मशरूम की खेती किसानो के लिए हो रही है फायदेमंद, कम लागत में कर रहे हैं अधिक आय अर्जित।

 मशरूम की खेती किसानो के लिए हो रही है फायदेमंद, कम लागत में कर रहे हैं अधिक आय अर्जित।

करनाल 18 फरवरी, किसान की जिन्दगी संघर्ष भरी है, इसे कभी सुखे के सामना करना पड़ता है तो कभी पाले व ओले की मार सहन करनी पड़ती है। लगातार घटती जा रही खेती की जमीन व मंहगाई किसान के लिए एक चुनौती बन गई है। ऐसे में आमदनी बढ़ाना किसान के लिए एक टेढ़ी खीर है, लेकिन प्रदेश के मेहनतकश किसानों ने कृषि वैज्ञानिकों द्वारा इज़ाद की गई नई-नई तकनीक की जानकारी लेकर परपंरागत गेहूं व धान की फसल के स्थान पर मशरूम की नकदी फसल को न केवल विकल्प के रूप में चुना है, बल्कि एक व्यवसाय के रूप में अपनाया है। करनाल जिला के इन्द्री खंड में मशरूम की खेती के प्रति किसानों का काफी रूझान बढ़ा है। मशरूम जहां पौष्टिक व स्वादिष्ट शाकाहारी सब्जी है वहीं इसका प्रयोग आचार, बिस्कुट, पकौड़ा, खीर, पुलाव, सूप व चटनी समेत अनेक स्वादिष्ट व्यंजन बनाए जाने में भी किया जाता है। 

इन्द्री खंड के गांव कमालपुर रोडान निवासी शिक्षित बेरोजगार युवा सुशील कुमार ने मशरूम की पैदावार लेने के लिए थोड़ी कृषि योग्य भूमि होने के बावजूद बागवानी विभाग की सहायता से ऋण लेकर 20 लाख रुपये की लागता से 50 बाई 40 का शैड बनाया है। इसमें 8 लाख रुपये की अनुदान राशि भी शामिल है।  प्रगतिशील किसान का कहना है कि कम लागत में अधिक आय प्राप्त करना है तो किसानों को नकदी फसलों को अपनाना होगा। इसका दूसरा फायदा निरंतर घट रहे भूमि जल को भी संरक्षण मिलता है। उन्होंने कहा कि मशरूम खेती को दूसरी फसलों के साथ-साथ आसानी से किया जा सकता है। इस फसल का उत्पादन अक्तूबर माह से मार्च माह तक किया जा सकता है, जो किसानों का फ्री समय होता है।

उन्होंने बताया कि भूमिहीन व मजदूर लोग भी थोड़ी से थोड़ी जगह में यहां तक की अपने खाली पड़े प्लाट में भी मशरूम की पैदावार ले सकते हैं। उन्होंने बताया कि 2 हजार वर्ग फीट के शैड में करीब 3500 बैग रखे गए है। इसमें एक बैग को तैयार करने में करीब 50 से 60 रुपये का खर्च आता है और सीजन में एक बैग से करीब साढे तीन किलो मशरूम का उत्पादन होता है। उनका कहना था कि इस शैड से सीजन में पांच लाख रुपये तक की मशरूम का उत्पादन होता है, खर्चा निकालकर एक सीजन में 3 लाख रुपये की बचत हो जाती है।

उन्होंने कहा कि मशरूम की दिन प्रतिदिन लोगों में मांग बढ़ती जा रही है क्योंकि शाकाहारी व्यक्ति मांस से भी ज्यादा मशरूम से प्रोटीन ले सकते हैं, वैज्ञानिकों का तो यहां तक कहना है कि इसमें सेब से भी 20 गुणा ज्यादा प्रोटीन होती है। मशरूम को बेचने में भी किसी प्रकार की परेशानी का सामना नहीं करना पड़ता और यह छोटे से छोटे कस्बों व शहर में भी आसानी से बिक जाती है। इतना ही नहीं शादियों के सीजन में तो इसकी डिमांट भी पूरी करना किसानों के लिए मुश्किल हो जाता है। बड़े-बड़े होटलों, रैस्टोरैंटों व मैरिज पैलेसों के संचालक मशरूम खरीदने के लिए ही उनके घरद्वार पर पहुंच जाते हैं। मशरूम का उत्पादन लेने के बाद बचे हुए कम्पोस्ट को जैविक खाद के रूप में भी किसान प्रयोग कर सकते हैं। 

उन्होंने बताया कि मशरूम की खेती के बारे में बागवानी विभाग के अधिकारी डा. मदन लाल की प्रेरणा से मुरथल प्रशिक्षण केन्द्र से प्रशिक्षण प्राप्त किया। प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद उन्होंने इस क्षेत्र में काम करना शुरू कर दिया था। कार्य के दौरान जब भी काफी तकनीकि जानकारी की जरूरत पडती है तो विभाग के अधिकारियों द्वारा पूरा सहयोग दिया जाता है। उन्होंने कहा कि इस कारोबार के शुरू करने से उनके सामने अब बेरोजगारी की कोई समस्या नहीं है, बल्कि दूसरे मजदूर लोगों को भी रोजगार मुहैया करवा रहे हैं। उन्होंने युवाओं का आह्वान किया कि वे सरकारी नौकरी प्राप्त करने के पीछे अपना समय बर्बाद न करे, बल्कि शिक्षा ग्रहण करके स्वरोजगार को अपनाएं। स्वरोजगार स्थापित करने के लिए सरकार की ओर से चलाई जा रही जनकल्याणकारी योजनाओं का लाभ उठाकर आत्मनिर्भर बनें। 

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