अगर एमएसपी की मांग मानी तो देश के गरीबों को मिलने वाली सुविधाओं पर पडेगा असर

एमएसपी पर सभी फसल खरीदी तो सालाना खर्च होंगे 17 लाख करोड़ रुपये जो देश के कुल बजट का होगा आधा

 
एमएसपी(MSP) का जिन्न -अगर मानी गई 23 फसलों पर एमएसपी की मांग तो दिवालिया हो जाएगा हिंदुस्तान

केवल 6 फीसदी किसानों को ही मिल पाता है एमएसपी का फायदा

एमएसपी की जगह इनकम सपोर्ट हो सकता है एक कारगर तरीका

चंडीगढ़ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तीन कृषि कानूनों को वापस लेने का ऐलान तो कर दिया लेकिन इसके बावजूद किसान आंदोलन खत्म हो जाएगा, इस बात को लेकर अभी भी संशय बरकरार है। इस संशय का एक बड़ा कारण है एम.एस.पी. यानी कि न्यूनतम समर्थन मूल्य पर गारंटी का कानून जिसको लेकर मांग उठ रही है।

संयुक्त किसान मोर्चा नाम के किसान संगठन ने अब प्रधानमंत्री मोदी को एक चिट्ठी लिखी है, जिसमें उन्होंने 6 शर्तें और लगा दी, जिसमें सबसे ऊपर है एमएसपी यानी न्यूनतम समर्थन मूल्य को लेकर कानून बनाने की मांग।

आज हम आपको इस एमएसपी एमएसपी नाम के जिन्न के बारे में बताएंगे, जो किसान नेताओं को बहुत आकर्षक लगता है।लेकिन सच ये कि एमएसपी अर्थव्यवस्था का भी दिवाला निकाल देगा और इससे किसानों के हाथ भी कुछ नहीं लगेगा।


क्या हैं किसानों की 6 मांगें

◆ देश में एमएसपी को संवैधानिक दर्जा दिया जाए. यानी एमएसपी पर फसलों की खरीद सुनिश्चित करने के लिए एक कानून बनाया जाए, जो ऐसा नहीं होने पर आरोपियों को दंडित कर सके। हमारे देश में एमएसपी की व्यवस्था 55 वर्ष पुरानी है, लेकिन इसे आज तक संवैधानिक दर्जा नहीं मिला है।
◆ दूसरी मांग है Electricity Amendments Bill को वापस लिया जाए। इसके तहत अभी बिजली बिल पर किसानों को जो सब्सिडी मिलती है, वो बाद में Direct Benefit Transfer के जरिए मिला करेगी।
◆ मौजूदा कानून में पराली जलाने वाले किसानों के खिलाफ जो सजा का प्रावधान है, उसे खत्म किए जाए।
◆ किसान आन्दोलन के दौरान दिल्ली, हरियाणा और उत्तर प्रदेश समेत जिन राज्यों में पुलिस केस दर्ज हुए हैं, उन्हें वापस लिया जाए। अकेले दिल्ली में पिछले एक साल में 53 एफआईआर दर्ज हुई हैं और 183 किसानों को गिरफ्तार किया गया है। इन पर हत्या, दंगे भड़काने, पुलिस को उसका काम करने से रोकने और धमकी देने जैसे गम्भीर मामले हैं।
◆ लखीमपुर हिंसा में आरोपी आशीष मिश्रा के पिता और केन्द्रीय गृह राज्य मंत्री अजय मिश्रा टेनी को उनके पद से बर्खास्त किया जाए और उन्हें गिरफ्तार किया जाए।
◆ किसान आन्दोलन के दौरान मारे गए किसानों की याद में दिल्ली के सिंघू बॉर्डर पर शहीद स्मारक बनाया जाए।

आखिर क्या है न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी)

एमएसपी यानी मिनिमम सपोर्ट प्राइस या फिर न्यूनतम सर्मथन मूल्य सरकार की तरफ से किसानों की अनाज वाली कुछ फसलों के दाम की एक प्रकार की गारंटी होती है। राशन सिस्टम के तहत जरूरतमंद लोगों को अनाज मुहैया कराने के लिए इस एमएसपी पर सरकार किसानों से उनकी फसल खरीदती है। अगर कभी फसलों की कीमत बाजार के हिसाब से गिर भी जाती है, तब भी केंद्र सरकार तय न्यूनतम समर्थन मूल्य पर ही किसानों से फसल खरीदती है ताकि किसानों को नुकसान से बचाया जा सके।

एमएसपी किसी भी फसल की पूरे देश में एक ही होती है। अभी केंद्र सरकार 23 फसलों की खरीद एमएसपी पर करती है। कृषि मंत्रालय, भारत सरकार के अधीन कृषि लागत और मूल्य आयोग (कमीशन फॉर एग्रीकल्चर कॉस्ट एंड प्राइजेस CACP) की अनुशंसाओं के आधार पर एमएसपी तय की जाती है।

इन फसलों पर मिलती है एमएसपी

सरकार के तरफ से धान,गेहूं, मक्का, बाजरा,ज्वार, रागी, जौ, चना, अरहम, मूंग, उड़द, मसूर, मूंगफली तेल, सोयाबीन, सरसों, तिल, सूर्यमूखी,नाइजर सीड, कुसुम तेल , गन्ना, कपास, कच्चा जूट, नारियल पर एसएसपी दी जाती है।

केवल 6 फीसदी किसानों को ही मिल पाता है एमएसपी का फायदा

वर्ष 2015 में भारतीय खाद्य निगम  के पुनर्गठन का सुझाव देने के लिए बनी शांता कुमार समिति ने अपनी रिपोर्ट में बताया था कि एमएसपी का लाभ सिर्फ 6 प्रतिशत किसानों को ही मिल पाता है जिसका सीधा मतलब है कि देश के 94 फीसदी किसान एमएसपी के फायदे से दूर रहते हैं। वर्तमान में सरकार के अनुसार देश में किसानों की संख्या (किसान परिवार) 14.5 करोड़ है, इस लिहाज से 6 फीसदी किसान मतलब कुल संख्या 87 लाख हुई।

23 फसलों पर न्यूनतम समर्थन मूल्य की मांग स्वीकार करने से 2 साल मे दिवालिया हो जाएगा देश

केंद्र के तीन कृषि कानूनों के अध्ययन के लिए सुप्रीम कोर्ट की ओर से बनाए पैनल के सदस्य और किसान नेता अनिल घनावत का कहना है कि अगर 23 फसलों पर न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) दिए जाने की मांग को अगर सरकार स्वीकार कर लेती है तो इससे देश दिवालिया होने की कगार पर आ जाएगा।

केंद्र सरकार ने जहां कृषि कानून वापस लेने का ऐलान कर दिया है तो वहीं, अब किसानों ने अपने आंदोलन को तब तक जारी रखने का ऐलान किया है जब तक एमएसपी को लेकर उनकी मांगें स्वीकार नहीं कर ली जाती।

इकोनॉमिक टाइम्स की खबर के मुताबिक, शेतकारी संगठन के नेता घनावत ने कहा, 'एमएसपी चाहे केंद्र दे या राज्य, वह जल्द ही दिवालिया हो जाएगा। यह बहुत खतरनाक मांग है और लंबे समय तक पूरी नहीं की जा सकती। अगर इन्हें मान लिया जाता है तो दो साल के अंदर ही देश दिवालिया हो जाएगा।'

उनके मुताबिक, यह मांग आर्थिक बोझ बढ़ाने के साथ ही देश में स्थिति भी बेकाबू हो जाएगी। उनके मुताबिक, अगर सरकार अभी 23 फसलों पर एमएसपी की मांग को मान लेती है, तो बाद में दूसरे किसान भी अपनी फसलों को लेकर इसी तरह की मांग करेंगे। हर दूसरे दिन किसी न किसी राज्य में विरोध प्रदर्शन होंगे। एक बार आप किसी फसल पर एमएसपी दे देंगे, तो दूसरी फसलों पर भी देना पड़ेगा।


जब पैदावार बढ़ेगी तब खरीद कौन करेगा?

एमएसपी को कानून का दर्जा देने में सरकार के सामने क्या दिक्कते हैं? इसके बारे मे देश के कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि एमएसपी को कानूनन अनिवार्य बनाना बहुत मुश्किल है। पूरी दुनिया में कहीं भी ऐसा नहीं है। इसका सीधा सा मतलब यह भी होगा कि राइट टू एमएसपी। ऐसे में जिसे एमएसपी नहीं मिलेगा वह कोर्ट जा सकता है और न देने वाले को सजा हो सकती है।"

"अब मान लीजिए कि कल देश में बाजरे या चावल का उत्पादन बहुत ज्यादा हो जाता है और बाजार में कीमतें गिर जाती हैं तो वह फसल कौन खरीदेगा? कंपनियां कानून के डर से कम कीमत में फसल खरीदेंगी ही नहीं। ऐसे में फसल किसानों के पास ऐसी ही रखी रह जायेगा। लोगों को इसके दूसरे पहलुओं पर भी विचार करने चाहिए।"

देश में अभी जिन फसलों की खरीद एमएसपी पर हो रही है, उसके लिए हमेशा एक 'फेयर एवरेज क्वॉलिटी' तय होता है। मतलब फसल की एक निश्चित गुणवत्ता तय होती है, उसी पर किसान को न्यूनतम समर्थन मूल्य मिलता है। अब कोई फसल गुणवत्ता के मानकों पर खरी नहीं उतरती तो किसान तो उसे कैसे खरीदा जायेगा? अभी तो व्यापारी फसल की गुणवत्ता कम होने पर भी खरीद लेते हैं, लेकिन कानून बनने के बाद यह कैसे संभव हो पायेगा जब फसल की कीमत फिक्स कर दी जायेगी? इसके लागू करना मुश्किल होगा। व्यापारियों के सामने बड़ी मुश्किल आयेगी।

सरकार पर पड़ेगा बहुत बड़ा बोझ

अब सरकार का खर्च सिर्फ एमएसपी तक सीमित नहीं होता।उसे मंडी टैक्स, आढ़ती टैक्स, Rural Development Cess और मजदूरों पर अलग से खर्च करना पड़ता है। सरकारी गोदामों में अनाज को स्टोर करके रखना भी बड़ा महंगा काम है। जैसे अगर गेहूं की एमएसपी ढाई हजार रुपए प्रति क्विंटल है तो PDS में जनता को बांटने में सरकार को लगभग 3200 से 3500 रुपये प्रति क्विंटल खर्च करने पड़ेंगे। लेकिन लोगों को ये गेहूं 2 रुपये प्रति किलोग्राम में ही उपलब्ध कराया जाएगा। पिछले साल लॉकडाउन में तो सरकार ने 80 करोड़ लोगों को ये अनाज मुफ्त में बांटा था।

अब अगर केंद्र सरकार एमएसपी को कानून का रूप दे देती है तो उसे मौजूदा 23 फसलें खरीदने के लिए बाध्य होना पड़ेगा, जिस पर उसका सालाना खर्च 17 लाख करोड़ रुपये आएगा। ये पूरे देश के सालाना बजट का आधा है। इस साल के लिए देश का कुल बजट लगभग 34 लाख करोड़ रुपये है। किसानों की मांगों के अनुरूप अगर सरकार सभी फसलों का एमएसपी देती है तो शायद उसका खर्च देश के सालाना बजट को पार कर जाएगा।एक अध्ययन कहता है कि इतने खर्च के बाद भी देश के केवल 60 प्रतिशत किसान ही एमएसपी पर अपनी फसल बेच पाएंगे।यानी 40 प्रतिशत किसानों को तब भी कोई लाभ नहीं होगा।

अब अगर केन्द्र सरकार ने केवल दो साल तक भी इन 60 प्रतिशत किसानों की फसल एमएसपी पर खरीदी तो पूरा देश Bankrupt यानी दिवालिया घोषित हो जाएगा,यानी देश का दिवाला निकल जाएगा और किसानों के भी हाथ कुछ नहीं आएगा। इससे भारत का बाजार भी पूरी तरह अस्थिर हो जाएगा।वो इसलिए क्योंकि सरकार एमएसपी से नीचे फसलों की खरीद को अपराध की श्रेणी में तो डाल सकती है लेकिन किसी भी Private Player को फसल खरीदने पर मजबूर नहीं कर सकती।

गरीबों को मिलने वाली सुविधाओं पर पडेगा असर
अगर सरकार के राजस्व पर दबाव बढ़ेगा तो गरीबों को मिल रहीं दूसरी सुविधाओं पर भी इसका असर देखने को मिल सकता है। वे कहते हैं, "यह तो रही खरीद की बात। इसके अलावा सरकार किसानों को उर्वरक और कृषि यंत्रों पर भी सब्सिडी देती है जो लगभग एक लाख करोड़ रुपए के आसपास है। ऐसे में सरकार बिजली, पानी, स्वास्थ्य सुविधाओं के खर्च या तो कम करेगी या फिर बढ़ायेगी।"
"अंतरराष्ट्रीय बाजारों में हमारी उपज की कीमत वैसे ही कई देशों की अपेक्षा ज्यादा है। ऐसे में अगर एमएसपी को अनिवार्य कानून बनाया गया तो व्यापारी आयात करने लगेंगे और सरकार उन्हें रोक भी नहीं पायेगी। ऐसे में सरकार को किसानों से सारी फसलें खरीदनी पड़ेंगी। अगर सरकार किसानों से सारी फसलें एमएसपी पर खरीदेगी तो इसके बजट के लिए करों में करीब तीन गुना वृद्धि करनी होगी। जिससे देश के करदाताओं पर कर का बोझ बढ़ेगा।"
कैसे निकल सकता है एमएसपी के समाधान का रास्ते
एसबीआई इकोरैप की रिसर्च रिपोर्ट के अनुसार सरकार एमएसपी पर खरीद सुनिश्चित करने के लिए 5 अहम कदम उठा सकता है...

◆ सरकार को एमएसपी की गारंटी देने की जगह 5 साल के लिए न्यूनतम फसल खरीद की गारंटी देनी चाहिए।  (जिसमें सूखा, बाढ़ आदि आपदा से सुरक्षा मिले) ।
◆ ई-नैम मंडियों में फ्लोर प्राइस एमसीएप से कम नहीं रखी जाय।
◆ एपीएमसी इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत किया जाय।
◆ कॉन्ट्रैक्ट फॉर्मिंग संस्थाओं की स्थापना
◆ कम खरीद करने वाले राज्यों को एमएसपी पर खरीद का बढ़ावा दिया जाय।


इनकम सपोर्ट हो सकता है एक कारगर तरीका
प्राईज सपोर्ट  की जगह अगर सरकार इनकम सपोर्ट  किसानों को देती है तो ये तरीका काफी प्रभावी हो सकता है।अगर एमएससी की जगह सरकार सभी छोटे बड़े किसानों को सालाना 10 हजार रुपये की राशि देने लगे तो ज्यादा बेहतर होगा, देश भर में इसे लागू करने का खर्च 1 लाख 40 हजार करोड़ रुपये के आसपास बैठेगा जो एमएसपी पर आने वाले खर्च से बहुत कम है।इसे दूसरे देशों के उदाहरण से भी आप समझ सकते हैं।


भगवत कौशिक पत्रकार ,सामाजिक व राजनैतिक विषयों के लेखक

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