घरों में नहीं दिलों में बसते थे लोग दौर ऐसा भी था....

घरों में नहीं दिलों में बसते थे लोग दौर ऐसा भी था....

नए घरों ने तोड़ दिए घरौंदे बचपन की यादों के
न जाने कितने घर इस चक्कर में बर्बाद हो गए।।

घरों में नहीं दिलों में बसते थे लोग दौर ऐसा भी था
अब अलग मकानों की चार दीवारी में आबाद हो गए।।

दस्तक देता था जब अतिथि रौनक थी चेहरों पर
अब नए मकानों की चौखट पर सावधान हो गए।।

एक शाख पर बैठे दो बूढ़े पंछी ये सब देख रहे
कि अब अपने ही घरों में लोग मेहमान हो गए।।

ये कैसी तालीम दे दी हमने इन नादान परिंदों को
कि नवयुग की इस अंधी दौड़ में हम कुर्बान हो गए।।
              
  अब अपने ही घरों में लोग मेहमान हो गए।
  अब अपने ही घरों में लोग मेहमान हो गए।।

                    सतीश शर्मा

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