बच्चों को पीटा तो हो सकता है तीन साल का कारावास

 
बच्चों को पीटा तो हो सकता है तीन साल का कारावास


करनाल।

नाबालिग बच्चों से श्रम करवाना, उन्हें पीटना या किसी अन्य प्रकार से उत्पीड़न करना कानूनन अपराध है। ऐसे मामलों में संविधान के अनुच्छेद 75 के तहत मामला दर्ज हो सकता है जिसमें तीन साल के कारावास का प्रावधान है। रेडियो ग्रामोदय के लाइव कार्यक्रम में हरियाणा ग्रंथ अकादमी उपाध्यक्ष एवं भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता डॉ. वीरेंद्र सिंह चौहान से चर्चा के दौरान करनाल की बाल कल्याण समिति के अध्यक्ष उमेश चानना ने यह जानकारी दी। उन्होंने बताया कि बच्चों को उत्पीड़न से बचाने के लिए हर जिले में बाल कल्याण समितियों (सीडब्ल्यूसी) का गठन किया गया है। सीडब्ल्यूसी के अध्यक्ष को प्रथम श्रेणी के न्यायिक दंडाधिकारी की शक्तियां प्राप्त हैं।

डॉ. चौहान ने कहा कि बच्चों के अधिकार क्या हैं और उनके अधिकारों के संरक्षण के लिए संविधान में क्या-क्या कानूनी प्रावधान किए गए हैं, इसकी जानकारी सबको होनी चाहिए। बाल कल्याण समितियों के दायित्व क्या हैं और यह समितियां किस प्रकार कार्य करती हैं, इस सवाल पर उमेश चानना ने बताया कि बाल कल्याण समिति के सदस्य सरकार द्वारा नामित किए जाते हैं। इसमें सिर्फ उन्हीं लोगों को सदस्य बनाया जाता है जिन्होंने बाल अधिकारों के संरक्षण के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य किया हो। सीडब्ल्यूसी का कार्य बच्चों का उत्पीड़न रोकना है। समिति की ओर से एक चाइल्ड हेल्पलाइन नंबर 1098 जारी किया गया है जिस पर फोन कर बच्चों के उत्पीड़न की शिकायत दर्ज कराई जा सकती है।

उमेश चानना ने बताया कि शिकायत मिलते ही चाइल्ड हेल्पलाइन के सदस्य 1 घंटे के भीतर मौके पर पहुंचते हैं और बच्चे को रेस्क्यू कर अपने संरक्षण में ले लेते हैं। फिर उस बच्चे को सीडब्ल्यूसी के समक्ष पेश किया जाता है जहां यह पता लगाने की कोशिश की जाती है कि बच्चे के साथ किस प्रकार का दुर्व्यवहार हुआ है और उसका क्या निराकरण होना चाहिए।

डॉ. वीरेंद्र सिंह चौहान ने कहा कि बच्चों के अधिकारों का हनन होने से रोकने के लिए सीडब्ल्यूसी मुस्तैद है, लेकिन लोगों को उत्पीड़न की श्रेणियों के बारे में पूरी जानकारी होनी चाहिए। इस पर सीडब्ल्यूसी अध्यक्ष उमेश चानना ने बताया कि बाल श्रम और यौन शोषण के अलावा पीटना भी उत्पीड़न की श्रेणी में आता है चाहे ऐसा करने वाला परिवार का सदस्य ही क्यों न हो। उन्होंने बताया कि दुनिया भर के 192 देशों ने एक संधि पर हस्ताक्षर किया है जिसके तहत यह सुनिश्चित करना अनिवार्य है कि किसी भी देश का कोई भी बच्चा किसी भी प्रकार से उत्पीड़न का शिकार न हो। संधि पर हस्ताक्षर करने वाले देशों में भारत भी शामिल है। उन्होंने बताया कि 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों को काम पर लगाना बंधुआ मजदूरी की श्रेणी में आता है जो कानूनन अपराध है। 14 से 18 वर्ष के बच्चे काम तो कर सकते हैं, लेकिन उन्हें सिर्फ उन्हीं कार्यों में लगाया जा सकता है जहां उनकी जान पर कोई खतरा ना हो। उदाहरण के तौर पर ईट भट्ठी, केमिकल और विद्युत धारा प्रवाहित होने वाले बिजली के कार्यों में बच्चों को नहीं लगाया जा सकता।

इस अवसर पर ग्रंथ अकादमी उपाध्यक्ष डॉ. वीरेंद्र सिंह चौहान ने कहा कि रेडियो ग्रामोदय बाल अधिकारों, उनके संरक्षण और उन्हें उत्पीड़न से बचाने के उपायों पर कार्यक्रमों के माध्यम से लोगों को जागरूक करने का कार्य करता रहेगा। संस्कृत पर चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि संस्कृत सिर्फ भाषा नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति की संवाहिका भी है।

   

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