भाग्य विधाता”

भाग्य विधाता”

“भाग्य विधाता”

 

कुछ नही से कुछ सही

मेघ नही गर मेह यही,

अन्नदाता रूखसत भूखा 
कर्ज़दारी सदियों से रही ।

 

सूखा समुद्र, गागर न भरी
खोखली क़लम खूब चली,
अहिंसा परमो धर्मः हमारा 
सर्वदा सत्य पर गोली चली ।

 

आंधियों में गर चिराग तो
कर बुलंद हौसला बचा लो, 
ऐ भारत के भाग्य विधाता
तक़दीर और तस्वीर बना दो ।

 

जन्मभूमि आतुर स्वागत को

रधुनन्दन का महल दिखा दो,
होलिका दहन की धरा यह
दर्प में न खुद को जला लो ।

 

जिन्दा हो झुकना सीखो 
मुर्दो जैसी अकड भुला दो,
जीवन से महान्, मां का सम्मान, 
राष्ट्रध्वज युगपत् लहरा लो ।।

 

- हितेन्द्र शर्मा, 

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