आदेश पर सैकड़ों बेगुनाहों को निर्ममता से गोलियों से भून दिया गया। अधिकारिक रूप से ब्रिटिश राज के अभिलेख में २०० लोगों के मारे जाने की पुष्टि होती है, अमृतसर के डिप्टी कमिशनर कमिश्नर कार्यालय में ४८४ शहीदों की सूची है, जबकि जलियाँवाला बाग़ में कुल ३८८ शहीदों की सूची है ।

अनाधिकारिक आँकड़ों के अनुसार १००० से अधिक लोग इस घटना में मारे गए।  

इस घटना की सूचना मिलते ही 12 साल के भगत सिंह अपने स्कूल से कई मील पैदल चलकर जलियांवाला बाग पहुंच गए थे।जलियांवाला बाग हत्याकांड ने भगत सिंह की सोच पर गहरा प्रभाव डाला और उन्हें ऐसा क्रांतिकारी बनाया, जिसने आगे चलकर देश के युवाओं के दिलों में आज़ादी का जुनून भर दिया । १२ साल की खेलने-पढ़ने की नन्हीं सी उम्र में हिंदुस्तान की माटी में जन्में इस सपूत ने जलियाँवाला बाग़ की ख़ून से सनी हुई मिट्टी को माथे लगाकर अंग्रेज़ों को देश से भगाने का संकल्प लिया।

उस छोटे से बालक के मानस पटल पर  ऐसा गहरा असर पड़ा कि एक बार अपने पिता से उन्होंने पूछा कि आम का बीज बोने से क्या होगा तो पिता ने कहा कि आम का पेड़ बनेगा और ढेर सारे आम फलेंगे तो भगत सिंह बोले बंदूक बो दीजिये, जब बहुत सारी बंदूके फैलेंगी तो अंग्रेजों को भगाने के काम आएंगी।

१६ साल के होने पर भगत सिंह की माँ एवं परिवार के सदस्यों द्वारा उनकी शादी तय की जाने 

लगी, किंतु भगत सिंह के दिल और दिमाग़ में तो कुछ और ही चल रहा था, अपनी भारत माँ बेड़ियों से आज़ाद कराने की भावनायें हिलोरें ले रही थी, और जैसे जैसे वे जवान हो रहे थे, उनके संकल्प और बलवती होते चले गए । शादी से बचने और अपने संकल्पों को पूरा करने के लिए भगत सिंह घर छोड़कर कानपुर भाग गए अपने पीछे जो खत छोड़ गए, उस ख़त में उन्होंने लिखा कि- “मैंने अपना जीवन देश को आजाद कराने के बड़े उद्देश्य के लिए समर्पित कर दिया है। गुलाम हिंदुस्तान में अगर मेरी शादी होगी तो सिर्फ मौत से होगी।”

1920 में शांति और अहिंसा में विश्वास रखने वाले महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन की शुरुआत की, पूरे देश में विदेशी सामानों की होली जलाना और बहिष्कार किया जाना शुरू हुआ, भगत सिंह भी इस आंदोलन में कूद पड़े। आंदोलन की सफलता से खुश होकर भगत सिंह आज़ादी मिलने वाली है आज़ादी कह कर खूब नाचते गाते थे, किंतु महात्मा गांधी ने जब 1922 में चौरीचौरा कांड से आहत होकर असहयोग आंदोलन को खत्म करने की घोषणा की तो भगत सिंह का अहिंसावादी विचारधारा से मोहभंग हो गया

उन्होंने 1926 में देश की आजादी के लिए नौजवान भारत सभा की स्थापना की। काकोरी कांड में राम प्रसाद बिस्मिल सहित ४ क्रांतिकारियों को फाँसी व १६ अन्य को कारावास की सज़ाओं से भगत सिंह बहुत आहत हुए और चंद्रशेखर आजाद के साथ उनकी पार्टी हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन से जुड़ी इसके बाद इस संगठन का नाम हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन हो गया। इस संगठन का प्रमुख उद्देश्य सेवा, त्याग और पीड़ा झेल सकने वाले नवयुवक तैयार करना था ।धीरे धीरे आजादी का जुनून परवान चढ़ने लगा, अंग्रेज़ी हुकूमत के ख़िलाफ़ बग़ावत और विद्रोह की आवाज़ बुलंद होने लगी ।

भगत सिंह और उनके साथियों ने १७ दिसम्बर १९२८ लाहौर में सहायक पुलिस अधीक्षक रहे जे०पी० सांडर्स को गोली मारकर लाला लाजपत राय की मौत का बदला लिया इस कार्यवाही में चंद्रशेखर आजाद ने उनकी भरपूर सहायता की। 

भगत सिंह को पूंजीपतियों की मजदूरों के प्रति शोषण की नीति पसंद नहीं आती थी । 8 अप्रैल 1929 को सेंट्रल असेम्बली में पब्लिक सेफ्टी और ट्रेड डिस्प्यूट बिल पेश हुआ। अंग्रेजी हुकूमत की अंधी बहरी सरकार को अपनी आवाज सुनाने और अंग्रेजों की नीतियों के प्रति विरोध प्रदर्शन के लिए भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने असेम्बली में सुरक्षित स्थान पर बम फोड़कर धमाका किया और पर्चे फेंककर अपनी बात सरकार के सामने रखी। दोनों चाहते तो भाग सकते थे लेकिन भारत के निडर पुत्रों ने हंसत-हंसते आत्मसमर्पण कर दिया।जेल जाने का प्लान भगत सिंह ने ख़ुद बनाया था

ताकि अदालत में अपनी बातों को रख मीडिया के माध्यम से पूरे देश में आज़ादी के क्रांति की हवा फैला सकें । भगत सिंह की पढ़ने - लिखने में बहुत रुचि थी, कार्ल मार्क्स से वे बहुत प्रभावित थे और उन्हीं की विचारधारा को वे आगे बढ़ा रहे थे ।जेल में भी खाने और तरह तरह की असुविधाओं को लेकर उन्होंने भूख हड़ताल कर दी, आमरण अनशन कर दिया, अंग्रेज़ों द्वारा लाख ज़ोर ज़बरदस्ती करने पर भी अपनी धुन के पक्के भगत सिंह ने अपना अनशन नही तोड़ा, उनके एक साथी यतीन्द्र दास ने तो भूख हड़ताल में अपने प्राण ही त्याग दिए, उनकी दृढ़ इच्छाशक्ति के आगे अंग्रेज़ी हुकूमत नतमस्तक हो गई, और ६४ दिन के ऐतिहासिक अनशन के बाद आख़िरकार भगत सिंह की सारी माँगे मान ली गई ।

अपनी ज़िद, अपनी शर्त, अपनी सनक पर ज़िंदगी जीने वाले सरदार को बिना किसी फेसबुक, वाट्सअप और ट्विटर के हिन्दुस्तान ने सर आखों पर बिठा लिया था। उनकी फैन फॉलोइंग इतनी थी कि उनके विचार सुनने, उन्हें देखने और मिलने के लिए युवा बौराये रहते थे ।सांडर्स हत्याकांड के लाहौर षड्यंत्र केस में भगत सिंह, राजगुरू और सुखदेव को फांसी की सजा हुई और 24 मई 1931 को फांसी देने की तारीख नियत हुई ।

फाँसी की सज़ा सुनाए जाते ही लाहौर में धारा १४४ लगा दी गई । देश में इस फाँसी की सज़ा को रोकने के कई प्रयास हुए, किंतु भगत सिंह ख़ुद भी नहीं चाहते थे कि उनकी सज़ा माफ़ हो। फांसी से एक दिन पहले भगत सिंह की माँ जेल में मिलने आई, उनकी आँखों में आंसू थे। भगत सिंह ने अपनी मां से कहा तू भगत सिंह की माँ है तू रोयेगी तो लोग क्या कहेंगे।उनकी माँ ने कहा बेटा हर माँ की तरह मैंने में ढेर सारे सपने देखे थे तू धीरे धीरे बड़ा होता गया और मेरे सपने भी बड़े होते गए। मेरा भी सपना था की तू एक दिन घोड़ी चढ़ेगा। मेरे लिए बहू लेकर आएगा लेकिन अब तू जा रहा है रहा है। मेरे सपने टूट रहे हैं तो मेरी आँखे छलछला आयीं 

भगत सिंह ने माँ के आंसू पोछते हुए कहा हुए कहा 

तू न रोना कि तू है भगत सिंह की माँ 

मर के भी लाल तेरा मरेगा नहीं

घोड़ी चढ़कर तो लाते हैं दुल्हन सभी 

हंस के फांसी तो कोई चढ़ेगा नहीं।

इतिहास गवाह है हँसते हँसते फाँसी चढ़ने की बात आने पर सबसे पहले भगत सिंह का नाम आता है ।देश में भगत सिंह की फाँसी के ख़िलाफ़ मुखर होती आवाज़ को देखकर अंग्रेज़ी हुकूमत ने नियत तारीख से 11 घंटे पहले ही 23 मार्च 1931 को उनको शाम साढ़े सात बजे सुखदेव और राजगुरु के साथ फांसी पर लटका दिया । फाँसी पर जाने से पहले वे लेनिन की जीवनी पढ़ रहे थे और जब उन्हें सूचना दी गई कि उनके फाँसी का वक़्त आ गया है तो उन्होंने कहा था- ठहरिए पहले एक क्रांतिकारी दूसरे क्रांतिकारी से मिल तो ले।

फिर एक मिनट बाद किताब छत की ओर उछाल कर बोले - ठीक है अब चलो।और आज़ादी के इन दीवानों ने इंक़लाब ज़िंदाबाद और वन्दे मातरम के जयघोष लगाते हुए, मेरा रंग दे बसंती चोला गाते हुए हँसते हँसते फाँसी के फंदे को अपने गले में डाला सदा सर्वदा के लिए अमर हो गए ।

मौत से पहले इन देशभक्तों ने गले लगकर भगवान से इसी देश में पैदा करने की गुजारिश की थी ताकि इस मिट्टी की सेवा करते रहें। जिस दिन भगत सिंह और बाकी शहीदों को फांसी दी गई थी। उस दिन लाहौर जेल में बंद सभी कैदियों की आंखें नम हो गईं थी,  यहां तक कि जेल के कर्मचारी और अधिकारी के भी हाथ कांप गए थे धरती के इस लाल के गले में फांसी का फंदा डालने में। अपने इंक़लाबी तेवर, आज़ादी के लिए जुनून और देश के लिए प्राणों की आहुति देने वाले अमर शहीद सरदार भगत सिंह हिंदुस्तान की रगो में आज भी ज़िंदा है और हमेशा ज़िंदा रहेंगे। 

जय हिंद ।

डा० प्रवीण सिंह ‘दीपक’

स्वतंत्र लेखक

अमेठी

 

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