राजधानी पुलिस अपराधियों को बचाने के लिए शरीफ इंसानों पर ही दर्ज कर देती है 151,107,116

राजधानी पुलिस अपराधियों को बचाने के लिए शरीफ इंसानों पर ही दर्ज कर देती है 151,107,116

राजधानी पुलिस अपराधियों को बचाने के लिए शरीफ इंसानों पर ही दर्ज कर देती है 151,107,116

लखनऊ /राजधानी पुलिस से अगर ज्यादा सवाल जवाब हुआ तो आप को जबरदस्ती बना दिया जाएगा अपराधी इसलिए आप हो जाइए होशियार . अनुभव कीजिए, सोचिए कि "उत्तर प्रदेश पुलिस आपकी सेवा में सदैव तत्पर" यह स्लोगन सिर्फ थानों के बोर्ड पर ही शोभा देते हैं. क्षेत्राधिकारी से लेकर डीजीपी तक के पास आवेदन लेकर जाइए लेकिन "उम्मीद नहीं" जी हां बिल्कुल सही सुना आपने उम्मीद जैसे विषय वस्तु को घर पर छोड़ कर जाइए.

क्योंकि वहां भी वही होगा जो आपके साथ थानों पर हुआ है फर्क सिर्फ यह होगा कि आपका आवेदन लेकर निष्पक्ष जांच के आदेश लिख कर आपको वही वापस कर दिया जाएगा. जहां वही दरोगा और एस.ओ को दोबारा हंसते और मजाक बनाते हुए दिखेंगे.आपका आवेदन लेकर आपको घर जाने के लिए कह देंगे और जांच तक ठहरने की बात होगी. 

खैर यह हकीकत आपके हमारे साथ कभी ना कभी जरूर घटी होगी आप आवेदन लेकर जिसके खिलाफ जाएंगे आपको भी पता है वह सामाजिक व्यक्ति नहीं होगा. पुलिस सुनवाई के नाम पर आवेदन रख भी लेगी,तो आप रोजाना दौड़ लगाते रहेंगे थानों के. एक बात अच्छी है डीजीपी साहब ने यूपी सीओपी जैसे एप जरूर लॉन्च कर दिए, ऑनलाइन एफआईआर दर्ज के लिए लेकिन समाधान तो तब होगा जब थानों के आई.ओ के मन मुताबिक आवेदन करने वाला व्यक्ति होगा. नहीं तो अपराधियों के सपोर्ट के लिए 107/ 116 और 151 शरीफ इंसानों पर भी दर्ज होगा इसके लिए आप तैयार रहें चुकी अपराधी जो बचाना है.

 जिनके ऊपर जीवन में एक चींटी मारने का आरोप नहीं वैसे ही व्यक्ति पुलिस की नजर में शांति भंग करने वाला और जिसकी छवि अपराधियों वाली होगी उनको बड़ी धाराओं से या यूं कह ले दोषमुक्ति दिलाने के लिए 107, 116, 151 लगा दिया जाएगा. शरीफ आदमी पुलिस की नजर में दंगा भड़काता है और अपराधी थाने में बैठकर दरोगा और एस.ओ के साथ मामले को रफा-दफा करने के लिए नोट गिनता हैं. और शायद यही वह कारण है जिसकी वजह से शरीफ आदमी थाने पर पीड़ित होने के बाद भी नहीं जाना चाहता है.

हमेशा ही स्थानीय पुलिस ड्रग माफियाओ जुआरीयो और अराजक तत्वों के बीच का जबरदस्त गठजोड़ सामने देखने को मिलता है.जिसमें ड्रग माफिया जुआरी अराजक तत्व  चैनइसनेचर गंजेड़ीओं तथा गांजा तस्करों पर अगर आप आवाज उठाएंगे तो, पहले तो आप को धमकाया जाएगा अनावश्यक परेशान किया जाएगा और अगर फिर भी आप नहीं माने तो पुलिस अपराधियों के साथ खड़ी हो जाती है और उल्टा आप के ऊपर ही मुकदमा हो जाता है दर्ज. 

जानिए कि कैसे पुलिस उनके साथ होती है खड़ी 

लगातार शिकायत करने के बाद स्थानीय दरोगा कभी जुआरियों को पकड़ने नहीं आएंगे लेकिन ऐसे सभी आपराधिक घटनाओं तथा अराजकता के विरोध में अगर आप आवाज उठाएंगे तो पुलिस आपको तरह-तरह से परेशान करती है और कहेगी, क्या समाज सुधारने का आप ने ले रखा है ठेका. आप थाने पर आवेदन लेकर जाएंगे आवेदन नहीं ली जाएगी, थोड़ा दबाव बनाएंगे तो शायद आवेदन लेकर रख ली जाएगी,अगले दिन जाएंगे ऐसो साहब नहीं है, उनके आने पर ही मुकदमा होगा दर्ज, अगर मुकदमा हो गया दर्ज

तो विवेचना में अपराधियों के नोटों की गर्मी के हिसाब से होगी विवेचना जहां फिर आप कुछ नहीं कर पाएंगे मामला कोर्ट में पहुंच गया सालों साल लग जाएंगे तब तक अपराधी बाहर ही नजर आएंगे. इसी तरह के कई रास्ते होते हैं पुलिस के पास जिससे पीड़ित हमेशा ही पीड़ित बना रहेगा और अपराधी करने लगते हैं मौज. 

 तत्काल के मामले को लेकर समझते हैं मामला अलीगंज सेक्टर एम थाना क्षेत्र विकास नगर का है जहां पिछले कई सालों से जुए मादक पदार्थ शराब का अड्डा और अराजक तत्वों का बोलवाला चलता आ रहा है. उसके खिलाफ निजी अखबार के डायरेक्टर  ने जो आवाज उठाई तो पहले तरह-तरह से परेशान किया गया और फिर भी ना मानने पर आचार संहिता के आड़ में इलेक्शन कमिशन का हवाला देकर फर्जी तरीके से बिन जाने पूछे मामला दर्ज कर नाम मुचलके जमानत के लिए भेज दिया जा रहा है जो शरीफ है और समाज में शराफत का काम करते हैं अब इन मामलों की वजह से पिछले 6 महीने से डायरेक्टर साहब अपने वास्तविक काम को नहीं कर पा रहे और ना ही करने दिया जा रहा है.

सोचने वाली बात आखिर पुलिस जब अपराधियों से नहीं मिली तो शरीफ इंसान क्यों हो रहा है परेशान जबकि अपराधी इतिहास वाले दबंग धमकी भी देते हुए खुलेआम शहर में घूम रहे हैं. फिर सोचने वाली बात है यह वही राजधानी पुलिस है जो जुआरियों के खिलाफ आवेदन कभी नहीं लेती है वहीं शरीफ आदमी को अनावश्यक परेशान करने के इनके पास कई रास्ते मिल जाते हैं ताकि पीड़ित शरीफ व्यक्ति पीछे हट जाए और मुकदमा ना लिखवा पाए. समझना यह भी होगा की, क्या स्थानीय अराजक लोगों को पुलिस मॉनिटर करती और अपने हिसाब से इस्तेमाल करती है.

तो इसके तमाम उदाहरण आप को देखने और सुनने को मिल जाएंगे.सूत्रों से जानकारी यह भी मिली है कि ऐसे अराजक तत्व पुलिस के संपर्क में हमेशा बने रहते हैं और अराजक तत्वों का इस्तेमाल पुलिस अपने हिसाब से करती हैं. जब उन पर दबाव ज्यादा होता है तो गिरफ्तार करेगी और उसके बाद छोड़ देगी और गिरफ्तारी का मामला होगा कुछ और दिखाया जाएगा कुछ और शरीफ आदमी डर से सवाल जवाब भी नहीं कर पाता. इस तरह अपराधिक छवि वाले लोगों का बोलबाला और वर्चस्व हमेशा के लिए कायम हो जाता है.

ताजा मामला विकास नगर थाना क्षेत्र के अलीगंज से है जानकारी यह आ रही है कि थाने पर मुकदमा दर्ज करने के बाद विकास नगर पुलिस और स्थानीय अराजकता फैलाने वाले लोगों के बीच ऐसा गठजोड़ बन चुका है कि लगता है कानून की पट्टी अदालत से बाहर निकल गई है और विकास नगर थाने के दरोगा हरिनाथ सिंह यादव  ने अपनी आंखों पर बांध ली है जिससे ना तो उन्हें कुछ दिखाई दे रहा है और ना ही वह देखना चाहते हैं धमकाने,

ब्लैक मेलिंग और जान से मारने की धमकी देने वाले अराजक लोगों के सामने दरोगा साहब ने अपने घुटने टेक दिए और भूल गए कि जब उन्होंने जिम्मेदारी ली थी तब उनको भारतीय संविधान ने क्या क्या कश्मे दिलवाई थी और जाने अनजाने में उन्होंने वही कर दिया जिससे पुलिस के ऊपर सवालिया निशान खड़े हो जाएंगे अब यह तो वक्त ही बताएगा कि उन्होंने किस दबाव में या किस लालच में आकर अपनी वर्दी और अपनी जिम्मेदारियों की बली चढ़ा दी 


 
 साथ ही गठजोड़ से मिलकर एक ऐसा जाल बनाया जिसमें अब शायद सवालों के जवाब नहीं रह गए हैं लेकिन क्या अकेले विकास नगर थाने में ही हरिनाथ हैं या ऐसे हरिनाथ हर थाने में मौजूद है कौन लगाएगा इसका पता और कैसे लग पाएगा यही सोचने वाली बात है l जिस आचार संहिता का हवाला देकर दरोगा साहब ने अपने पद का दुरुपयोग किया उनसे भी यह सवाल पूछा जाएगा कि क्या उन्होंने अपनी जिम्मेदारी से समझौता किया है? 

क्या उनसे पूछा जाएगा कि किस आधार पर आप अपराधियों की लिस्ट तैयार करते हैं? 

क्या उनसे पूछा जाएगा कि आपने जो लिस्ट भेजी है या अपने सच्चाई और ईमानदारी से बनाई है?

क्या ऐसी लिस्ट की जांच होनी चाहिए ?

क्या पुलिस को और जवाबदेही होना चाहिए? 

क्या इसमें पुलिस बदले की भावना या किसी लालच में कार्यवाही करती है? 

क्या लोगों का भरोसा कायम करने के लिए उत्तर प्रदेश के कम से कम 25 परसेंट थानों में इलेक्शन के दौरान भेजी गई लिस्ट की जांच होनी चाहिए? 

क्या इलेक्शन के दौरान भेजी गई लिस्ट में सभी नामों पर दोबारा निष्पक्ष तरीके से जानकारी ली जाएगी?

लोग तो यहां तक कि कहते हैं की ऐसे मामलों में जो असल में अराजक तत्व हैं उनकी संख्या कम और अनावश्यक परेशान  होने वालों की संख्या ज्यादा होती है  जो किसी न किसी तरीके से  पुलिस के ऊपर सवाल खड़े कर देते हैं बल्कि जो लोग निर्दोष हैं उनको बलि का बकरा बनाया जाता है l

क्या पुलिस के लिए आचार संहिता को दुरुपयोग करने का एक अवसर मानना चाहिए

क्या पुलिस के पास असीमित पावर आने पर वह पहले से ज्यादा खतरनाक हो जाती है?

 क्या पुलिस जनता के ऊपर से भरोसा खो चुकी है?

क्या अपराधियों के साथ पुलिस भी ब्लैक मेलिंग करती है?

ऐसी घटनाएं आने के बाद क्या आप पुलिस को मित्र पुलिस कह सकते हैं? 

ऐसे हजारों सवाल करोड़ों जनता के मन में हैं लेकिन क्या इसका कोई समाधान मिल पाएगा?

क्या ऐसा मामला सामने आने पर पुलिस को भी इस पर कठोरतम कार्यवाही करनी चाहिए?

क्या आपको भरोसा है की पुलिस अपना काम इमानदारी से करती है?

ऐसे हजारों सवाल आम जनता के मन में आते हैं और चले जाते हैं क्या जनता भी भूल चुकी है या मान चुकी है कि इसका कोई इलाज नहीं है

यह एक सोचनीय के लिए गंभीर विषय है आप भी अपनी राय रखी अगर आप अपनी राय हमें भेजना चाहते हैं
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