नियम कानून के ताक पर बैठे विद्या के ब्यापारी

 नियम कानून के ताक पर बैठे विद्या के ब्यापारी

स्वतन्त्र प्रभात फतेहपुर

  •   नियम कानून के ताक पर बैठे विद्या के ब्यापारी
  •    सभी मानकों में अधूरे पड़े स्कूलों को भी मान्यता 
  •     बिजनेश मैन के आगे बिद्या बिकने को हुई मजबूर

फतेहपुर ,सारे नियम-कायदों को ताक पर रखकर ऐसे नए बिद्या के मन्दिरों को मान्यता दी जा रही  है जो शासन द्वारा तय किए गए मापदंड में खरे नहीं हैं।और बिद्या का मन्दिर कहे जाने वाली दुकानों से  खुलेआम बिद्या का बिजनेश चरण सीमा से अधिक फल फूल रहा है। जिससे गरीब की तो बात ही नही मीडियम तबके का अभिभावक अपने बच्चे को शिक्षा दिलाने में थकान महसूस कर रहा है।

बिद्या को पाने के लिए जहाँ विद्यार्थी कोई चूक नही करता वहीं अभिभावक उन पर होने वाले खर्च पर कोई कसर नही छोड़ता। लेकिन बिद्यालय की मनमानी व बिद्यालय खोलने के मापदंडों का संचालकों ने पालन किया है या नहीं इस बात से शिक्षाधिकारियों को कोई लेना-देना नहीं है।

सारे नियम-कायदों को ताक पर रखकर खोले गए स्कूलों को मान्यता प्रदान कर दी जाती है। जबकि इनमें से अधिकांश स्कूल शासन द्वारा तय किए गए मापदंड में खरे नहीं हैं। इसके बावजूद भी ऐसे स्कूल संचालकों का कारोबार फलफूल रहा है। जिस पर खुले आम बिद्या बिजनेश बन चुकी है।और इस विजनेश के चलते किसान व मजदूर अपने बच्चों को शिक्षा दिलाने में असमर्थता जाहिर करते नजर आने लगे हैं।

स्कूल खोलने के लिए समिति का पंजीयन, रजिस्टार फर्म एंड सोसायटी का पंजीयन, खेल का मैदान सहित 35 ऐसे मानकों का पालन करना होता है, जो किसी भी सूरत में आसान नहीं है। मानकों का पालन करने के बाद ही स्कूल खुल पाते हैं, लेकिन क्षेत्र में पान मसाले की दुकान की तरह हर नुक्कड़ में खोले गए  स्कूल के नाम पर शिक्षा की दुकानदारी चरण सीमा पर फल फूल  रही है। 

सरकारी में चार तो बिजनेश स्कूल में 400 बच्चे ---

सबसे चौकाने वाली बात यह है कि सरकारी स्कूलों में भोजन,ड्रेस,फल,दूध,जूता मोजा सहित कॉपी, किताब के साथ बस्ता , आर ओ पानी, बिजली पंखे आदि का खर्च सरकार पूर्ण कर रही है।और साथ ही अनुभवी अध्यापकों की भी ब्यवस्था है । लेकिन किसी क्लास में चार तो किसी क्लास में 14 बच्चे ही बिद्या ग्रहण कर रहे हैं।

अभिभावकों के अनुसार जिसका कहीं न कहीं सरकारी तन्त्र ही दोषी माना जा रहा है।वहीँ बिजनेश वाले विद्यालयों में बच्चों की संख्या एक एक क्लास में लगभग 50 छात्रों से कम नही है। और पहली कक्षा के छात्र से लगभग पांच हजार रुपये एडमीशन वाले महीने में फिर प्रतिमाह 1000 रु से लेकर 2000 रु तक अभिभावकों से स्कूल प्रबंधक विजनेश शुरू कर देते हैं । तथा क्लास बढ़ने पर इसका प्रतिशत और बढ़ता जाता है। लेकिन लगातार अभिभावकों व मीडिया के द्वारा दर्शाए जाने के बाद भी जिम्मेदार अधिकारी मौन रहते हैं।

जिम्मेदार भूले जिम्मेदारी खामियाजा भुगतें कर्मचारी--

विकासखंड में शिक्षा सत्र के प्रथम माह में प्रतिवर्ष ऐसे कई स्कूल शुरू होते हैं।, जिनके संचालकों ने जिला शिक्षा अधिकारी के कार्यालय में आवेदन देकर  बैंक ड्राफ्ट जमा कराया और स्कूल का संचालन शुरू कर दिया । जबकि इसके लिए विकासखंड स्तर पर बीईओ को जांच अधिकारी नियुक्ति किया गया है।

मापदंड में खरे पाए जाने के बाद ही स्कूल को मान्यता देने का प्रावधान है, लेकिन चंद रुपयों के लालच में शिक्षा विभाग के जिम्मेदारों ने स्कूल खोलने के सारे मापदंड को दरकिनार कर अनुमति दे दी है। वहीं शिक्षा की दुकान खोलकर संचालक मोटी रकम ऐंठ रहे हैं। क्यों कि लोग शिक्षा के पीछे भाग रहे हैं और अंधाधुंध रकम खर्च करते हैं। यही वजह है कि स्कूल अब एक बड़ा व्यवसाय बनता जा रहा है। लेकिन इसका खामियाजा प्राइवेट स्कूल के कर्मचारियों को खचाडा गाड़ियों में दर्जनों बच्चों को दूर दराज के गांवों से समय की पाबंदी पर लाने में जान देकर गवाना पड़ता है।

इस तरह बदहाली--

संचालक गली-मोहल्लों में स्कूल खोलकर अभिभावकों से फीस के तौर पर मोटी रकम तो ऐंठ रहे हैं, लेकिन छात्रों को सुविधा नाम की चीज नहीं मिल पा रही है। हद तो तब होती है जब छात्रों के लिए न तो बैठने के लिए पर्याप्त व्यवस्था होती है और न ही स्कूल में शौचालय की व्यवस्था रहती है। स्कूल संचालकों के पास सबसे बड़ी समस्या खेल मैदान की होती है। खेल मैदान नहीं होने से कई स्कूल के छात्र भवन की छत में ही जैसे तैसे काम चलाते हैं।

एक रोड़ के जितने भी गांव के बच्चे होंगे जाएंगे एक ही चक्कर मे--

संस्थान के विद्यालयों में विजनेश बन चुकी विद्या  का  हाल यह है कि पैसों के लिए हर मोड़ पर बच्चों के साथ रिस्क और जिन्दगी से खिलवाड़ करते नजर आते हैं। बताते चलें कि विद्यालय प्रबन्ध मानक और सरकारी नियम को ताक पर रखकर खटारा वैनो  से बच्चों को लाने व ले जाने का कार्य करते हैं। एक रोड़ पर कई गांवों के बच्चों को एक साथ भर कर जाते है।जिससे गाड़ी में बैठे हुए छोटे छोटे बच्चों को सांस लेना भी दूभर हो जाता है।यही नही गाड़ियों पर अधिक बच्चों को भरने के लिए गाड़ियों के ऊपर बच्चों के बैग फेंक दिए जाते हैं।

  • यह हैं 2018-19 में विद्यालयों के सरकारी आंकड़े
  • प्राथमिक विद्यालय 158 - बच्चों की संख्या 10252
  •  जूनियर विद्यालय 65 - बच्चों की संख्या 3397
  • मान्यता प्राप्त विद्यालय 100 बच्चों की संख्या लगभग 7000
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