राम के सत्यरूपी अग्रिबाण से असत्य रूपी रावण जला

 राम के सत्यरूपी अग्रिबाण से असत्य रूपी रावण जला


राम के सत्यरूपी अग्रिबाण से असत्य रूपी रावण जला


रामलीला मैदान में राम-रावण युद्ध की शानदार लीला हुई


भगवान श्रीराम का किया गया अभिषेक 


ललितपुर। Antim kumar jain/ Arif khan

श्री रामलीला हनुमान जयन्ती महोत्सव समिति के तत्वाधान में विजयदशमी का पर्व पूर्ण अगाद्ध श्रृद्धा एवं उत्साह के साथ मनाया गया। प्रत्येक वर्ष की भांति इस वर्ष भी जनपद मेंं कई स्थानों पर रावण दहन हुआ। जो बुराई पर अच्छाई का प्रतीत भी माना जाता है।

सर्वप्रथम रावण की सवारी अपने दर्जनोंं सैनिको सहित व भाई कुंभकरण व मेघनाथ सहित मुहल्ला रावयतनाया मेंं युद्ध स्थल पर पहुंचे। जहां पर पहले से उपस्थित भगवान श्री राम-लक्ष्मण जामबंत जी,  सुग्रीव आदि की सेना के बीच भीषण युद्ध हुआ। तत्पश्चात युद्ध में भगवान श्रीराम ने रावण की नाभि मेंं तीर मारा और 51 फुट के रावण व 41-41 फुट के मेघनाथ, कुंभकरण के पुतले धू-धू कर जल उठे। राम-रावण युद्ध के पूर्व राज्यमंत्री मनोहर लाल पंथ, सदर विधायक रामरतन कुशवाहा, जिलाधिकारी मानवेन्द्र सिंह, पुलिस अधीक्षक कै. एम.एम. बेग, नगर पालिका अध्यक्ष रजनी साहू, सदर बीके सिंह, नवनीत किलेदार आदि भगवान श्रीराम का तिलक कर आरती की। 


विजय दशमी के महत्व को बताते हुये तांत्रिक पवन शास्त्री ने बताया कि विजयदशमी हिन्दुओं का प्रमुख त्योहार है। यह असत्य पर सत्य और बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है। मान्यता है कि भगवान श्री राम ने दशमी के दिन 10 सिर वाले अधर्मी रावण को मार गिराया था। यही नहीं इसी दिन मां दुर्गा ने महिषासुर नाम के दानव का वध कर उसके आतंक से देवताओं को मुक्त किया था। नवरात्रि के नौ दिनों के बाद 10वें दिन नौ शक्तियों के विजय के उत्सव के रूप में विजयदशमी मनाई जाती है। शरद नवरात्र के 10 वें दिन और दीपावली से ठीक 20 दिन पहले दशहरा आता है, मान्यता है कि आश्विन मास की शुक्ल पक्ष की दशमी को विजयदशमी या दशहरे का त्योहार मनाया जाता है। मंगलवार को जनपद मेंं रात  में रावण का दहन किया गया। इसके बाद एक-दूसरे को पान खिलाकर गले-मिलकर विजयदशमी  बधाई दी। 

 


दशहरा का महत्व

 दशहरा का धार्मिक महत्व तो है ही,  लेकिन यह त्योहार आज भी बेहद प्रासंगिक है। यह पर्व बुराई पर अच्छाई का प्रतीक है। आज भी कई बुराइयों के रूप में रावण जिंदा है। यह त्योहार हमें हर साल याद दिलाता है कि हम बुराई रूपी रावण का नाश करके ही जीवन को बेहतर बना सकते हैं, महंगाई, भ्रष्टाचार, व्यभिचार, बेईमानी, हिंसा, भेदभाव, ईष्या-द्वेष, पर्यावरण प्रदूषण, यौन हिंसा और यौन शोषण जैसी तमाम ऐसी बुराइयां हैं जो आज भी अपना अट्टाहस कर मानवता और सभ्य समाज को चुनौती दे रही हैं, ऐसे में जरूरी है कि हम दशहरा के दिन इनको जड़ से खत्म करने का संकल्प लें। तभी हम सही मायनों में दशहरा की महत्ता को समझ पाएंगे।


क्यों मनाई जाती है विजयदशमी  

शास्त्री जी ने बताया कि दशहरा मनाए जाने को लेकर कई मान्यताएं प्रचलित हैं। एक कथा के मुताबिक महिषासुर नाम का एक बड़ा शक्तिशाली राक्षस था, उसने अमर होने के लिए ब्रह्मा की कठोर तपस्या की, ब्रह्माजी ने उसकी तपस्या से खुश होकर उससे वरदान मांगने के लिए कहा, महषिासुर ने अमर होने का वरदान मांगा।  इस पर ब्रह्माजी ने उससे कहा कि जो इस संसार में पैदा हुआ है, उसकी मृत्यु निश्चित है। इसलिए जीवन और मृत्यु को छोडक़र जो चाहे मांग सकते हो।

ब्रह्मा की बातें सुनकर महिषासुर ने कहा कि फिर उसे ऐसा वरदान चाहिए कि उसकी मृत्यु देवता और मनुष्य के बजाए किसी स्त्री के हाथों हो। ब्रह्माजी से ऐसा वरदान पाकर महिषासुर राक्षसों का राजा बन गया और उसने देवताओं पर आक्रमण कर दिया। देवता युद्ध हार गए और देवलोकर पर महिषासुर का राज हो गया। महिषासुर से रक्षा करने के लिए सभी देवताओं ने भगवान विष्णु के साथ आदि शक्ति की आराधना की। इस दौरान सभी देवताओं के शरीर से एक दिव्य रोशनी निकली जिसने देवी दुर्गा का रूप धारण कर लिया।

शस्त्रों से सुसज्जित मां दुर्गा ने महिषासुर से नौ दिनों तक भीषण युद्ध करने के बाद 10वें दिन उसका वध कर दिया। इसलिए इस दिन को विजयदशमी के रूप में मनाया जाता है। महिषासुर का नाश करने की वजह से दुर्गा मां महिषासुरमर्दिनी नाम से प्रसिद्ध हो गईं।

 

Comments