साहित्य सृजन मंच द्वारा आयोजित विश्व मातृदिवस संगोष्ठी का आयोजन

साहित्य सृजन मंच द्वारा आयोजित विश्व मातृदिवस संगोष्ठी का आयोजन

बिसवां सीतापुर

संसार में प्रत्येक व्यक्ति का अस्तित्व उसके मां के कारण ही संभव है, अतः विश्व में शाश्वत स्वरूप में विद्यमान साक्षात ईश्वररूपिणि माँ ही है, जिसके आशीर्वाद से कोई भी व्यक्ति अपने लक्ष्य को बिना विचलित हुए हासिल कर सकता है । अतः प्रत्येक व्यक्ति को अपनी मां का सम्मान करना चाहिए तथा उसकी बात माननी चाहिए व उसकी सेवा करनी चाहिए। यह बात चिंतक शिव कुमार खेतान ने साहित्य सृजन मंच, बिसवाँ द्वारा विश्व मातृ दिवस पर आयोजित संगोष्ठी में अपने अध्यक्षीय उद्बोधन के दौरान कही।

कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में डॉ शैलेष गुप्त वीर उपस्थित रहे। समारोह का सफल संचालन सुकवि रामदास रतन ने कुशलतापूर्वक किया। कार्यक्रम के संयोजक साहित्य सृजन मंच के संस्थापक सचिव संदीप सरस ने माँ के अस्तित्व को नमन करते हुए कहा- मां पर कोई कविता लिख दे,शब्दों की औकात नहीं है।मां तो केवल मां  होती  है,मां की कोई जात नहीं है। ममता के आगे दुनिया के सारे सुख को ना लिख दूंगा।एक शब्द में ईश्वर लिखना हो तो केवल मां लिख दूंगा।

जनपद फतेहपुर के सशक्त साहित्यकार डॉ शैलेष वीर ने अपने दोहों के माध्यम से मां के महत्व को रेखांकित किया- उनको घर में चाहिए, डॉगी या फिर कैट। बूढी माँ कैसे रहे, छोटा-सा है फ़्लैट।तन उनका लंदन हुआ, मन पेरिस की शाम। इधर पड़ी माँ खाट पर, उधर छलकते जाम।सशक्त कवि आनंद खत्री ने कहा मातृ शक्ति को नमन करते हुए कहा कि- बस अकेला ही चला था न कोई पहचान थी। सारी दुनिया मुझसे तो बिलकुल यहाँ अंजान थी।गोद में माँ  ने लिया जब तबसे ही सम्मान पाया। पेट में जिसने मुझे अपनी ही सांसो से जिलाया।

सुकवि रमाशंकर मिश्र मृदुल ने अपनी भावनाएं व्यक्त करते हुए कहा कि- माँ के आंचल का दुग्धपान कर तरुणाई हमने पाई है। अमृत सा वह रस पीकर शीतलता हममे आई है। माँ ने आँचल में छिपा लिया स्पर्श भी न कर पाया भय ने, उस एक बूंद की शक्ति ने सौ सिंह गर्जना पाई है।

अवधी कवि रामकुमार सुरत ने अपने काव्य सन्देश में कहा- सुन के कराह मेरी सारे कामकाज छोड़, दौड़कर अंक भर सीने से लगाए मां। छोटे छोटे डग भरुँ अनगढ़ बोलूँ बोल, गिर जाऊं दौड़कर गोदी में उठाए मां।सुमधुर कवि रामदास रतन ने मातृदिवस पर एक मुक्तक साझा किया-माँ के सिवा संसार में कोई नहीं आला। माँ ने है दिया जन्म माँ ने ही सम्हाला।। क्यों खोजते दर-दर उसे होकर भ्रमित 'रतन' पूजा करो उस माँ की है जिसने तुम्हें पाला।

युवा कवि नैमिष सिंह ने अपनी काव्यांजलि अर्पित की-मेरे इक आँसू पर हुई, माँ हरदम बेचैन। यादों ने फिर गीले किये, अपने दोनों नैन।कार्यक्रम में संदीप सरस, डॉ शैलेष गुप्त वीर, राम कुमार सुरत, रामदास रतन, आनंद खत्री, रमाशंकर मृदुल, नैमिष सिंह, भगत सिंह पांडे, मनोज गुप्त आदि तमाम लोगों ने अपने काव्यपाठ, विचार सम्प्रेषण व अपनी उपस्थिति गोष्ठी को सार्थकता प्रदान की।

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