आचार्य पं.राम आशीष शुक्ल के मुख से सीता हरण और शबरी का प्रंसग सुन भाव विभोर हुए श्रोता 

आचार्य पं.राम आशीष शुक्ल के मुख से सीता हरण और शबरी का प्रंसग सुन भाव विभोर हुए श्रोता 

कानपुर,

डॉ.दीपकुमार शुक्ल| शहर के दक्षिण क्षेत्र में स्थित वसुधा विहार, जरौली में चल रही  रामकथा के 8वें दिन आचार्य पं.राम आशीष शुक्ल के मुख से सीता हरण तथा शबरी का मार्मिक प्रसंग सुनकर श्रोतागण आनंदातिरेक के प्रवाह में निरन्तर बहते रहे| इस स्थान पर रामकथा का यह 22वाँ वर्ष है|

शहर के दक्षिण क्षेत्र में स्थित वसुधाविहार, जरौली फेस-1 में श्री राम सत्संग व श्री रामलीला समिति द्वारा नौ दिवसीय रामकथा तथा अन्त में दो दिवसीय रामलीला का आयोजन बिगत 21 वर्षों से प्रतिवर्ष कराया जाता है| इस वर्ष 22वाँ आयोजन हो रहा है|

आयोजन समिति के पदाधिकारी प्रबोध मिश्र, संजय वाजपेयी, राजेश तिवारी, अलोक मिश्र, प्रतीक अवस्थी, राजनारायण शुक्ल, ओमकुमार त्रिपाठी, विशाल सिंह, अरविन्द मिश्र तथा सुशील अवस्थी ने बताया कि सायं 4 बजे के पूर्व ही कथा पाण्डाल में श्रोताओं की भीड़ जुटने लगती है और अन्त तक पूरा पाण्डाल श्रोताओं से खचाखच भर जाता है| आज के प्रंसग में आचार्य जी ने बताया कि चित्रकूट से पंचवटी पहुंचे श्रीराम के स्वरुप पर  रावण की बहन सूर्पणखा मोहित हो गई

और उनके समक्ष विवाह का प्रस्ताव रख दिया| जिसे भगवान राम ने यह कहते हुए अस्वीकार कर दिया कि मेरा विवाह तो हो चुका है तुम  चाहो तो हमारे छोटे भाई लक्ष्मण से पूँछ लो वह अभी अविवाहित है| तब सूर्पणखा लक्ष्मण के पास विवाह का प्रस्ताव ले कर गई| लक्ष्मण ने इसे  भगवान का मनोविनोद समझकर सूर्पणखा को यह कहकर वापस श्रीराम के पास भेज दिया कि मैं तो उनका दास हूँ| हमारे साथ विवाह करके दासी बनोगी और हमारे भईया से यदि विवाह करोगी तो महारानी बनोगी

| वह कौशलपुर के राजा हैं| वह भी सामर्थ्यवान राजा हैं| सूर्पणखा पुनः श्रीराम के पास गई| उन्होंने उसे पुनः लक्ष्मण के पास भेज दिया| इससे वह क्रोधित हो गई और सीता को अपनी बाधा समझ कर उनके ऊपर आक्रमण कर दिया| तभी श्रीराम का संकेत पाकर लक्ष्मण ने उसके नाक और कान काट दिए|

आचार्य जी ने कहा कि सूर्पणखा राम को तो पाना चाहती थी, संसार में आने वाला प्रत्येक जीव राम को पाना चाहता है| परन्तु सूर्पणखा राम को सीता के बिना पाना चाहती थी| सीता भक्ति का प्रतीक हैं और भक्ति के बिना भला कोई भगवान को कैसे पा सकता है| उसके बाद खर-दूषण के साथ श्रीराम का भयकर युद्ध होता है|

श्रीराम के हांथों दोनों का वध हो जाता है| तब सूर्पणखा रावण के पास पहुंचकर उसे सारा समाचार सुनाती है| तब रावण मारीच को साथ लेकर पंचवटी पहुंचता है| मारीच सोने का मृग बनकर आश्रम के चारो ओर विचरने लगता है| सीता उसे देखकर उसका शिकार करने के लिए श्रीराम को प्रेरित करती हैं|

श्रीराम उसके पीछे भागते हैं, वह उन्हें आश्रम से दूर ले जाने में सफल होता है| परन्तु मारा जाता है| मरने से पूर्व वह श्रीराम की आवाज में सीता और लक्ष्मण को पुकारता है| उसकी ध्वनि सुनकर सीता सशंकित हो जाती हैं और जबरन लक्ष्मण को भेज देती हैं| अवसर देखकर रावण सीता का हरण कर लेता है|

जटायु रावण को रोकने का प्रयास करते हैं|  रावण से जटायु का भयंकर युद्ध होता है| अन्त में जटायु रावण के हाथों घायल होकर भूमि पर गिर पड़ते हैं और रावण सीता को लेकर चला जाता हैं| मारीच का वध करके लौटे श्रीराम को लक्ष्मण आते हुए दिखाई देते हैं| श्रीराम लक्ष्मण को देखकर सीता को लेकर आशंका से ग्रसित हो जाते हैं|

आश्रम पहुँचने पर उनकी आशंका सच निकलती है| सीता को खोजते हुए उन्हें घायल अवस्था में जटायु पड़े मिलते हैं| जटायु उन्हें सारा समाचार बताकर अपने प्राण त्याग देते हैं| उसके बाद श्रीराम और लक्ष्मण सीता को खोजते हुए शबरी के आश्रम में पहुँचते हैं| शबरी का जीवन परिचय देते हुए आचार्य जी ने  श्रीराम से उनका संवाद बड़े ही मार्मिक ढंग से सुनाया जिसे सुनकर सभी श्रोता भावविभोर हो गए| आचार्य जी के साथ हारमोनियम पर मुकेश त्रिपाठी तथा तबले पर ज्वाला महाराज संगति करते हैं| 

आचर्य पं.राम आशीष शुक्ल मूल रूप से बाँदा जनपद के भिड़ौरा ग्राम के निवासी हैं और विगत लगभग बयालीस वर्षों से वह श्रीरामकथा और श्रीमद्भागवत कथा वक्ता के रूप में प्रतिष्ठित हैं| वह ख्यातिप्राप्त परशुराम अभिनेता भी रहे हैं| सन 1977 में 21 वर्ष की आयु में आचार्य जी ने परशुरामी प्रारम्भ की थी और परशुराम अभिनेता के रूप में अपना एक अलग स्थान बनाते हुए वर्ष 2013 में अभिनय से सन्यास ले लिया|

स्वर, स्वरुप और ज्ञान हर दृष्टि से वह परशुराम अभिनय के लिए उपयुक्त पात्र रहे हैं| वर्तमान के अनेक परशुराम अभिनेता उनकी शैली की नक़ल करने का प्रयास करते हैं परन्तु पूर्ति कोई नहीं कर पाता है|       

 

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