विदिशा में मुनित्रय के सानिध्य में मना प्रातःकाल भगवान महावीर का निर्वाण महोत्सव, दौपहर में हुई गौतमगणधर की पूजा एवं मंगल आरती,चातुर्मास का हुआ निष्ठापन, घर घर पहुंचे उत्साह के साथ मंगलकलश

विदिशा से शोभित जैन की रिपोर्ट

विदिशा में मुनित्रय के सानिध्य में मना प्रातःकाल भगवान महावीर का निर्वाण महोत्सव, दौपहर में हुई गौतमगणधर की पूजा एवं मंगल आरती,चातुर्मास का हुआ निष्ठापन, घर घर पहुंचे उत्साह के साथ मंगलकलश ।

       विदिशाः संत शिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज के परम साधक शिष्य मुनि श्री अभयसागर जी, मुनि श्री प्रभातसागर जी,  मुनि श्री पूज्यसागर जी महाराज के सानिध्य में अषाढ़ सुदी १४ को चातुर्मास कलशस्थापना शीतलधाम पर अरिहंतविहार मंदिर के लिये हुई थी, उसका निष्ठापन धूमधाम के साथ भगवान महावीर के निर्वाण महोत्सव के साथ दीपमालिका पर्व पर पूर्ण हो गया! इस अवसर पर चातुर्मास स्थापनाकर्ता सभी पांचों डाक्टर परिवारों का स्वागत करते हुये श्री सकल दि. जैन समाज, श्री अरिहंतविहार मंदिर टृस्ट, श्री शीतलविहार न्यास एवं चातुर्मास समिती ने  सभी का स्वागत करते हुये चातुर्मास कलश भेंट किये!  समाज के द्वारा सभी पांचों परिवारों की घोडा़ वग्गी पर शोभायात्रा निकाल कर उनके निवास स्थानों तक पहुंचा कर आऐ!दौपहर में मुनित्रय के सानिध्य में एवं वाल ब्र. श्री मुकेश भैयाजी अशोकनगर के निर्दैशन में दीपावली पूजन ऋद्धीसिद्धि प्रदायक श्री गौतमगणधर स्वामी की पूजन एवं आरती संपन्न हुई! जिसमें वडी़ संख्या में भक्तों ने भाग लिया!इस अवसर पर शांतीधारा मुनि श्री अभयसागर जी ने समाज राष्ट्र के प्रति सुख शांति और वैभव की कामना के साथ की! मुनि श्री पूज्यसागर जी महाराज ने कहा कि आज का यह दृश्य कैसा लग रहा है? जो सामुहिक पर्व मनाया है,  "जिंदगी वहूत खूव सूरत है, लेकिन इसे समझने की जरुरत है,न समझो तो शैतान का घर हैं, समझो तो भगवान की मूरत हैं!" मुनि श्री ने कहा कि जब आप कोई अच्छा कार्य कर लेते हैं, तो आप लोगों को कितना अच्छा लगता हैं? मुनि श्री ने कहा कि जैसे आप एक वार आचार्य गुरूदेव विद्यासागरजी महाराज के एक वार दर्शन कर लिये फिर उनका चित्त दूसरी ओर नहीं लगता उसी प्रकार हे भगवन् आपके दर्शन के उपरांत हमारा मन कंही और नहीं लगता! मुनि श्री ने कहा कि आज से वास्तव में आप लोगों का नया वर्ष प्रारंभ हुआ हैं! वीर निर्वाण महोत्सव २०४६ वां वर्ष प्रारंभ हो रहा हें! उन्होंने कहा कि दौज की पूजा तराजू वांट फीता की या दुकान की देहरी की नहीं होती जंहा पर पुण्यात्मा जीव होता हैं, उनके चरणों में अपना सिर झुकाने से आपका पुण्य वड़ता हैं! मुनि श्री ने कहा आप अपनी दुकान को, मंगल करो मंगल करने को मना नहीं मुनि श्री कहते हें कि जो गंदोधक आपने वनाया हें, उस गंधोदक को आप अपने प्रतिष्ठान वांट तराजू से लगाकर शुद्ध कर लैना, मुनिश्री ने कहा कि न तो तो तिजोरी साथ देती हें, न वह धन  साथ देता हैं, जो आपके पास  पुण्य होता हें, वह पुण्य आपका साथ देता हैं! मुनि श्री ने कहा कि आपत्तियां तो आती हैं और आएंगी लेकिन जो व्यक्ती धर्म के साथ जुडा़ रहता हैं उसके पास आपत्तियां आती तो हैं लेकिन वह धर्मात्मा व्यक्ति के पुण्य को देख भाग खडी़ होती हैं! मुनि श्री ने कहा कि" गृहस्थ पाप की कमाई करने में कोई मौका नहीं चूकता लेकिन आप लोगों ने यह जो सामुहिक दीपावली पर्व मनाया हैं, इसका आनंद ही कुछ और हें!घर की पूजन में जो आप लोग पूजन करते हैं,उसमें रिस्तेदारों को वुलाते हैं, लेकिन ये जो परिवार आज सामुहिक रुप से दीपावली की पूजन करने वैठा हैं,उसमें आपने हम मुनिराजों को भी सामिल कर लिया, उसमें जो आनंद आप लोगों आया हैं वह आपको घर की पूजन में उतना आनंद नहीं आता! उन्होंने प्रश्न करते हुये कहा कि वताओ आप लोगों को अकेले पूजन करने में इतना आनंद आता क्या? उन्होंने कहा कि  कभी ऐसा हुआ है, कि आप लोग दिवाली मनाओ और महाराज भी आकर वैठ जाएं, उन्होंने कहा कि विदिशा में जितने भी धर्मात्मा जीव हैं वह सभी आज इस आनंदमय दृश्य में सामिल हुये हैं! मुनि श्री ने भक्तांमर स्त्रोत की वांचना करते हुये कहा कि जैसै किसी वृक्ष में फल लगा हैं वह वहूत ही स्वादिष्ट हैं और वहुत सुन्दर है लेकिन वह फल कंहा से आया? मुनि श्री ने कहा कि यदि वह वीज नहीं होता तो वह सुन्दर फल कंहा से आता? मुनि श्री ने कहा कि फल में जो मिठास आई हैं वह उस जड़ के कारण हैं, उसी प्रकार सन्तान यदि विशिष्ठ होती हैं तो उसमें प्रमुखता उसकी उसकी मां होती हैं! मुनि श्री ने कहा कि जो मां जितनी पवित्र होती हैं उसकी कोख में जन्म लैने वाली संतान ही तीर्थंकर वनती हैं, वह मां ने निश्चित ही श्रावकाचार का पालन करते हुये शील धर्म का पालन किया होगा तभी वह तीर्थंकर पुत्र को जन्म देती हैं! मुनि श्री ने कहा कि शीलवान पुरुष को जन्म एक मां ही देती हें! मुनि श्री ने कहा कि जिस स्त्री कि जितनी कोख पवित्र होगी उसी की कोख से हनुमानजी की उत्पत्ती होती हैं, जिनके गिरने से वह वालक को चोट नहीं लगती वल्कि वह चट्टान ही चूर चूर हो जाती हैं! उन्होंने कहा कि हे  भगवान आप ही वृह्म स्वरुप हो,आप ही वुद्ध हैं एवं आप ही तीनों लोकों के दुःखों को हरने वाले हो,आप ही जगत में शांति प्रदान करने वाले हो, हे श्वामिन आप ही पुरुषोत्तम अर्थात सभी मनुष्यों में श्रैष्ठ हो!उन्होंने कहा कि भगवान की भक्ती करते समय यदि हमारी दृष्टि अपने दोषों की ओर हो जाऐ तो हमारा कल्याण हो जाए! भगवान के दर्शनों की एक झलक ही मिल जाती हें, तो शांती मिल जाती हैं!

उन्होंने कहा कि यदि हमारे अंदर के विषय कषाय रुप सूख जाएं तो निश्चित मानना आपसे दुःख दूर  हो जाएंगे! उन्होंनै कहा कि भगवान ने आज के दिवस मोक्ष सुख की प्राप्ती की थी और वह मोक्ष सुख का रास्ता आप सभी लोगों को भी वता रहे हैं! कि आओ आप लोग भी आ जाओ! उन्होंने कहा कि वह तो मोक्ष को प्राप्त करके ऊपर सिद्धलोक में विराजमान हो गये, अब उनका संसार समाप्त हो गया! आप लोगों ने देखा था, समवसरण में भगवान सवसे ऊपर अशोकवृक्ष के नीचे विराजमान हैं, भगवान का उज्जवल स्वरुप से जो किरणें निकल रही थी  वह संसार के मोह रुपी अंधकार को दूर करने वाली होति हैं! उपरोक्त जानकारी श्री सकल दि. जैन समाज के प्रवक्ता अविनाशजैन ने दी!

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