हर दौलतमंद बालिग जो कर्जदार न हो उस पर फ़र्ज़ है ज़कात/दान:-मौलाना नसीम इकबाल नदवी

हर दौलतमंद बालिग जो कर्जदार न हो उस पर फ़र्ज़ है ज़कात/दान:-मौलाना नसीम इकबाल नदवी
कम से कम 20 हज़ार रुपये राशि का एक वर्ष हो गया हो तो ज़कात(दान) निकलना फ़र्ज़ है
  • इबादतों में एक इबादत है ज़कात(दान)
  • मस्जिद में,मदरसा और कब्रिस्तान के निर्माण कार्य में नहीं लगेगा ज़कात(दान) का पैसा
  • ज़कात नहीं देने वाला होता है गुनाहगार
  • शुरू हुआ रमज़ान का दूसरा मगफिरत का अशरा(दहाई)
  • ज़कात का इनकार करने वाला इस्लाम के दायरे से हो जाता है बाहर 

जमुई:-

इस्लाम में इंसानों पर पांच चीजें फ़र्ज़ की गई है। जिसे हर हाल में सभी व्यक्ति को मानना है और उस फ़र्ज़ के दायरे में जो भी व्यक्ति आता है

उसे उस फ़र्ज़(ज़िम्मेदारी)के मुताबिक पूरा भी करना है। पांच फ़र्ज़ में अल्लाह को मानना, नामाज़ पढ़ना,रोज़ा रखना,हज करना और ज़कात(दान)देना शामिल हैं।इन पांचों फर्ज में से अगर इंसान किसी एक को भी मानने से या उसे पूरा करने से इनकार करता है तो ऐसे में वो इस्लाम की मुखालफत/विरोध  करता है।जो गुनाहगार की भागीदारी है।

*कौन फ़र्ज़(ज़िम्मेदारी)कब और कैसे अदा करना है*

वहीं मौलाना नसीम इकबाल नदवी ने बताया कि पांच फ़र्ज़ में से एक अल्लाह को मानना ये गरीब,अमीर सभी तबके के लोगों की ज़िम्मेदारी है लेकिन इसके अलावे जो भी फ़र्ज़(जिम्मेदारी) है सभी के अलग-अलग रूल हैं।

आगे उन्होंने बताया कि नामाज़ बालिग और स्वस्थ्य सभी लोगों पर फ़र्ज़ है।सफर के दौरान, बीमार की हालत में नामाज़ फ़र्ज़ नहीं है।वो बाद में नामज़ अदा कर सकते हैं।वहीं "रोज़ा" साल में एक महीना ही फ़र्ज़ है।और वैसे लोगों पर फ़र्ज़ है जो स्वास्थ्य हों। बीमार की हालत में सफर के दौरान रोज़ा फ़र्ज़ नहीं है।"हज"हज उनलोगों पर फ़र्ज़ है

जो साहबे निसाब हैं यानी जो दौलतमंद लोग हैं जिनके पास जायज/हलाल पैसा है उन पर  ज़िंदगी में एक बार हज करना फ़र्ज़ है।अब "ज़कात"यानी दान उस बालिग दौलतमंद व्यक्ति जो कर्ज में डूबा न हो उसपर फ़र्ज़ है।अपने जमा पूंजी से एक वर्ष बाद कभी भी किसी भी वक़्त निकाल सकता है।बशर्ते कि उस पैसे का साल लग गया हो।

क्या है ज़कात(दान)

सारी इबादतों में से एक इबादत जकात है।ज़कात प्यूरीफाई करने की वह इस्लामिक मशीन है जिससे इंसान का रुपया/पैसा बिल्कुल साफ-सुथरा हो जाता  है।ज़कात उनलोगों के लिए फर्ज/जिम्मेदारी है,जो लोग ज़कात के इस्लामिक रूल में आते हैं।उसे हर हाल में अपने रुपयों का ढाई प्रतिशत खर्च करना अनिवार्य है।

किन लोगों पर फ़र्ज़ है ज़कात

ज़कात हर दौलतमंद लोगों पर फ़र्ज़ है। जकात उन लोगों पर फ़र्ज़ है जो 7.5 तोला सोना यानी 80 ग्राम जिसका बाजार मूल्य लगभग 2.5 लाख और 52.5 तोला चांदी 572 ग्राम जिसका बाजार मूल्य लगभग 21000 रुपया रखता हो उस पर ज़कात फ़र्ज़ है।

अगर किसी के पास उतने सोने और चांदी न हों लेकिन उसके बराबर रुपया हो और वह रुपये एक जगह जमा हो जिसका साल पूरा होने पर उस पूरे रुपये का ढाई प्रतिशत ज़कात निकालना फ़र्ज़ है।एक और खास बात अगर किसी के पास 10 तोला चांदी हो और एक भर सोना हो तो उस सोने के मूल्य से अगर 52.5 तोला चांदी खरीदा जा सकता है तो उसपर भी ज़कात फर्ज है।

किसी भी महीने में निकाल सकते हैं ज़कात

वहीं मौलाना नसीम इकबाल नदवी ने बताया कि रमजान के महीने में ही जकात निकलना फ़र्ज़ नहीं है।ज़कात कभी भी किसी भी वक़्त या महीने में निकाला जा सकता है।जो व्यक्ति ज़कात के दायरे में जिस वक्त आ जाये उसपर उसी वक़्त से ज़कात फ़र्ज़ हो जाता है।आगे उन्होंने कहा कि हमेशा यह देखा जाता है कि लोग रमज़ान के महीने में ही ज़कात निकालते हैं।ऐसी बातें किसी भी किताब से नहीं मिलती है।

लेकिन इस महीने में ज़कात देने से ज़्यादा फायदा होता है।क्योंकि इस महीने में कोई भी नेक काम या इबादत में 70 गुना की बढ़ोतरी कर दी जाती है जिस वजह से ज़्यादातर लोग रमज़ान के महीने में ही ज़कात निकालते हैं।

इन चीजों पर भी ज़कात है फ़र्ज़

ज़कात सोना,चांदी रुपयों,पैसों के अलावा प्रोपर्टी की भी निकाली जाती है ज़कात।इसकी विस्तारपूर्वक जानकारी देते हुए मौलाना नसीम इकबाल नदवी ने बताया कि जिस व्यक्ति के पास 7.5 तोला सोना या 52.5 तोला चांदी हो या इसके बराबर रुपया हो उसपर ज़कात फ़र्ज़ है।लेकिन इसके अलावा व्यक्ति के उस प्रोपर्टी पर भी ज़कात फ़र्ज़ है

जिसकी सालाना आमदनी इस सोना के पैसा ढाई लाख रुपये के बराबर हो।चाहे वो रुपया अपने मकान या दुकान से किराये के रूप में क्यों न आये।इतना ही नहीं उस परती ज़मीन का भी ज़कात निकालना है जिसे बेच कर मुनाफा कमाने की नीयत से खरीदा हो और उस जमीन का एक साल पूरा हो गया हो तब हर हाल में उस व्यक्ति को ज़मीन के मार्केट मूल्य से ढाई प्रतिशत ज़कात निकालना होगा।

मस्जिद में नहीं दी जाती है ज़कात

मौलाना नसीम इकबाल नदवी ने बताया कि किसी भी हाल में ज़कात का पैसा मस्जिद में नहीं दी जाती है।क्योंकि मस्जिद की बुनियाद जायज ज़मीन और रुपयों से की जाती है।ज़कात का असल मकसद गरीब तबके के लोगों को लाभ पहुंचाना है।

मदरसे के निर्माण में नहीं लगाई जाती है ज़कात का पैसा

वहीं मौलाना इकबाल नदवी ने कहा कि जिस प्रकार मस्जिद में ज़कात का पैसा नहीं दिया जाता है ठीक उससे थोड़ा फर्क यह है कि मदरसे में ज़कात का पैसा दी जाती है लेकिन उस पैसे को पढ़ रहे बच्चों पर खर्च की जाएगी न कि मदरसे के निर्माण कार्य में खर्च की जाएगी।

इन लोगों को दें ज़कात का पैसा

ज़कात का पैसा मुख्य रूप से पड़ोसी,गरीब,लाचार,लोगों के अलावा मदरसा और इस्लामिक संगठन को दी जाती है।लेकिन इसमें भी इस्लामिक रूल हैं।अगर कोई भी दौलतमंद व्यक्ति जब अपने जायज माल से ढाई प्रतिशत ज़कात निकाले तो उसका सबसे पहला हक़ अपने परिवार में से जो गरीबी की हाल में है उसका बनता है।

उसके बाद अपने गरीब दोस्त/साथी का।फिर इस पैसे पर पड़ोसी का हक़ आता है उसके बाद मदरसा का जहाँ यतीम और गरीब बच्चे पढ़ाई करते हैं।या इस्लामिक संगठन का।वह संगठन जो गरीबों के लिए लड़ता हो,गरीब के बेटी की शादी करवाता हो,जेल में फंसे बेगुनाह लोगों को छुड़ाने में खर्च करता हो वैसे संगठन को भी ज़कात का पैसा दे सकते हैं।

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