इस 'गंगा-जमुनी तहजीब' में सिर्फ गंगा ही गंगा है : डॉ. चौहान

 
इस 'गंगा-जमुनी तहजीब' में सिर्फ गंगा ही गंगा है

करनाल। इन दिनों देश के मुसलमानों को मिलने वाले तरजीही दर्जे पर बहस छिड़ी हुई है। लाउडस्पीकर पर अजान बनाम हनुमान चालीसा का मुद्दा हो, जहांगीरपुरी और शहीन बाग में अतिक्रमण हटाने का मामला हो या समान नागरिक संहिता का, इन सभी मुद्दों की जड़ में तरजीही दर्जा ही है। यह बात हरियाणा ग्रंथ अकादमी के उपाध्यक्ष एवं भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता डॉ. वीरेंद्र सिंह चौहान ने कही। वह हनुमान चालीसा के पाठ और यूनिफॉर्म सिविल कोड पर उठे विवादों पर प्रतिक्रिया व्यक्त कर रहे थे। उन्होंने कहा कि भारतीय जनता पार्टी किसी समुदाय विशेष को तरजीह दिए जाने के बजाए सभी वर्गों और समुदायों को सामान्य दृष्टि से देखने में विश्वास करती है।

डॉ. चौहान ने कहा कि आदिकाल से सर्वधर्म समभाव की विचारधारा में विश्वास रखने वाले भारतीय समाज को एक्स्ट्रा सेक्यूलर बनाने के लिए जिस 'ईश्वर-अल्लाह तेरो नाम' वाली कथित 'गंगा-जमुनी तहजीब' को बढ़ावा दिया जा रहा है, उसके जनक महात्मा गांधी थे। गांधी के राजनीतिक वारिस जवाहरलाल नेहरू ने महात्मा गांधी की मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति को आगे बढ़ाते हुए देश का ऐसा संवैधानिक ढांचा तैयार करवाया जिससे यह आंशिक रूप से मुस्लिम राष्ट्र बना रहे। उनके पारिवारिक उत्तराधिकारियों ने इस नीति को संवैधानिक तौर पर और पुख्ता करने का काम किया। देश की अधिकतर विपक्षी पार्टियों  की गंगोत्री कांग्रेस ही है, इसलिए उनकी सोच भी कांग्रेसी ही है। कांग्रेस समेत तमाम विपक्षी पार्टियां यह मानती हैं कि मुस्लिम तुष्टीकरण ही असली धर्मनिरपेक्षता है। यह सारा विवाद 'विशेष समुदाय' को विशेष दर्जा देने के कारण पैदा हुआ है।

भाजपा प्रवक्ता डॉ. वीरेंद्र सिंह चौहान ने कहा, जवाहरलाल नेहरू ने तत्कालीन संविधान निर्माताओं पर दबाव डालकर उन्हें संविधान में धारा 370 और अनुच्छेद 35ए को शामिल करने के लिए मजबूर किया था। उनकी पुत्री इंदिरा गांधी ने वर्ष 1976 में बिना संसद में चर्चा कराए संविधान की प्रस्तावना में चुपके से 'सेक्यूलर' शब्द जोड़ दिया। इसके अलावा वक्फ संपत्ति कानून और मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड व अल्पसंख्यक आयोग का गठन जैसे प्रावधानों से देश को आंशिक रूप से मुस्लिम राष्ट्र बनाने की कोशिश की गई। जब देश को 1976 में ही धर्मनिरपेक्ष घोषित कर दिया गया तो आज समान नागरिक कानून का विरोध क्यों? संविधान के मार्गदर्शक सिद्धांत में समान नागरिक कानून की बात होने के बावजूद अनुच्छेद 44 में इस विषय में दमदार तरीके से कुछ नहीं कहा गया है।

डॉ. चौहान ने कहा कि कोई भी कानून बनने से पहले ही देश के मुस्लिम समुदाय का विरोध शुरू हो जाता है। कानून से परेशानी सिर्फ इसी समुदाय को क्यों होती है? मुस्लिम तुष्टीकरण की नीति का वीभत्स रूप राजस्थान के अलवर और दिल्ली के जहांगीरपुरी में देखा जा सकता है। जहांगीरपुरी के मुस्लिम बहुल इलाके में अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई शुरू होते ही 9 मिनट के भीतर सुप्रीम कोर्ट से स्थगन आदेश लेकर अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई को दो हफ्तों के लिए रुकवा दिया गया। दूसरी तरफ राजस्थान के अलवर में अतिक्रमण हटाने के दौरान आनन-फानन तीन मंदिरों समेत करीब 80-85 रिहायशी मकान गिरा दिए गए, लेकिन इसी इलाके में स्थित किसी मस्जिद को छुआ तक नहीं गया। इनमें अतिक्रमण के दायरे में मौजूद एक दुकान 'जाकिर खान मैटर्स' भी शामिल है। नाम से यह पता लगाना मुश्किल नहीं कि 'जाकिर खान मैटर्स' का मालिक किस समुदाय का व्यक्ति होगा और इसे क्यों छोड़ा गया। अलवर की घटना के दौरान कोई भी सेक्यूलर नेता न तो सुप्रीम कोर्ट में स्टे लेने गया और न ही अलवर का दौरा करने। महाराष्ट्र के राणा दंपति विवाद में भी ऐसा ही है। वहां सड़कों पर हनुमान चालीसा का पाठ करने से अव्यवस्था फैलने का खतरा है, लेकिन लोगों का आवागमन रोक कर बीच सड़क नमाज पढ़ने में सांप्रदायिक सौहार्द नजर आता है। देश की कथित गंगा-जमुनी संस्कृति को मजबूत करने के लिए इफ्तार पार्टियों का आयोजन अब सेक्युलर राजनीति की जरूरत बन गई है। एकतरफा भाईचारे के इस गंगा-जमुनी प्रवाह में जमुना को बहते कभी नहीं देखा गया है। इस तहजीब में गंगा अकेली बहती है। किसी भी हिंदू त्यौहार में मुस्लिम समुदाय की ओर से आपसी भाईचारा बढ़ाने वाला ऐसा कोई भी आयोजन होता हुआ नहीं देखा गया है।

डॉ. वीरेंद्र सिंह चौहान ने कहा कि महाराष्ट्र की महाविकास अघाडी सरकार ने लाउडस्पीकर पर अजान देने के विरोध से शुरू हुए विवाद को बड़ी चतुराई से हनुमान चालीसा पाठ पर केंद्रित कर दिया है। उद्धव ठाकरे का कहना है कि सड़क हनुमान चालीसा पढ़ने का उचित स्थान नहीं है। यही सवाल उनसे भी पूछा जाना चाहिए कि क्या सड़क नमाज पढ़ने का उचित स्थान है? उन्होंने कहा कि पिछले 75 वर्षों से लगातार तुष्टीकरण किए जाने के कारण देश का यह विशेष समुदाय इसे अपना विशेषाधिकार समझ खुद को संविधान से ऊपर समझने लगा है। यह समुदाय चाहता है कि संविधान उनके अधिकारों को संरक्षण तो दे, लेकिन उन पर लागू न हो। इस नीति को बदले बिना देश में शांति स्थापित करना संभव नहीं है।

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