एक महामारी का आविष्कार : जॉर्जो आगम्बेन

इतालवी दार्शनिक जार्जो आगम्बेन कोविड के दौर में चर्चा में रहे हैं। अकादमिया में संभवत: वे पहले व्यक्ति थे, जिसने नावेल कोरोना वायरस के अनुपातहीन भय के खिलाफ आवाज़ उठाई। कोविड से संबंधित उनकी टिप्पणियों के हिंदी अनुवाद शीघ्र प्रकाश्य पुस्तक “भय की महामारी” के परिशिष्ट में संकलित हैं। प्रस्तुत है उनमें से पहली टिप्पणी
 
एक महामारी का आविष्कार : जॉर्जो आगम्बेन

इतालवी दार्शनिक जार्जो आगम्बेन कोविड के दौर में चर्चा में रहे हैं। अकादमिया में संभवत: वे पहले व्यक्ति थे, जिसने नावेल कोरोना वायरस के अनुपातहीन भय के खिलाफ आवाज़ उठाई। कोविड से संबंधित उनकी टिप्पणियों के हिंदी अनुवाद शीघ्र प्रकाश्य पुस्तक “भय की महामारी” के परिशिष्ट में संकलित हैं। प्रस्तुत है उनमें से पहली टिप्पणी :

एक महामारी का आविष्कार
जॉर्जो आगम्बेन

हम आज तथाकथित कोरोना महामारी से निपटने के लिए जल्दबाजी में उठाये गए निहायत उन्मादपूर्ण, अतार्किक और निराधार आपातकालीन क़दमों से जूझ रहे हैं। इस मसले के पड़ताल की शुरुआत हमें नेशनल रिसर्च कौंसिल (सीएनआर) द्वारा की गयी इस घोषणा से करनी चाहिए कि “इटली में सार्स कोविड 2 महामारी नहीं है”। कौंसिल ने यह भी कहा कि “इस महामारी से सम्बंधित दसियों हज़ार मामलों पर आधारित जो आंकडें उपलब्ध हैं, उनके अनुसार 80-90 प्रतिशत मामलों में यह संक्रमण केवल मामूली लक्षणों (इन्फ्लुएंजा की तरह) को जन्म देता है। लगभग 10-15 प्रतिशत मामलों में मरीजों को न्युमोनिया हो सकता है परन्तु इनमें से अधिकांश मरीजों के लिए यह जानलेवा नहीं होगा। केवल 4 प्रतिशत मरीजों को इंटेंसिव थेरेपी की ज़रुरत पड़ेगी।”

अगर यह सही है तो भला क्या कारण है कि मीडिया और सरकार देश में डर और घबराहट का माहौल बनाने की हरचंद कोशिश कर रहे हैं? इसका नतीजा यह हुआ है कि लोगों के आने जाने और यात्रा करने के अधिकार पर रोक लग गयी है, और रोजाना की ज़िन्दगी ठहर सी गयी है।

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इस गैर-आनुपातिक प्रतिक्रिया के पीछे दो कारक हो सकते हैं। पहला और सबसे महत्वपूर्ण है, अपवादात्मक स्थितियों का सामान्यीकरण करने की सरकार की प्रवृति। सरकार ने ‘साफ़-सफाई और जनता की सुरक्षा’ की ख़ातिर जिस विधायी आदेश को तुरत-फुरत लागू करने की मंज़ूरी दी, उससे एक तरह से “ऐसे म्युनिसिपल और अन्य क्षेत्रों का सैन्यकरण कर दिया गया

जहाँ एक भी ऐसा व्यक्ति है जो कोविड पॉजिटिव है और जिसके संक्रमण का स्रोत अज्ञात है, या जहाँ संक्रमण का एक भी ऐसा मामला है जिसे किसी ऐसे व्यक्ति से नहीं जोड़ा जा सकता जो हाल में किसी संक्रमित इलाके से लौटा हो।” जाहिर है कि इस तरह की स्थिति कई क्षेत्रों में बनेगी और नतीजे में इन अपवादात्मक आदेशों को एक बड़े क्षेत्र में लागू किया जा सकेगा. इस आदेश में लोगों की स्वतंत्रता पर जो गंभीर रोके लगाई गई है, वे हैं:

कोई भी व्यक्ति प्रभावित म्युनिसिपैलिटी या क्षेत्र से बाहर नहीं जा सकेगा।

कोई बाहरी व्यक्ति इस म्युनिसिपैलिटी या क्षेत्र के अन्दर नहीं आ सकेगा।

निजी या सार्वजनिक स्थानों पर सभी प्रकार के जमावड़ों, जिनमें सांस्कृतिक, धार्मिक और खेल सम्बन्धी जमावड़े शामिल हैं, पर रोक रहेगी – ऐसे स्थानों पर भी जो किसी भवन के अन्दर हैं, परन्तु उनमें आम लोगों को प्रवेश की अनुमति है।

सभी किंडरगार्टेन, स्कूल और बच्चों के देखभाल की सेवाएं बंद रहेंगी। उच्च और व्यावसायिक शिक्षण संस्थाओं में ‘डिस्टेंस लर्निंग’ के अलावा सभी शैक्षिक गतिविधियाँ प्रतिबंधित रहेंगी।

संग्रहालय और अन्य सांस्कृतिक संस्थाएं और स्थल जनता के लिए बंद रहेंगे। इनमें वे सभी स्थल शामिल हैं जो 22 जनवरी 2004 के विधायी आदेश क्रमांक 42 के अंतर्गत कोड ऑफ़ कल्चरल एंड लैंडस्केप हेरिटेज के आर्टिकल 101 में शामिल हैं। इन संस्थाओं और स्थलों पर सार्वजनिक प्रवेश के अधिकार से संबंधित नियम निलंबित रहेंगे।

इटली के अन्दर या विदेशों की शैक्षिक यात्राएं निलंबित रहेंगी।
जी) सभी परीक्षाएं स्थगित रहेंगी और सार्वजनिक कार्यालयों में कोई काम नहीं होगा, सिवाय आवश्यक और सार्वजानिक उपयोगिता सेवाओं के संचालन के।
एच) क्वारंटाइन सम्बन्धी नियम प्रभावशील होंगे और उन लोगों पर कड़ाई से नज़र रखी जाएगी जो संक्रमित व्यक्तियों के संपर्क में आये हैं।

सीएनआर का कहना है कि यह संक्रमण साधारण फ्लू से अलग नहीं है, जिसका सामना हम हर साल करते हैं। फिर यह अनुपातहीन प्रतिक्रिया क्या अजीब नहीं है? ऐसा लगता है कि चूँकि अब आतंकवाद के नाम पर असाधारण और अपवादात्मक कदम नहीं उठाये जा सकते इसलिए एक महामारी का आविष्कार कर लिया गया है जिसके बहाने इन क़दमों को कितना भी कड़ा किया सकता है।

इससे भी अधिक विचलित करने वाली बात यह है कि पिछले कुछ सालों में भय का जो वातावरण व्याप्त हो गया है उसे ऐसी परिस्थितियां भाती हैं जिनसे सामूहिक घबराहट और अफरातफरी फैले। इसके लिए यह महामारी एक आदर्श बहाना है। इस तरह एक दुष्चक्र बन गया है। सरकार द्वारा स्वतंत्रता पर लगाए गए प्रतिबंधों को इसलिए स्वीकार कर लिया जाता है क्योंकि लोगों में सुरक्षित रहने की इच्छा है। और यह इच्छा उन्हीं सरकारों ने पैदा की है, जो अब उसे पूरा करने के लिए तरह-तरह के प्रपंच रच रही हैं।

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