पहाड़ियों पर  सुनियोजित बसाहट की जरूरत

प्रशासन आँख बंद कर ले और समय की नब्ज पर हाथ न रखे तो भारत में कुछ भी हो सकता है.जरूरतमंद और निडर जनता अपने नदी,नाले ,तालाब ,कौएं ,बावड़ी और पहाड़ सब निगल सकती है .अआप्को यकीन नहीं होगा लेकिन ये सत्य है की हमारे ग्वालियर शहर में पिछले कुछ वर्षों में पांच पहाड़ियां न
 
पहाड़ियों पर  सुनियोजित बसाहट की जरूरत

प्रशासन आँख बंद कर ले और समय की नब्ज पर हाथ न रखे तो भारत में कुछ भी हो सकता है.जरूरतमंद और निडर जनता अपने नदी,नाले ,तालाब ,कौएं ,बावड़ी और पहाड़ सब निगल सकती है .अआप्को यकीन नहीं होगा लेकिन ये सत्य है की हमारे ग्वालियर शहर में पिछले कुछ वर्षों में पांच पहाड़ियां न सिर्फ गायब हो गयीं बल्कि उनके ऊपर चार हजार से अधिक मकान भी बन गए .प्रशासन को आने वाली रतौंधी की वजह से ये सिलसिला जारी है .
भारत के शहरों में बढ़ते आबादी के दबाब के कारण जमीन और कमीं कल्पना से भी कहीं ज्यादा मूलयवान हो गए हैं. सरकार के पास नगरों की बसाहट और विस्तार की वैज्ञानिक नियोजन योजनाएं नहीं हैं इसलिए नगर बेतरतीब ढंग से विकसित हो रहे हैं .जबकि शहरों का विकास नियोजित तरिके से चौतरफा होना चाहिए .भारत में वैसे भी हजारों साल पुराने शहर हैं ,उनकी संरचना समय के साथ नहीं बदली इसलिए अब इन शहरों में जहाँ ,जिसे मौक़ा मिल रहा है अपने लिए छत की तलाश कर रहा है.

मध्यप्रदेश में और ग्वालियर -चंबल अंचल में पहाड़ों से घिरे अनेक शहर हैं,ग्वालियर भी इनमें  से एक है,लेकिन इस शहर के विकास के लिए कभी कोई सर्वांगीण योजना नहीं बनाई गयी .मध्यप्रदेश सरकार की नगर नियोजन की कोई स्पष्ट नीति है ही नहीं.फलस्वरूप प्रदेश में हरेक शहर ग्वालियर  की तरह जिधर जगह मिलती है उधर फ़ैल जाता है ,भोपाल,इंदौर .,जबलपुर,उज्जैन जाइए शहरों का विकास इसका उदाहरण है. हमारे त्यहाँ बसाहट पहले हो जाती है विकास बाद में होता है और जहाँ विकास पहले होता है वहां बसाहट कभी होती नहीं है विशेष क्षेत्र विकास प्राधिकरण ग्वालियर की योजना इसका प्रमाण है .वहां बीते तीस साल में विकास सिसक रहा है बसाहट के लिए .
ग्वालियर में यदि नगर नियोजन विभाग मुस्तैदी से नगर विकास की योजना बनाये तो शहर के आसपास की तमाम पहाड़ियां उसके काम आ सकती हैं,लेकिन सरकार ने इन पहाड़ियों को या तो वन विभाग की सम्पदा  बताकर हाथ लगाने से इंकार कर दिया है या फिर इन्हें अतिक्रमणकर्ताओं  के लिए बेसहारा छोड़ दिया है .शहरों में सरकारी जमीन पर नजर गड़ाकर रखने वाले लोग जिन्हें स्थानीय भाषा में कमीं कहा जाता है बीते तीन दशकों में इन्हीं पहाड़ों पर अवैध बसाहटों के जरिये खुद तो अरबपति हो गए लेकिन सरकार के लिए मुसीबतें खड़ी कर गए .

प्रशासन एक तरफ इन बसाहटों की तरफ से ऑंखें मूँद कर बैठा रहता है और जब तब इनके खिलाफ कार्रवाई करता है तो उसका कोई असर नहीं होता .प्रशासन को वोट की राजनीति के चलते पहाड़ियों पर बनी बसाहटों में बुनियादी सुविधाएं मुहैया कराना पड़तीं है

पहाड़ियों पर  सुनियोजित बसाहट की जरूरत

सो अलग .सरकार की असहाय स्थिति का पता इसी से चलता है की उसे अक्सर अवैध कालोनियों को वैध घोषित करना पड़ता है मै अनेक वर्षों से इस समस्या को रेखांकित करने की कोशिश करता आ रहा हूँ लेकिन सरकार मुफ्त की सलाहें लेती नहीं है .

ग्वालियर में 1974  से लेकर अब तक बीती आधी सदी में आधिकारिक रूप से केवल एक-दो पहाड़ियों का ही विधिवत आवंटन किया गया है ,शेष पहाड़ियां अतिक्रमण की भेंट चढ़ गयीं हैं. वन विभाग इन पहाड़ियों की सुरक्षा कर नहीं पाता और सरकार के पास इन पहाड़ियों के सुनियजित विकास की कोई योजना है नहीं .मीलों तक फैली ये पहाड़ियां न जंगल हैं और न इनमें कोई वनोत्पाद ही होता है ,इसलिए इनका बेहतर इस्तेमाल बसाहटों के लिए ही हो सकता है .चूंकि इन पहाड़ों के प्रति सरकार उदासीन है इसलिए इन पर या तो अतिक्रमण हो रहा है या इनका अवैध उत्खनन.क्योंकि ये मुरम मुहैया कराती हैं .

ग्वालियर में यदि पहाड़ियों का सुनियोजित विकास किया जाये तो तीन नए ग्वालियर विकसित हो सकते हैं .ग्वालियर में चारों तरफ पहाड़ियां हैं .सरकार एक कर्मचारी आवास कालोनी विकसित करने के अलावा इन पहाड़ियों का कोई इस्तेमाल नहीं कर पायी जबकि अतिक्रमणकर्ताओं ने नोटरी के जरिये इन पहाड़ियों के ऊपर हजारों  मकान बनवा दिए .ये काम सरकार या स्थानीय निर्माण एजेंसियों को कठिन क्यों लगता है ये राम ही जानें. मै अमरीका के जिस फीनिक्स शहर के प्रवास पर  हूं वहां चारों तरफ दस-बीस नहीं हजारों पहाड़ियां हैं लेकिन सरकार ने इस इलाके में ऐसी सुंदर बसाहट को विकसित किया है की अमेरिका के अधिकांश राज्यों से लोग फीनिक्स की तरफ भाग रहे हैं .

अमेरिका का मुकाबला करना भारत के लिए करना कठिन है किन्तु अपनी गैर आबादी की बिना जंगलात की पहाड़ियों का शहरी बसाहटों केलिए इस्तेमाल कठिन काम नहीं है. आखिर जनता इन पहाड़ियों पर अवैध रूप से रह ही रही है बेहतर हो कि सरकार इन पहाड़ियों के लिए खुद योजनाएं बनाकर एक और इन्हें अतिक्रमण से बचाये दूसरी और शहरों में अवैध कालोनियों के विकास को भी रोक सकती है ,पहाड़ियों पर विकास हो सकता है इसका प्रमाण खुद मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल है ,लेकिन जैसे भोपाल को दूरदृष्टि वाले प्रशासक मिल गए वैसे प्रशासक दूसरे शहरों को नहीं मिल पाए .

अनियोजित विकास केवल ग्वालेऔर की नहीं अपितु  पूरे देश की समस्या है. हमारा देश विकास की गलत अवधारणा की वजह से ही झुग्गियों,झोपड़ियों का देश बनकर रह गया है .हम इन झुग्गी-झपड़ियों के लिए तो जन सुविधाएं जुटाने  की योजना बनाते हैं लेकिन इन्हें विकसित होने से रोकने के लिए हमारे देश के पास कोई योजना नहीं है. हमारी सरकारें तो सीआईए और एनआरसी जैसे क़ानून बनाने में ही उलझी रहती हैं उन्हें शहरों  के बदरंग होते चेहरे दिखाई ही कहाँ देते हैं ?उत्तरदायित्वहीन प्रशासन और वोटों  की राजनीति में उलझी राजनीति विकास की सबसे बड़ी दुश्मन है.
राकेश अचल

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