नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ( एनजीटी)ने फर्जी 36 खदानों के संचालन में तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी है।

नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ( एनजीटी)ने फर्जी 36 खदानों के संचालन में तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी है।

22 दिसंबर,बांदा-

नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ( एनजीटी)ने फर्जी 36 खदानों के संचालन में तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी है।

 याचिका संख्या 263 / 2018 अंतर्गत एनजीटी ने याचिकाकर्ता अमित उपाध्याय की रिट पर यह रोक लगाई है। एनजीटी ने पर्यावरण अनापत्ति प्रमाण पत्र के दिशानिर्देश अनुपालन न करने व  EIA नई दिल्ली के आदेश दिनांक 17-12-2018 का अनुपालन न किये जाने पर चित्रकूट मण्डक की 36 खदानों के ऊपर शिकंजा कसा है।

इस आदेश से हमीरपुर,बांदा, जालौन,प्रयागराज के कौशाम्बी, कानपुर देहात के बालू खदानों पर रोक लगाई गयी हैं । हाल ही में पैलानी तहसील के ग्राम सांडी खण्ड संख्या 4व अमलोर खादर की खदानों पर भी एनजीटी का चाबुक चला है। एनजीटी के आदेश की प्रति बाँदा मण्डल आयुक्त को देकर आज अवगत कराया गया है । बतलाते चले ग्राम सांडी में मेसर्स चौधरी ईट उद्योग,अम्बाह,मुरैना ग्रुप फ़र्जी रवन्ना अमलोर खादर का देकर बालू घाट चला रहे है।

खनिज अधिकारी ने पट्टे धारक का बचाव करते हुए 21 दिसंबर की खबर में बचाव किया था। उधर आज भी ग्राम सांडी में पोकलैंड से बालू निकालने का महातांडव चालू रहा। किसानों के खेत मसलन ऊषा निषाद के खेत गाटा संख्या 53 से ट्रक निकासी की गई है। किसानों ने चेतावनी दी है यदि यह सिलसिला नहीं रुकता तो पट्टे धारक आंदोलन झेलने को तैयार रहे। उल्लेखनीय है किसी खदान संचालन कर्ता को एनओसी में मशीनों से मैकेनाइज्ड उपक्रम के नाम पर नदी की धार,नदी से 25 मीटर दूर तक महज जेसीबी के प्रयोग की अनुमति है

वो भी मिट्टी हटाने और रस्ता ठीक करने के लिए। बावजूद इसके खनिज अधिकारी, प्रशासन की आंख में धूल झोंककर, सफेद झूठ से ज़िले में ठेकेदार मनमानी करते हुए नदी की छाती में अवैध खनन करता है।

मशीन चलाने के लिखित आदेश किसके पास है यह न तो खनिज विभाग में बैठे बाबू सूचनाधिकार में बतलाते है और न उन्हें कोर्ट के अंग्रेजी आदेश की समझ है। एसडीएम, तहसीलदार कहते है रवन्ना सही है जबकि खनिज अधिकारी कहते है ग्रामीण के आरोप ग़लत है।

अब एनजीटी के आदेश पर ये अधिकारी क्या कहेंगे जिन्होंने पट्टे धारक के पर्यावरण एनओसी में दिए निर्देशों को अनुपालित करवाने की जहमत नहीं उठाई। गौरतलब है 5 साल की बालू एक सीजन में हैवी पोकलैंड मशीनों से उलीचने का प्रकृति विरोधी दुष्कृत्य खदान संचालन कर्ता बेखौफ करता है। यही वजह है कि बारिश के बाद भी अगले सीजन में उस घाट में बालू नहीं आती है। एक दशक पूर्व मानव श्रम से जब बालू निकलती थी तो नदी में न अत्याचार होता था और न मजदूरों में बेरोजगारी।

नदी के प्रवाह,जलजीवों की हत्या,मतस्य उद्योग, शजर उद्योग, ईको सिस्टम को बढ़ाकर आज बालू माफियाओं ने बुंदेलखंड समेत मिर्जापुर को बेपानी कर दिया है। जाहिर है रुपयों की भूख और राजनीतिक पकड़ से नदीखोर कारोबारियों के हौसले बुलंद रहते है। मुरैना के रामनसरेश शर्मा का चौधरी ईट उद्योग हो

या दीजियाना माइनिंग कम्पनी या इस वर्ष बाँदा की 33 खदानों में कोलकाता, मध्यप्रदेश, दिल्ली,हरियाणा आदि के रसूखदार लोगों की दस्तक ये समूह बुंदेलखंड को एक खूबसूरत रेगिस्तान बनाने की कवायद सरकार की मंशा से है। यह स्थानीय बाशिंदों पर आज नहीं तो कल बहुत भारी पड़ेगा। खण्ड-खण्ड होता बुंदेलखंड बालू और पत्थर की लूट से भविष्य का मरुस्थल है।

 

मशीनों से रायपुर कोलावल में हो रहा खनन

 

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