विवाह के नियम.....

विवाह के नियम.....

विवाह....

समावर्तन के अनन्तर विवाह संस्कार का क्रम आता है। जो समावर्तन संस्कार से संस्कृत होता है उसका विवाह संस्कार किया जाता है। मीमांसा शास्त्र का नियम है कि संस्कार उसी का होता है जिसका उपयोग आगे होने वाला हो अथवा जिसका उपयोग हो चुका हो ।

भूतभाव्युपयोगि हि द्रव्यं संस्कारमर्हति'

न्याय है। हम अपने परिवार के पुत्र पौत्र आदि का जातकर्म- नामकरण- अन्नप्राशन-उपनयन- विवाह आदि संस्कार करते हैं। हमारे द्वारा किये हुए संस्कारों से पुत्र-पौत्र आदि संस्कृत होते है। संस्कृत-इनका उपयोग आगे सामाजिक कार्यो मे होने वाला है। अतः हम पिता ज्येष्ठ भ्राता या आचार्य संस्कार करते है। संस्कार करने वाले हम भी इन्ही संस्कारों से अपने पूर्वजों के द्वारा संस्कृत किये गये है। यह परम्परा अनादिकाल से चली आ रही है। अतः यह निश्चय करना मुश्किल है कि कौन पहिला कौन दूसरा, कब से इस परम्परा का आरम्भ हुआ।

अग्नि की आवश्यकता

जो भी हम संस्कार करते है वे अग्नि से साध्य होते है । विना अग्नि मे होम किये संस्कार नहीं होते है। हमारे द्वारा किये जाने वाले संस्कार अग्नि साक्षिक होते है । अर्थात् उन संस्कारों का साक्षी अग्नि देव होता है । अग्नि को हम मात्र जलानेवाला चीज को नहीं मानते है किन्तु देव बुद्धि रख कर चलते है। जिन संस्कारों को साधने के लिए अग्नि की अपेक्षा है उस अग्नि का भी संस्कार होता है। यहाँ शंका हो सकती है कि अग्नि के बारे मे महाकवि भवभूति ने कहा है कि-

तीर्थोदकञ्च वह्निश्च नान्यतः शुद्धिमर्हतः

 तीर्थो का जल और अग्नि स्वयं शुद्ध है दूसरे से उनकी शुद्धि नही हो सकती है। इस अवस्था में अग्नि का संस्कार क्या होगा? प्रश्न ठीक है किन्तु ये संस्कार अग्नि की शुद्धि के लिए नही किये जाते है किन्तु संस्कारों से देवत्व बुद्धि के द्वारा फल प्रदान शक्ति का प्रोत्साहन बढ़ता है। जिन मन्त्रों से आज्य आहुतियाँ दी जाती हैं उन मन्त्रों के अर्थ पर ध्यान देने से पता लगता है कि अग्नि देव में क्या शक्ति है ? उस शक्ति को अग्नि देव स्वयं उपयोग न करते हुए हम लोगों को शक्ति सम्पन्न कराता है। इसलिए ही सभी सूत्रकार 'अग्न्याधान' 'अग्निसन्धान' क्रिया को प्राथमिकता दिये है। अर्थात् इसी संस्कार को प्रथम निरूपण किये है।

गृहस्थाश्रम की गरिमा---

 पारस्कराचार्य अपने गृह्य-सूत्र के आरम्भ में प्रथम सत्र लिखते है- अथातो गृह्यस्थालीपाकानां कर्म। ......इस सूत्र का अर्थ है अथ-श्रौत कर्मों के निरूपण के अनन्तर, अतः-जिस कारण से श्रौतकर्म निरूपण समाप्त हुआ उस कारण से गृह्यस्थालीपाकानां गृह्य अग्नि से किये जाने वाले कर्मों की व्याख्या की जाती है । कात्यायन, आपस्तम्ब, वौधायन आदि सभी सूत्रकारों ने श्रौतसूत्र-गृह्यसूत्र- धर्मसूत्र रूप से तीन प्रकार के ग्रन्थों का प्रणयन किया। उनमें श्रौतसूत्र सर्वप्रथम प्रणयन कर अनन्तर गृह्यसूत्र का प्रणयन किया ।

श्रौतसूत्रों में विविध यागों का निरूपण है गृह्यसूत्रों में स्मार्त कर्मों का अर्थात् गृह सम्बन्धी जनन से मरण तक के सभी कर्मों का निरूपण है, धर्म सूत्रों में देश भर के लोगों के लिए सामान्य धर्मों का निरूपण है। इनमें श्रौतसूत्र के सभी कर्म तीन अग्नियों से साध्य है। तीनों अग्नियों की उत्पत्ति 'आधान' कर्म से साध्य होते है । अर्थात् आधान संस्कार से संस्कृत होकर निष्पन्न होते हैं। अतः त्रेताग्नि से साध्य कर्मों को श्रौतकर्म कहते हैं। उसी प्रकार गृह्यसूत्रों में विहित सभी कर्म

'अग्निसन्धान' कर्म से संस्कृत अग्नि से किये जाते है। अतः स्मार्त कर्म कहे जाते हैं। सभी सूत्र ग्रन्थों का 'स्मृति' शब्द से व्यवहार होता है । स्मरणार्थक स्मृति शब्द के द्वारा यह अवगत होता है कि पूर्व अनुभूत पदार्थ को स्मरण कर ऋषियों ने स्मृति ग्रन्थों का प्रणयन किया है। जिन ऋषियों ने श्रौतकर्मों को अनुष्ठान करते हुए स्मरण के द्वारा स्मृति ग्रन्थों को निर्माण किया उनका प्रामाण्य स्वतएव सिद्ध हो जाता है।

अतः पारस्कराचार्य सर्व प्रथम 'गृह्यस्थालीपाकानां कर्म' कहते हुए यह निरूपित करते है कि स्थालीपाक अग्नि से साध्य कर्म का निरूपण किया जाता है। स्थालीपाक अग्नि को 'औपासनाग्नि' 'आवसथ्याग्नि' शब्द से भी व्यवहार है। पिता के द्वारा पूत्र को एवं पुत्र के द्वारा पिता को जितने संस्कार किये जाते हों वे इस स्थालीपाक अग्नि से ही सम्पन्न होते है।

श्रौत आधान से निष्पन्न हो या स्मार्त आधान से, अग्नि का पालन धारण यावज्जीव किया जाना चाहिए । सर्वदा गृहस्थ को अग्निमान् होकर रहना शास्त्रमर्यादा है। इससे घर में अग्नि तैयार रहने से आगन्तुको के आतिथ्य के लिए गहस्थ चौबीसों घण्टे प्रतीक्षा मे रहते है यह प्रतीत होता है। अतएव गृहस्थाश्रम सभी अन्य आश्रमों का उपजीब्य माना जाता है। आवसथ्याधान का काल'आवसथ्थाधानं दारकाले' इस पारस्कर गृह्यसूत्र से अग्निसन्धान का काल कहा गया है। पाणिग्रहण संस्कार से संस्कृत पत्नो 'दार' शब्द से कही जाती है ।

अर्थात् दार ग्रहण के अनन्तर पति-पत्नी मिलकर अग्निसन्धान सस्कार के द्वारा अग्नि का आधान करें। इससे यह निकलता है कि एकाकी पति या पत्नी का अधिकार नही । क्योंकि गृहस्थाश्रम में प्रविष्ट होने के बाद सामाजिक एवं राष्ट्रीय कार्यों मे दोनों मिलकर ही लगना चाहिए। जितना पुरुषों का अधिकार है उतना स्त्रियों का भी सामाजिक कार्यो मे अधिकार है। यह हमारी प्राचीन परम्परा है। घर के हों या समाज के हों अथवा राष्ट्र के हों सभी कार्यों में पुरुष स्त्रियों से स्त्रियों पुरुषों से परामर्श कर कार्य करते हैं। 'पाणिग्रहणात्तु सहत्वं पुण्यफलेषु' कह कर आपस्तंबाचार्य दोनो का सहभाव बतलाये है।

हम घर में सहभाव से रहने का अभ्यास करते हो तभी सामाजिकों मे सहभाव भावना की चेतना को उत्पन्न करा सकते है । आवसथ्याधान से सिद्ध अग्नि के द्वारा अपने घर की उन्नति के साथ-साथ समाज और राष्ट्र की उन्नति कर सकते है। आवसथ्याग्नि को 'औपासनाग्नि' शब्द से भी व्यवहार है। इस अग्नि का आधान पाणिग्रहण के अनन्तर किया जाता है। पारस्कराचार्य ने आवसथ्याग्नि का साधारण स्वरूप निरूपित किया है।

घटक परम्परा स्नातक अपने व्रतों को ( नियमों को) कम से कम तीन अहोरात्र पालन कर गार्हस्थ्य आश्रम में प्रविष्ट होगा। प्राचीन काल में यह परम्परा रही है कि वधू वरों की घटना के लिए विभिन्न प्रान्तों मे 'घटक' मिलाने वाले होते थे। उनके पास संबद्ध परिवारों वर और वधु पक्ष वालों की नाम गोत्र आदि की सूची रहती थी। उस सूची के अनुसार वर के लिए वधू, वधू के लिए वर के पता रखते थे। स्नातक के पिता उन घटकों को बुलाकर उनके द्वारा वधू के परिवार वालों से बात कराते थे।

उन्हे बुला कर युग्म संख्या ( दो चार छः आदि संख्या ) के घटकों को दक्षिणा देकर अच्छे योग्य कुल की कन्या को ढूढकर कहने पर निर्णय होता था इस परिवार से कन्या को लेना है। घटकों को प्रेषित करते हए मन्त्र बोला जाता है कि- *प्रसुग्मन्ता घियसानस्य सक्षणि वरेभिर्वरानभिषुप्रसीदत ।अस्माकमिन्द्र उभयं जुजोषति यत्सौम्यस्यान्धसो वुबोधति ।।

अनुक्षरा ऋजवस्सन्तु पन्था येभिस्सखायो यन्ति नो वरेयम् । समर्यमा संभगोनो निनीयात्सञ्जास्पत्यं सुयममस्तु देवा।। घटकों को लक्ष्य कर वर इस मन्त्र से कहता है-कन्या के अन्वेषण के निमित्त जाते हुए आप का मार्ग श्रेष्ठ रहे, कन्या के अभिभावक पिता भाई आदि के प्रति आप प्रसन्न चित्त रहें क्योंकि परमैश्वर्यं सम्पन्न इन्द्र परमात्मा भी हम दोनों के सहायक है । सहायक होने में कारण बतलाया गया है

यत्-जिस कारण से सौम्यस्य अन्धसः

-सोम सम्बन्धी अन्न को हमे देने के लिए जुजोषति-इन दोनों को सोम सम्बन्धी अन्न को देने पर कालान्तर मे दोनों मिलकर यज्ञ याग आदि के द्वारा मुझे आराधना करेंगे। यह कहकर देवताओं से भी प्रार्थना करता है कि हे देव, जाने वाले ये घटक 'सखायः' मुझको अपने समान देखने वाले है, वधू पक्ष से मिलने के लिए जाते हुए इनका मार्ग कण्टकों से रहित हो और 'ऋजवः' सीधा रहे, विघ्न बाधा से दूषित न हो, सूर्य एवं भाग्य देवता इनको अच्छी तरह पहुँचावें, हमारा दाम्पत्य जीवन मधुर रहे।

घटक सोच विचार कर वर के दाम्पत्य जीवन सुखमय बीतने के लिए उचित एवं योग्य कन्या-पिता से मिल कर वर की बात करते है और कन्या के पिता से 'दास्यामि' सम्मति को प्राप्त करते है। इसकी सूचना वर पक्ष वालों को दे देते है। तदनुसार वर शुभ तिथि-नक्षत्र- वेला को निश्चय कर विवाह के लिए प्रस्थान करता है। प्रस्थान के समय वही वेष रहेगा जो स्नातक का है।

अर्थात् छत्र उपानत् कुण्डल आदि धारण कर प्रस्थान करेगा। जाने हुए कन्या के धारण के लिए वस्त्र आदि को साथ लेते जायेगा। क्योंकि इसी वस्त्र को मन्त्रोच्चारण द्वारा कन्या को परिधापन वर करेगा। वर कन्या के घर पहुँचने पर कन्या पिता वर को महाविष्णु स्वरूप मान कर पाद्य अर्घ्य कूर्च-मधुपर्क आदि सत्कारों से सत्कृत करेगा। वर स्वयं लाये हए वस्त्र को अभिमन्त्रित कर धारण के लिए कन्या के पास भेजेगा।

पंडित अम्बरीष चन्द्र मिश्रा अयोध्या

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