लोकतंत्र का तमाशा

लोकतंत्र का तमाशा

(स्वतंत्र विचार)।

देश में इस समय चुनाव का दौर चल रहा है, सभी राजनैतिक पार्टियाँ, विभिन्न दलों के प्रत्याशी जनता को गुमराह करने में लगे हैं और भीड़ की शक्ल में जनता हर मीटिंग में पहुँच कर तालियाँ बजाने का, नारे लगाने का अपना रोल अदा कर रही है ।

 

मेरा मानना है कि हिंदुस्तान में लोकतंत्र एक तमाशा वाला खेल है, अपना छदम् खेल दिखाकर जनता को गुमराह करने की कला में पारंगत पार्टियां और लोग इस देश में राज कर रहे हैं और हम विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र का ढिंढोरा पीट कर अपनी पीठ स्वयं थपथपाने में गर्व और गौरव का अनुभव कर रहे हैं ।

इस देश के राजनैतिक दलों में राज करने की इच्छा इतनी प्रबल है कि अपनी जीत के लिए देश को भी दांव पर लगाने को तैयार रहती हैं और देश की महान जनता इतनी भोली भाली है कि छदम् खेल दिखाने वाले दलों की झूठी दलीलों को बार बार सही मानकर उन्हें सर आँखों पर बिठा लेती है, तभी तो देश में राजनैतिक दलों की, राजनेताओं की एक लंबी खेप पुष्पित पल्लवित हो रही है।

देश की 75 प्रतिशत जनता ग्रामीण है, इक्कीसवीं सदी में भी भारत की साक्षरता दर 74.04 प्रतिशत है, और 2001 की साक्षरता दर 65 प्रतिशत के मुकाबले रिकार्ड 9 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज हुई है । यानी आज भी देश की 26 प्रतिशत आबादी ऐसी है जो न लिखना जानती है और न पढ़ना किंतु उनके भी हाथों में देश का भविष्य चुनने की ताकत दे दी गई है । ये है लोकतंत्र की शक्ति। एक और आश्चर्य जनक बात यह है कि 74 प्रतिशत साक्षर आबादी में से भी लगभग आधी आबादी टूटी फूटी भाषा में लिखना और बड़ी मेहनत से शब्दों को जोड़ जोड़कर पढ़ना जानती हैं। ऐसे में उनकी सोच और समझ कितनी राष्ट्रीय हो सकती है, इसका आप आसानी से अंदाज़ा लगा सकते हैं।

क्या वाकई में यह लोकतंत्र की ताकत है या किसी राष्ट्र को कमजोर करने की साजिश ??

देश के सबसे बौद्धिक व्यक्ति को भी वही 1 वोट देने का अधिकार प्राप्त है और देश के सबसे बुद्धिहीन व्यक्ति को भी वही शक्ति प्राप्त है। लोकतंत्र का सारा खेल संख्याबल पर आधारित है। आप संख्या में ज्यादा हैं तो आपकी पूछ होगी, आपका सम्मान होगा। परंतु यदि आप संख्या में कम हैं और असंगठित भी हैं तो कोई आपको पूछने वाला नही भले आपकी सोच, समझ, बुद्धि, विवेक कितनी भी हो। आज देश में यह सब मायने ही नही रखता, सिर्फ संख्या मायने रखती है।

हास्यास्पद स्थिति तो तब उत्पन्न होती है, जब संख्याबल में अधिक होने के कारण इसी जनता का हमारे राजनेता महिमामंडन करते हैं और उन्हें तरह तरह के जातिवादी प्रलोभनों में फांसकर अपना उल्लू भी सीधा करते हैं और जनता भी कमाल की है, एक तो उनकी सोच और समझ स्थानीय स्तर से ऊपर की नही है, दूसरा उन्हें आसानी से बेवकूफ बनाया जा सकता है। मजेदार बात यह है कि बेवकूफ बनने के बाद, बग़ैर कोई सबक़ लिए अगली बार किसी दूसरे प्रत्याशी द्वारा बेवक़ूफ़ बनाया जाता है और यह सिलसिला निरंतर चला आ रहा है ।

आजकल तो कई राजनेता अपने पैसे से माला खरीदकर ले जाते हैं और खुद को ही पहनवाकर तालियां बटोरते है।आजकल तो भीड़ भी प्रायोजित, तालियां भी प्रायोजित और यहाँ तक कि अगले दिन की खबर भी प्रायोजित । प्रायोजित तरीकों से अपने को लोकप्रिय दिखाने के खेल में जो जीता वही सिकंदर।

कभी कभी सोचने पर मजबूर हो जाता हूँ कि लोकतंत्र इस देश के लिए वरदान है या अभिशाप।

देश के सबसे भ्रष्टतम् लोग, आपराधिक प्रवृति के लोग भी इस महान जनता की कृपा से उच्च पदों पर आसीन हैं और अपनी गन्दगी का विस्तार धड़ल्ले से कर रहे हैं। नैतिकता, मूल्यों, ईमानदारी की बात तो सभी करते हैं किंतु यथार्थ इससे कहीं अलग है, हिंदुस्तान के इतिहास में सर्वाधिक प्रभावशाली जन नेता राष्ट्रपिता महात्मा गांधी हुए

जिन्होंने समस्त सुख सुविधाओं से ख़ुद को दूर रखकर एक संत सरीखा जीवन जिया और एक धोती में सारा जीवन बिता दिया, डा०  एपीजे अब्दुल कलाम साहब सादगी, सेवा, समर्पण की एक अनोखी मिसाल हैं, किंतु आज के राजनेताओं ने ऐसे महान व्यक्तित्व वाले राजनेताओं के आचरण को न अपनाकर सिर्फ़ उनकी मूर्तियों पर माला पहनाने तक ख़ुद को सीमित रखा है, तभी तो राजनेता और राजनीति दोनों के प्रति लोगों का आकर्षण घटा है । किंतु सारा दोष नेता का ही नहीं है, असली दोष तो हमारा भी है, जो हम अपने छोटे मोटे स्वार्थों के खातिर माँ सरीखी इस पावन धरती की अस्मिता भी दांव पर लगाने से उनहीं चूकते।

आखिर कब तक चलता रहेगा ये खेल ? 

कब तक हमारे बनाये हुए रहनुमा, हमारा ही खून चूसते रहेंगे और हम उनका सामाजिक बहिष्कार करने की बजाय गुमराह होते रहेंगे।

समय आ गया है, अपना रहनुमा चुनने से पहले हर पहलू पर उसे परखे, जाने, समझे..........थोड़ी सी तड़क भड़क देखकर गुमराह होने की फितरत से ऊपर उठें।

चुने उसे हो सार्वजनिक और व्यक्तिगत जीवन में श्रेष्ठ हो, जिसमें स्वयं के हित के बजाय समाज और राष्ट्र के स्वाभिमान और सम्मान को बरकरार रखते हुए कुछ करने की इच्छा और ललक हो अन्यथा विश्व गुरु बनने का दम्भ भरने वाला हमारा यह महान देश अपने लक्ष्य से चूक जाएगा। 

निर्णय आपको करना है ?? क्योंकि सवाल आपके और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य का है !!

 

(लेखक- डा0 प्रवीण सिंह 'दीपक') 

 

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