राजनीति एक विषलेशण

राजनीति एक विषलेशण

राजनीति एक विषलेशण

इसके पूर्व मैं कुछ लिखूं, यह आवश्यक है कि बता दूँ कि मै किसी राजनैतिक विचारधारा अथवा विद्वेष से प्रेरित हो कर यह लेख नहीं लिख रहा हूँ ।  राजनैतिक विश्लेषण यदि पूर्वाग्रह से ग्रसित है तो वह कभी सत्य के निकट नहीं पहुंच सकता। राजनीति पत्थर की मूर्ति नहीं है, यह समयानुसार एवं परिस्थितियों के अनुसार बदलती रहती है, पर वस्तविक लक्ष्य ऐक ही होना चाहिये और वह है उस समाज का सर्वोन्मुखी  विकास, 

यद्दपि वर्तमान के परिपेक्ष्य में ऐसा नहीं है। समझने की बात यह है की राजनीति की नाव के मांझी कौन हैं ? दुर्भाग्य है कि वर्तमान के 90% से ज्यादा राजनीतिज्ञ अपनी प्रभुता और धन संचय से अधिक कुछ और नहीं सोचते, वे गरीब और मज़्लूमों के नाम पर सत्ता में तो आते हैं पर उनके लिये न तो कुछ सोचते हैं और न ही कुछ करते हैं  जिन्होने उन्हें हैसियत दी है। एक उदाहरण प्रस्तुत है- एक गरीब मज़दूर जो फटे कपड़ो में  ऐक जगह मजदूरी  कर रहा था, से युँ ही किसी ने पूंछा,  कि तुम चुनाव में किसे वोट दोगे, 

उस गरीब का सीधा सा जवाब था () उन्हीं को जिन्हें पिछली बार दिया था। इस उत्तर ने मुझे सोचने पर मजबूर किया कि इतनी दुर्दशा के बावजूद ये ब्यक्ति क्युं () उन्हीं को वोट देगा? सीधा सा उत्तर मिला की हम जिस राजनैतिक विरासत को ढो रहे हैं, उसने हमे आपस मे नफ़रत करना ही सिखाया है, हमे बैमनस्य्य करना सिखाया है, हमे ऊंच नीच सिखाया है, हमे अलग होना सिखाया, हमे ऐक दूसरे से मुहं मोड़ना सिखाया है। हम राजनीतिज्ञों के स्वार्थपूर्ति का साधन मात्र बन कर रह गऐ हैं। आज स्थिति यह है कि सरकार किसी पार्टी की हो, भ्रस्टाचार उनमूलन की बात तो सभी करते हैं पर धरातल पर इसके लिये किसी भी प्रकार का प्रयास नहीं करते। 

तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग भी अपने दायित्यों को पूरा करने में पूर्णत: असफल रहा है, यही नहीं समाज के  मध्यम वर्ग का सहयोग  सामाजिक उत्तथान में नकारत्मक रहा है। सूचना के माध्यम, न्याय प्रक्रिया आदि स्वतंत्रता एवं सम्प्रभुता के नाम पर स्वच्छन्द हो रहे हैं, कौन नहीं जानता कि कचेहरिओं में पेशी लगवाने में, दूसरी अदालत में केस ट्रान्सफर कराने में, फ़ैसला प्रभावित करवाने में क्या क्या होता है। नेताओं की भाँति मिडिया वाले देखते देखते कैसे धन कुबेर बन जाते हैं, न तू मेरी कह न मैं तेरी, इसी सिद्धांत पर सभी चल रहे हैं और मलाई खा रहे हैं।  
यदि केवल इतना ही हो जाय कि किसी नेता और उसके निकट संबंधी के राजनीति में आने के पहले कितनी संपत्ति थी और पांच साल बाद कितनी संपत्ति हुई, यही बहुत है। आज समाज इतने खित्तों में बँट गया है कि कुछ भी अच्छा करना, चाहे अच्छी नियत से ही हो, बहुत मुश्किल हो गया है। तुम सवर्ण हो तुम्हारी अलग पार्टी, तुम दलित हो तुम्हारी अलग पार्टी, तुम बैकवर्ड हो तुम्हारी अलग पार्टी, तुम ब्यापारी हो तुम्हारी अलग पार्टी, तुम दक्षिण के हो, तुम उत्तर के हो, तुम इस क्षेत्र के हो, तुम उस क्षेत्र के हो, विभाजन और सर्फ ब्यक्ति और समाज का विभाजन, अपने स्वार्थ के लिये सर्फ सत्ता के लिये। 
और हम आपसी विद्वेश के कारण सत्य को या तो देखना नहीं चाहते हैं और या तो देख ही नहीं पाते हैं। सोचने की बात है कल तक जो मुश्किल से जीवन की आवश्यक्ताओं से निपट पाते थे, आज ईरानी कालीनों पर उनके पैर छिलते हैं। एक सम्पूर्ण क्रांति का हस्र हम देख चुके हैं, दूसरे की कल्पना से भी डर लगता है, क्या समाधान है विकृतियों से मुक्ति पाने का दूर दूर तक नज़र नहीं आता है, पर हथियार छोड़ने से भी तो नहीं चलेगा। ऐक ईमानदार सामाजिक मंथन की आवश्यकता है , समस्या है तो समाधान भी कुछ होगा ही।                                                                   
                                                                       ओ.पी.श्रीवास्तव

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