महान विद्रोह में महिलाओं की भूमिका विषय पर मिशन शक्ति समन्वयक के निर्देशन में संगोष्ठी का हुआ आयोजन

 
महान विद्रोह में महिलाओं की भूमिका विषय पर मिशन शक्ति समन्वयक के निर्देशन में संगोष्ठी का हुआ आयोजन

स्वतंत्र प्रभात
अम्बेडकर नगर।


 रमाबाई राजकीय महिला महाविद्यालय अकबरपुर में  मिशन शक्ति के अप्रैल से अगस्त तक चलने वाले विशेष अभियान के अंतर्गत 1857 के महान विद्रोह में महिलाओं की भूमिका विषय पर मिशन शक्ति समन्वयक डॉ0 सुधा के निर्देशन में संगोष्ठी का आयोजन किया गया। इस अवसर पर महाविद्यालय की प्राचार्य व संरक्षक प्रोफेसर शेफाली सिंह ने अपने उद्बोधन में कहा कि राष्ट्र के नव निर्माण में महिलाओं का योगदान सराहनीय है। 

वे अपनी योग्यता और साहस के बल पर पुरुषों के कंधे से कंधा मिलाकर ही नही, बल्कि एक कदम आगे चल रही है।भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में पुरुषों की भांति अनेक महिलाओं ने अपनी साहसिक भागीदारी, बलिदान, सहयोग और प्रेरणा देकर भूमिका निभाई। मुख्य वक्ता के रूप में  इतिहास विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर रवीन्द्र कुमार वर्मा  ने 1857 की विद्रोह पर प्रकाश डालते हुए यूरोपीय कम्पनियों के आगमन तथा ब्रिटिश साम्राज्य की स्थापना से लेकर 100 वर्षों के इतिहास का संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत किया।

 विद्रोह के महत्व को रेखांकित करते हुए उसकी अस्मिता और प्रासंगिकता को स्पष्ट करते हुए महिलाओं की भूमिका पर प्रकाश डालते हुए कहा कि 1857 का भारतीय विद्रोह जिसे प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के नाम से जाना जाता है, में महिलाओं के अदम्य साहस व वीरता को भारत के साथ-साथ ब्रिटिश ताज ने भी देखा ,जिसमें झांसी की रानी लक्ष्मीबाई जो अपने पीठ पर बच्चे को बांधकर अंग्रेजों से लोहा लेती रही, उनके वीरता और साहस को देखकर ही कहा गया है कि " चमक उठी सन् सत्तावन में, वह तलवार पुरानी थी। बुंदेले हर बोलों के मुंह हमने सुनी कहानी थी ,खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी। 

1857 ई. का स्वतंत्रता संग्राम महिलाओं के अदम्य साहस और शौर्य से भरा हुआ है।इतना ही नहीं बेगम हजरत महल अवध प्रांत से अपनी विशेष सूझबूझ व समझदारी से अंग्रेजों के लिए मुश्किलें खड़ी करती रही तथा उनका विद्रोह किया । दिल्ली 1857  के विद्रोह के दौरान सदा आकर्षण का केंद्र बना रहा जहां से जीनत महल ने विशेष भूमिका निभाई तथा असीम शौर्य व साहस के साथ अंग्रेजों से टक्कर ली। झलकारी बाई झांसी के दुर्गा दल की सदस्य थी और और उन्होंने पूरे साहस और वीरता के साथ अंग्रेजों का सामना किया तथा उन्हें कड़ी टक्कर दी ।ऊदा देवी, अजीजन बाई जैसी अनेक वीरांगनाओं  ने साहस, शौर्य ,वीरता व धैर्य का परिचय दिया।ऐसा नहीं है कि उस क्रांति में सिर्फ इन्हीं महिलाओं का योगदान था। 

इनके अतरिक्त भी हजारों ऐसी महिलाएं थीं जिन्होंने देश-प्रेम में अपना सर्वस्व न्योछावर कर दियाभारतीय स्वतंत्रता संग्राम के पीछे महिलाओं के योगदान की महती प्रेरणा रही. महिलाओं ने आंदोलन में भाग लेने वालों, जेल जाने वालों, फांसी के फंदों पर झूलने वालों को तिलक लगाकर और राखी बांधकर अपने लक्ष्य की ओर बढ़ने की बलिदानी प्रेरणा प्रदान की और अंग्रेजों के खिलाफ होने वाले आंदोलनों में कंधे से कंधा मिलाकर उनमें जोश जगाने का प्रेरणात्मक कार्य किया. आज राष्ट्र ऐसी वीरांगनाओं के प्रति नतमस्तक व कृतज्ञ है। मिशन शक्ति की समन्वयक डॉ सुधा ने कहा कि भारत में नारी को हमेशा देवी की संज्ञा दी गई है।

 जब आवश्यकता पड़ी तो उसने ज्ञान की प्रतिमूर्ति बनकर स्वरों से देश को एक नई दिशा दी और जब अवसर आया तो उसी नारी ने शक्ति स्वरूपा चंडी का भी रूप धारण कर अदम्य शक्ति का लोहा मनवाया। शासन और समर से स्त्रियों का सरोकार नहीं’ जैसी पुरुषवादी धारणाओं को ध्वस्त करती भारतीय वीरांगनाओं का जिक्र किए बिना संपूर्ण स्वाधीनता आंदोलन की दास्तान अधूरी है, जिन्होंने अंग्रेजों को लोहे के चने चबवा दिए।संगोष्ठी का संचालन डॉ.संगीता व धन्यवाद ज्ञापन कुॅवर संजय भारती द्वारा किया गया।इस अवसर पर महाविद्यालय के मुख्य शास्ता डॉ अरविंद कुमार वर्मा, डॉ राजेश यादव ,डॉ.महेंद्र यादव, डॉ.अतुल कनौजिया, राष्ट्रीय सेवा योजना प्रभारी डॉ.सीमा यादव,डॉ. नंदन सिंह ,डॉ. पूनम, सीता पांडेय,डॉ सुनीता, सतीश उपाध्याय, अवधेश नंदनी व महाविद्यालय की छात्राएं उपस्थित रही।

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