वन विभाग की मिलीभगत से होरा सरकारी धन का दुरुपयोग मलाई काटने में लगे हैं रेंज के अधिकारी

वन विभाग की मिलीभगत से होरा सरकारी धन का दुरुपयोग मलाई काटने में लगे हैं

रेंज के के अधिकारी आखिर यह गरीब लकड़हारे करें भी तो क्या , जब इनसे काम करवा कर कोई मजदूरी नही दिया जाता है रेंजर महोदय केवल जलौनी लकड़ी ले जाने का फरमान सुना देते हैं तो मौका पाकर यह लकड़हारे भी कीमती लकड़ियों को काटकर ले जाने से नही चूकते आखिर यह भी तो अपने कार्यों का मूल्यांकन करते है । इसके अलावा भी वनकर्मी साइकिल पर जलौनी लकड़ी ढोने का व्यवसाय करने वाले लोगों से 30 से 50 रूपये साइकिल के हिसाब से रोज अवैध वसूली करते है ।

इसी के आड़ मे शीशम ,शाखू ,सहगौन आदि के वेशकीमती लकड़ियों के छोटे बोटे भी यह लकड़हारे रोज दिन दहाड़े लेकर कई रास्ते से जा रहे है । जंगल के ही एक वनकर्मी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि लगभग दो ट्रक लकड़ी प्रतिदिन साइकिलो पर लादकर लोग ले जाते हैं । हद तो तब हो जाती है जब यह लकड़हारे सैकड़ो की तादाद में रोज साइकिलो पर लकड़ियों का गट्ठर बांधे भांभर रेंज कार्यालय के सामने से गुजरते हैं लेकिन कोई इन्हें रोकने टोकने वाला नही होता

क्योंकि कि यही वह लकड़हारे हैं जिनसे वनकर्मियों की रोज एक बड़ी कमाई होती है और विभाग तथा समाज के देखने में कोई बड़ा नाजायज कार्य भी नहीं लगता । जिसके कारण यह प्रक्रिया रोज दिन दहाड़े आराम से निरन्तर चलता रहता है । और वन विभाग को लाखों का चूना वनकर्मियों के द्वारा लगाया जाता रहता है । इसीलिए यह कहा जा सकता है कि वनकर्मियों की शायद यही सोच है कि चाहे जंगल हो जाये वीरान , लेकिन हम क्यों न हो मालामाल ।

जंगल में आग लगाकर काटे गये पेड़ो की जड़ो को जलाकर या उनको खोदकर सबूतो को मिटा दिया जाता है ।आखिर यहाँ के वनकर्मी अपने एरिया के जंगलों में क्या नही जानते है सच्चाई तो यह है कि कमाई के चक्कर में यही वनकर्मी ही सब कुछ कराते है । इनसे कुछ भी छिपा नहीं है परन्तु काली कमाई करने के स्वार्थ में अन्धे होकर अपने जिम्मेदारियों का निर्वहन करने के बजाय वनरक्षक नहीं वनभक्षक की भूमिका अदा कर रहे है ।

रोड के किनारे ही या फिर जलता रहा लेकिन 24 घंटे बीत जाने के बाद भी यहां पर कोई बनकर में नहीं पहुंचा लापरवाही के चलते या पेड़ टूट कर गिर गया फिर भी जलता रहा

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