परिक्रमा हादसाः मौन साध गये यमुना पर ’आंदोलन-आंदोलन’ खेलने वाले

 परिक्रमा हादसाः मौन साध गये यमुना पर ’आंदोलन-आंदोलन’ खेलने वाले
  1. -प्रशासन ने यात्रा संयोजकों तो बदले में यात्रा संयोजकों ने प्रशासन को दे दी क्लिीनचिट
  2. -मान मंदिर बरसाना ने भी साधी चुप्पी, पद्मश्री रमेश बाबा ने प्रशासन को दी क्लीनचिट
  3. -खुद मानमंदिर ने यमुना शुद्धिकरण के लिए चलाया था बडा आंदोलन

मथुरा

यमुना शुद्धिकरण के लिए आसमान सिर पर उठालेने वाले यमुना भक्त भूमिगत हो गये हैं। बातबात पर आंदोलन आंदोलन खेलने की इनकी आदत भी छूट गई है। मानमंदिर बरसाना के संत रमेशबाबा की राधारानी ब्रजयात्रा मंे इतना बडा हादसा हो गया। जिसमें प्रशासन की लापरवाही, यात्रा संयोजकों की अदूरदर्शिता और यमुना की विषाक्तता सब समाने आ रही हैं। लेकिन यमुना की पीर पर अब पसीजने वाला कोई नजर नहीं आ रहा है।

यहां तक कि जिस मानमंदिर बरसाना ने यमुना आंदोलन के अतिहास में सबसे बडा बखेडा किया वह भी यमुना की विषाक्तता और सरकारों की लापरवाही पर चुप्पी साधे है। हजारों श्रद्धालुओं की जान जोखिम में डालने वाले इतने बडे वाकये को ऐसे आया गया किया जा रहा है जैसे कुछ हुआ ही नहीं। 13 हजार परिक्रमार्थी रस्सी के सहारे यमुनापार कर रहे थे। खुद यात्रा संयोजक सुनील सिंह ने यह कई बार स्वीकार है कि हरियणा प्रशासन से पांच दिन तक लगातार संपर्क में रहे और प्रशासन आश्वासन देता रहा कि यमुना पर यात्रा के लिए वैकिल्पक पुल की व्यवस्था करा दी जाएगी।

पुल की व्यवस्था नहीं हो सकती थी तो श्रद्धालुओं को स्टीमर या नावों के द्वारा यमुना पार कराई जाती। ऐसा भी संभव नहीं था तो 13 हजार श्रद्धालुओं की जान जोखिम में डालने से बेहतर था कि इस यात्रा को आगे बढने से यहीं रोक दिया जाता। वैसे भी यह यात्रा कोई सदियों पुरानी सनातन परंपरा नहीं रही है, जिसे रोका ही नहीं जा सकता था। अपने आर्थिक लाभ, शिष्यों की संख्या बढाने, प्रभाव बढाने और शिष्यों को सततरूप से खुद से जोडे रखने के लिए तमाम भागवताचार्यों, मंदिरों, मठों और संतों ने इस तरह की वार्षिक ब्रज चैरासी कोसी यात्राओं की शुरूआत करा दी है। इन यात्राओं में इनसे जुडे लोग ही सामिल होते हैं।

जयगुरूदेव आश्राम वर्ष में दो बार मेला लगाता है। यह उपक्रम भी अपने अनुयाईयों को खुद से जोडे रखने का ही एक प्रयास है और इस तरह की शोभायात्राएं भी। हजारों श्रद्धालुओं की जानजोखिम में डालने के लिए यात्रा संयोजकों पर किसी तरह की कोई कार्यवाही प्रशासन की ओर से नहीं की गई है। इसकी एवेज में यात्रा संयोजकों ने प्रशासन को क्लिीनचिट दे दी है। अगर किसी ओर से भी कार्यवाही होती तो यह कार्यवाही दोहरी होनी थी। ऐसे में हजारों श्रद्धालुओं की जान जोखिम में डालने के जोखिम को कम करके आंका गया है। इतना ही नहीं जिन दो श्रद्धालुओं की मौत हुई है उनका जिम्मेदार कौन है इस पर भी सभी मौन साध गये हैं।

डूबने पर पेट में पानी का भरजाना आचमन कैसे हो सकता है

यात्रा संयोजक सुनील सिंह ने खुद कई बार यह स्वीकार किया है कि रस्सी के सहारे यात्री यमुनापार कर रहे थे। इसी दौरान कुछ की लम्बाई कम थी, कुछ कमजोर और वृद्ध थे। ऐसे में वह डूबने लगे और यमुना का पानी उनके मुहं में चला गया। इस तरह से किसी के पेट में पानी के चले जाने को आचमन कैसे कहा जा सकता है। जबकि हर ओर से इसे आचमन से श्रद्धालुओं के बीमार होने की बात कह कर प्रचारित प्रसारित किया जा रहा है।

चिकित्सक बता रहे फूडपोइजनिंग, प्रशासन ले रहा खाने के नमूने
हद तो तब हो गई जब इस घटना को पहले फूड पोइजनिंग कह कर नकारने का प्रयास किया गया। प्रशासन ने यात्रा के दौरान दिये जा रहे भोजन के नमूने लिए। यमुनाजल के नमूने लेने की भी नमूनागीरी की गई। जबकि यमुना का जल कितना विषाक्त है इस पर तामाम रिपोर्ट पहले से ही मौजूद हैं।

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