अब तो गुम हो गया चिट्ठियों का चलन  सुधीर मिश्रा की रिपोर्ट 

अब तो गुम हो गया चिट्ठियों का चलन  सुधीर मिश्रा की रिपोर्ट 

अब तो गुम हो गया चिट्ठियों का चलन 
सुधीर मिश्रा की रिपोर्ट 


पहला (सीतापुर )

चिट्ठी न कोई संदेश, जाने वो कौन सा देश जहां तुम चले गए यह इसलिए क्योंकि चिट्ठियां चलन से बाहर हो गई है

कस्बे के महेन्द्र मौर्या बताते है कि मुझे याद नही कि अन्तिम बार घर चिट्ठी कब आई व अंतिम चिट्ठी कब लिखी यह गुजरे जमाने की बात हो गई जब लोग घंटो बैठकर अपने सगे -संबधियो को पोस्ट कार्ड अथवा अंतर्देशीय पत्र लिखते थे घर मे जब चिट्ठी आ जाती थी तो एक एक कर घर के सब लोग पढ़ते थे सामूहिक रूप से घर मे चिट्ठी पढ़ी जाती थी !


चिट्ठियों का चलन से बाहर होने का मुख्य कारण बीते दशक मे संचार क्रांति का आना है अब उद्योग पतियों से लेकर मजदूरी करने वाले हाथों मे मोबाइल फोन देखा जा सकता है बीएसएनएल, रिलायंस, एयरटेल ,बोडाफोन, टाटा इनडकाम तथा आइडिया के लाखों उपभोक्ता है

दशक पूर्व की बात करे तो उस समय इन तमाम दूरसंचार विभाग के उपभोक्ताओं की संख्या कुछ हजार तक ही सीमित थी मौजूदा दौर में चिट्ठियों के चलन की बात करे तो अब इनका प्रयोग या तो शासकीय कार्यो मे किया जाता है या फिर नौकरी अथवा शैछिक संस्थाओ मे प्रवेश के आवेदन करने में या फिर व्यवसायिक डाक सामग्री भेजने में डाक टिकटों लिफाफों और पोस्टकार्डो का प्रयोग किया जाता है 


चिट्ठी -चपाती के माध्यम से हाल चाल लेने का चलन करीब करीब बंद हो चुका है इनका स्थान मोबाइल और इन्टरनेट ने ले लिया है एक दशक पूर्व जहां डाकखानो पर अंतर्देशीय तथा पोस्टकार्ड लेने वालो की भीड़ रहती थी अब इनके ग्राहको की संख्या बेहद सीमित हो गई है 
डाक घर पर डाक सामग्री बिक्री कार्य कर रहे कर्मचारी बताते है कि पोस्ट कार्ड व अंतर्देशीय की बिक्री यदा कदा कही हो जाती है

मसलन बैंको व अन्य संस्थाओ की ओर से अंतर्देशीय की खरीद नोटिस देने के लिए तथा बेरोजगारों की ओर से नौकरी के आवेदन मे लगाने के लिए पोस्टकार्डो की खरीद की जाती है 


शिक्षक शिव प्रकाश सिंह बताते है कि करीब पन्द्रह वर्ष पहले उनके घर आखरी बार किसी रिश्तेदार का पत्र आया था एक दो वर्षो तक नव वर्ष पर बधाई कार्ड आए उनमे लिखे संदेशो से चिट्ठी की याद ताजा हुई उसके बाद से चिट्ठियों का अदान प्रदान कभी नही हुआ अकेले शिव प्रकाश ही नही कस्बे के अशोक गुप्ता कृष्ण कुमार रस्तोगी रामचंद्र बाल्मीकि बाबूराम मिश्रा सियाराम दिलीप जायसवाल राकेश रस्तोगी

मुनेशवर दयाल चौरसिया ओमप्रकाश मास्टर नूर मोहम्मद शंतोष वर्मा राम कृपाल राम कुमार गुप्ता राजेंद्र प्रसाद वर्मा तथा किसान बच्चा लाल मुंशी दयाल विजय वर्मा इस बात को स्वीकारतेहै कि संचार क्रान्ति से चिट्ठियां चलन से लगभग बाहर हो चुकी है

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