वन बेल्ट वन रोड के आलोक में भारत-चीन संबंध...

 वन बेल्ट वन रोड के आलोक में भारत-चीन संबंध...

रिपोर्ट:- आनंद वेदान्ती त्रिपाठी अयोध्या

वन बेल्ट वन रोड के आलोक में भारत-चीन संबंध . .

ब्रिटिश साम्राज्य में सूरज कभी अस्त नहीं होता था, कई अन्य कारणों के अलावा अंग्रेज़ों की इस उल्लेखनीय प्रगति का एक महत्त्वपूर्ण कारण था उनकी व्यापारिक रास्तों की खोज करने की क्षमता। अब21 वीं सदी में चीन ब्रिटिश साम्राज्य के उसी नक़्शेकदम पर चलता प्रतीत हो रहा है। गौरतलब है कि अपने “वन बेल्ट वन रोड” पहल के जरिये चीन पूरी दुनिया का घेरा बनाना चाहता है। चीन भारत को अपने इस पहल में शामिल होने का आमंत्रण देता रहा है, हालाँकि भारत ने इसके प्रति उदासीनता ही दिखलाई है। हाल ही में अमेरिका ने भी इसके प्रति चिंता व्यक्त की है। ‘वन रोड वन बेल्ट’ पहल क्या है? रेशम सड़क आर्थिक पट्टी तथा 21वीं सदी की सामुद्रिक रेशम सड़क की दो परियोजनाओं को मिलाने के लिये सितंबर 2013 में ‘वन बेल्ट, वन रोड’ कार्यक्रम का प्रस्ताव दिया गया था। विश्व के 55 प्रतिशत सकल राष्ट्रीय उत्पाद (जीएनपी), 70 प्रतिशत जनसंख्या तथा 75 प्रतिशत ज्ञात ऊर्जा भंडारों को समेटने की क्षमता वाली यह योजना वास्तव में चीन द्वारा भूमि एवं समुद्री परिवहन मार्ग बनाने के लिये है, जो चीन के उत्पादन केंद्रों को दुनिया भर के बाज़ारों एवं प्राकृतिक संसाधन केंद्रों से जोड़ेंगे। साथ ही साथ इससे चीन की अर्थव्यवस्था, श्रमशक्ति एवं बुनियादी ढांचा-तकनीक भंडारों को भी प्रोत्साहन मिलेगा। बेल्ट के गलियारे यूरेशिया में प्रमुख पुलों, चीन-मंगोलिया-रूस, चीन-मध्य एवं पश्चिम एशिया, चीन-भारत-चीन प्रायद्वीप, चीन-पाकिस्तान, बांग्लादेश-चीन-भारत-म्यांमार से गुज़रेंगे। सामुद्रिक रेशम मार्ग अथवा “रोड” बेल्ट के गलियारों का सामुद्रिक प्रतिरूप है और उसमें प्रस्तावित बंदरगाह तथा अन्य तटवर्ती बुनियादी ढांचा परियोजनाओं का नेटवर्क है, जो दक्षिण एवं दक्षिण पूर्व एशिया से पूर्वी अफ्रीका तथा उत्तरी भूमध्य सागर में बनाए जाएंगे। भारत पर संभावित प्रभाव भारत की सबसे बड़ी चिंता यह है कि यदि चीन का वन बेल्ट वन रोड का सपना साकार हो गया तो चीन निर्विवाद रूप से एशिया की सबसे बड़ी शक्ति के तौर पर उभरेगा, जिससे भारत की महत्त्वाकांक्षाओं को धक्का लग सकता है। दरअसल चीन चाहता है कि भारत भी उसके वन बेल्ट वन रोड प्रॉजेक्ट का हिस्सा बने लेकिन भारत इसे लेकर सावधानी बरत रहा है। इसकी खास वज़ह यह है कि पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर से गुज़रने वाला चीन-पाकिस्तान आर्थिक कॉरिडोर (सीपीईसी) भी ओबीओआर का ही हिस्सा है। इसके अलावा दिल्ली ने वन बेल्ट वन रोड पर इसलिये भी रज़ामंदी नहीं जताई है क्योंकि पेइचिंग इसके जरिये क्षेत्र में अपना प्रभाव बढ़ाना चाहता है। भारत, चीन-पाक इकनॉमिक कॉरिडोर के खिलाफ लगातार विरोध दर्ज करा रहा है। भारत की नज़र में यह कॉरिडोर उसकी संप्रभुता को चुनौती देने वाला है। ओबीओआर के माध्यम से चीन अन्तराष्ट्रीय सीमाओं को नई दिशा देना चाहता है जो इसने दक्षिण एशिया में करना भी शुरू कर दिया है, भारत पर इसका सीधा तथा प्रतिकूल प्रभाव होगा। चीन कि इस पहल में भूराजनीतिक उद्देश्य निहित हैं। चीन के सुर में बदलाव विदित हो कि हाल ही में, भारत के साथ गिरते रिश्तों से चिंतित चीन ने संबंध बेहतर करने के लिये चार सूत्री प्रस्ताव दिये हैं। पेइचिंग में वन बेल्ट वन रोड पर होने वाले अंतरराष्ट्रीय शिखर सम्मेलन में भारत की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिये चीन की ओर से यह अहम पेशकश की गई है लेकिन भारत ने अब तक अपनी भागीदारी की पुष्टि नहीं की है। इस प्रस्ताव के तहत भारत-चीन सीमा विवाद को जल्द हल करने और भारत की चिंताओं को दूर करने के लिये चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा का नाम बदलने की पेशकश की गई है। इसके अलावा चीन ने भारत के साथ अच्छे पड़ोसी-रिश्तों की विशेष संधि की पेशकश की है। चीन, भारत के साथ अपने रिश्तों को लेकर एक दीर्घकालीन नीति का पालन करना चाहता है। क्या हो आगे का रास्ता चीन की ‘वन बेल्ट वन रोड’ के अंतर्गत निर्मित हो रहे चीन-पाकिस्तान आर्थिक कॉरिडोर (सीपीईसी) को लेकर भारत की सम्प्रभुता संबंधी चिंताएँ वाजिब हैं लेकिन एक महत्त्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या ‘वन बेल्ट वन रोड’ किसी भी रूप में भारत के लिये लाभदायक है? गौरतलब है कि दक्षिण एशिया में भू-परिवहन की स्थिति अत्यंत ही दयनीय है। तिब्बत और भारत के बीच कनेक्टिविटी के विकास में ‘वन बेल्ट वन रोड’ की अहम् भूमिका हो सकती है। विदित हो की 20वीं सदी तक नाथू ला के माध्यम से ल्हासा और कोलकाता को जोड़ने वाला पुराना मार्ग वस्तु एवं सेवाओं के व्यापार का एक मुख्य ज़रिया हुआ करता था। भारत के माध्यम से तिब्बत को बाहरी दुनिया से जोड़ने वाले इस मार्ग का यदि ‘वन बेल्ट वन रोड’ के तहत पुनरुद्धार किया जाता है तो यह भारत के लिये अत्यंत ही सामरिक और व्यापारिक महत्त्व वाला साबित हो सकता है। इसमें कोई दो राय नहीं है कि भारत-चीन संबंधों में सुधार दोनों ही देशों के हित में हैं, लेकिन एक बड़ा सवाल है कि क्या यह सुधार भारत को अपनी सम्प्रभुता और सुरक्षा की कीमत चूकाकर करनी चाहिये! मई 2014 में नेतृत्व परिवर्तन के साथ ही भारत ने चीन की तरफ गर्मजोशी से हाथ बढ़ाया था, लेकिन उसका कोई सार्थक नतीजा सामने नहीं आया। उसके बाद भारत ने चीन को उसी की भाषा में जवाब देने का फैसला किया है। इसके लिये नई दिल्ली ने समान सोच वाले देशों जैसे अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया और वियतनाम से संबंधों को प्रगाढ़ किया है। भारत ने चीन के साथ लगने वाली समस्याग्रस्त सीमाओं पर अपनी सामरिक क्षमता में वृद्धि की है। इससे भी दिलचस्प बात यह है कि भारत सरकार ने अपनी तिब्बत नीति में आमूलचूल परिवर्तन के संकेत दिये हैं। चीन पाकिस्तान के साथ मिलकर ग्वादर बन्दगाह का विकास कर रहा और दक्षिण एशिया में अपना प्रभुत्व बढ़ाना चाहता है, वहीं भारत सरकार ने चाबहार बंदरगाह को विकसित करने के तरफ कदम बढ़ाकर चीन के इस कदम का मुँहतोड़ जवाब दिया है। निष्कर्ष यह निहायत ही सत्य है कि 21वीं सदी में युद्ध अब सेनाओं द्वारा लड़ा जाने वाला नहीं है बल्कि यह आर्थिक नीतियों का युद्ध है, कुटनीतिक क़दमों का युद्ध है। भारत-चीन व्यापार उल्लेखनीय 70 बिलियन डॉलर सालाना के स्तर पर है और इस आँकड़े को नई ऊँचाईयों पर पहुँचाने के प्रयास होते रहना चाहिये। आर्थिक मोर्चे पर दोनों देशों को सकारात्मक रुख अपनाना चाहिये और शायद भारत और चीन दोनों को इस बात का एहसास है, तभी तो चीन, भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक सहयोगी देश है। जहाँ तक ओबीओआर के माध्यम से चीन के बढ़ते प्रभुत्व का प्रश्न है भारत को भी ऐसे ही कुछ प्रोजेक्ट लाने होंगे। उल्लेखनीय है कि इंटरनेशनल नॉर्थ साउथ ट्रांसपोर्टेशन कॉरिडोर (INSTC) भारत के लिये निर्णायक साबित हो सकता है। आईएनएसटीसी 7,200 किमी लंबा ज़मीनी और सामुद्रिक रास्ता है। इसमें परिवहन के रेल, सड़क और समुद्री मार्ग शामिल हैं। इसके जरिये समय और लागत में कटौती कर रूस, ईरान, मध्य एशिया, भारत और यूरोप के बीच व्यापार को बढ़ावा दिये जाने का लक्ष्य है। इस नेटवर्क से यूरोप और दक्षिण एशिया के बीच व्यापारिक गठजोड़ में तेजी एवं ज़्यादा कुशलता की उम्मीद की जा रही है। फेडरेशन ऑफ फ्रेट फॉरवार्डर्स एसोसिएशन इन इंडिया के सर्वे में सामने आया कि मौजूदा मार्ग के मुकाबले आईएनएसटीसी 30 प्रतिशत सस्ता और 40 प्रतिशत छोटा रास्ता होगा। आईएनएसटीसी उन गलियारों में एक है जिन्हें भारत, चीन के वन बेल्ट वन रोड नीति के समानांतर बनाने पर काम कर रहा है।

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