मैं तमसा हूं! मेरा जीवन संकट में है,एक नदी की व्यथा

नदी को गहरीकरण कराने की जो प्रक्रिया शुरू की गई थी वह 2 साल में ही धराशाई हो गई कहीं कहीं नदी ने अपना पार्ट बराबर कर लिया है और कहीं कहीं वह सिकुड कर नाले के रूप में बह रही है 
 
मैं तमसा हूं! मेरा जीवन संकट में है,एक नदी की व्यथा 

स्वतंत्र प्रभात 


मिल्कीपुर अयोध्या एक और जहां उत्तर प्रदेश सरकार मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम की नगरी अयोध्या को उसके पुराने स्वरूप में लाने का प्रयास कर रही है वही मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम के जीवन जीवन काल की घटनाओं कि, साक्षी रही तमसा अपने हाल पर आंसू बहा रही हैमैं हूं आपकी तमसा मां। वही तमसा जिसके तट पर जन जन मे बसने वाले प्रभु श्रीराम ने वनगमन के समय प्रथम रात्रि विश्राम किया था। मैंने प्रभु को मातृत्व सुख प्रदान किया था। मेरा उद्गम स्थल जिले के अंतिम पश्चिमी छोर पर स्थित मवई ब्लाक क्षेत्र के बसौढी के लखनीपुर गांव के समीप है। मैं कभी लोगों के लिए जीवन दायिनी सिद्ध हुआ करती थी। पशु-पक्षी मेरे शीतल जल को पीकर तृप्त होते थे। किसानों के लिए भी मेरा जल वरदान साबित होता था, लेकिन आज मेरा जीवन खुद संकट में है। सितम्बर के महीने में भी सूखी पड़ी तमसा नदी आज अपने र्दुदशा पर मानो देश प्रदेश के हुक्मरानों से यही कह रही है।रामचरित मानस में भी उल्लेखहै कि पौराणिक तमसा नदी कभी अवध क्षेत्र की पहचान हुआ करती थी।

वन जाते समय श्रीराम-लक्ष्मण व सीता ने अयोध्या के बाहर सर्वप्रथम तमसा नदी के तट पर विश्राम करके इसको धन्य बना दिया था। इसका उल्लेख गोस्वामी तुलसी दास ने रामचरित मानस में ‘प्रथम वास तमसा भयो दूसर सुरसरि तीर’ के माध्यम से किया है। परंतु समाजसेवियों, नेताओं व प्रशासनिक अधिकारियों की घोर उदासीनता के चलते यह नदी अब अपना अस्तित्व बचाने के लिए जूझ रही है। अब यह न तो जीवनदायिनी ही रही और न ही इसका पानी आचमन योग्य है। कभी इस नदी का पानी पीकर लोग गर्मी व अन्य मौसम में अपनी प्यास बुझा लेते थे परंतु कालांतर में नदियों के भरपूर दोहन और दुरुपयोग होने के कारण इसका पानी अब स्वच्छ नहीं रह गया है। गर्मी के मौसम में यह नदी कहीं-कहीं अक्सर सूख जाती है या फिर कहीं पर कम दूषित पानी ही रहता है। अवध क्षेत्र की प्रमुख नदियों में अपनी पहचान बनाने वाली इस नदी को मड़हा व तमसा के नाम से भी जाना जाता है। इस नदी का उदगम् स्थल मवई के ग्राम बसौढी के लखनीपुर में माना जाता है। यहां पर एक सरोवर से इसका अभ्युदय हुआ है। तमसा नदी मवई, रुदौली, अमानीगंज, सोहावल, मिल्कीपुर, मसौधा, बीकापुर और तारुन आदि  विकास खंडों से होते हुए फैजाबाद से अम्बेडकरनगर व गोसाईगंज के पास तक प्रवाहित होती है। महर्षि वाल्मीकि ने भी किया है वर्णनआदि कवि महर्षि वाल्मीकि ने भी रामायण में तमसा नदी का वर्णन किया है। बताया जाता है

कि महर्षि वाल्मीकि का आश्रम तमसा नदी के तट पर था।तमसा नदी के पावन  तट पर महर्षि वाल्मीकि ने निषाद द्वारा मारे जाते हुए क्रौंच पक्षी  को देखकर करुणादू स्वर में अनजाने में ही लौकिक संस्कृत साहित्य के प्रथम श्लोक की रचना की भवभूति ने उत्तररामचरित में तमसा का सुंदर वर्णन किया है महाकवि कालिदास का आश्रम भी बाल्मीकि की तरह तमसा के तट पर ही था महाकवि कालिदास अपने ग्रंथ रघुवंश वे कहते हैं  कि, तमसां  प्राय नदीं तुरंगमेण,,महर्षि वाल्मीकि के अनुसार ,शीघ्रगामाकुलवर्ता  तमसामतरन्नदीम,, अर्थात शीघ्र प्रवाहनी भंवरों वाली गहरी नदीमहाकवि कालिदास ने अपने महाकाब्य रघुवंश मैं मातृ पितृ भक्त श्रवण कुमार की मृत्यु का स्थल तमसाकटेहरी क्षेत्र के धार्मिक स्थल श्रवण क्षेत्र में नदी का संगम बिसुही नदी से हुआ है। मवई का लखनीपुर, बीबीपुर, बरौली, करौंदी, नरौली ग्राम के साथ रामपुरभगन व गोसाईगंज कस्बे इसी नदी के तट पर बसे हैं। तमसा नदी के घाटों से पौराणिक स्मृतियां जुड़ी हुई हैं। रामपुरभगन का गौराघाट, गोसाईगंज का महादेवा व सत्संग घाट सहित ऐतिहासिक व पौराणिक महत्व रखने वाली तमसा नदी आज प्रदूषण व जहरीली हो जाने के कारण अभिशप्त है। औद्योगिक इकाइयों के कचरे से पवित्र नदी का जल प्रदूषित हो गया है जो मछलियों, पशु-पक्षियों व मनुष्यों के लिए घातक साबित हो रहा है।तमसा के उद्गम स्थल पर हर वर्ष लगता है मेला तमसा नदी के उद्गम स्थल के किनारे लखनीपुर गांव में एक प्राचीन भव्य हनुमान मंदिर है। इसका ग्रामीणों ने 25 वर्ष पूर्व जीर्णोद्धार किया था। यहां प्रतिवर्ष एक फरवरी को विशाल मेला लगता है और शाम को भंडारा भी होता है। मान्यता है कि जो भी इस दिन इस उद्गम स्थल में स्नान कर हनुमान मंदिर पर माथा टेकता है और परिक्रमा करता है उसकी मनोकामना जरूर पूरी होती है।तमसा के स्वरूप को सुधारने के लिए किए गए

प्रयास नाकाफीत्रेतायुगीन तमसा नदी के पुराने स्वरूप को बहाल करने के लिए 2019 में तत्कालीन जिलाधिकारी अनिल कुमार ने मनरेगा  और राज्य वित्त योजना से कार्य योजना बनाकर ,23 करोड़ की लागत से 150 किलोमीटर लंबी नदी को 2 मीटर गहरी करने और दोनों किनारों पर पौधरोपण की योजना बनाई थी और उसका जोर शोर से शुभारंभ किया गया था उस समय योजना यह भी थी कि नदी के  4 किलोमीटर के बाद चेक डैम बना कर  वर्षा जल को संरक्षित कर सिंचाई के साधनों की व्यवस्था की जाएगी लेकिन यह योजना अब तक धरातल पर नहीं दिखाई पड़ी है तमसा के किनारे लगाए गए पेड़ यत्र तत्र तो दिखाई पड़ जाते हैं लेकिन कहीं-कहीं इनका नामोनिशान तक नहीं बचा है नदी को गहरीकरण कराने की जो प्रक्रिया शुरू की गई थी वह 2 साल में ही धराशाई हो गई कहीं कहीं नदी ने अपना पार्ट बराबर कर लिया है और कहीं कहीं वह सिकुड कर नाले के रूप में बह रही है

   

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