11 अक्टूबर - अंतरराष्ट्रीय बालिका दिवस  शिक्षा, स्वास्थ्य की पहली सीढ़ी – सीएमओ

11 अक्टूबर - अंतरराष्ट्रीय बालिका दिवस  शिक्षा, स्वास्थ्य की पहली सीढ़ी – सीएमओ

बेहतर स्वास्थ्य के लिए शिक्षा हैं जरूरी


वर्ष 2019 की थीम “एक उज्जवल कल के लिए लड़कियों को सशक्त बनायें” 

              संवाददाता- नरेश गुप्ता


कानपुर -


वर्ष 2012 से बालिकाओं के अधिकारों का संरक्षण और उनके समक्ष आने वाली चुनौतियों को दूर करने के उद्देश्य से ही हर वर्ष 11 अक्टूबर को अंतर्राष्ट्रीय बालिका दिवस मनाया जाता हैं। वर्ष 2019 में 7वें अंतर्राष्ट्रीय बालिका दिवस के लिए विषय “एक उज्जवल कल के लिए लड़कियों को सशक्त बनाना” निर्धारित किया गया है।
वैसे तो ऐसे बहुत से अधिकार हैं जो आज भी महिलाओं के होते हुये भी उनके नहीं हैं, इनमें से ही एक है स्वास्थ्य संबंधी निर्णय लेने का अधिकार।

विश्व बैंक समूह की सतत विकास के लक्ष्यों पर वर्ष 2017 की रिपोर्ट बताती हैं कि विश्व में 40 प्रतिशत महिलाओं को यह हक़ नहीं हैं कि वह कब माँ बनना चाहती है और कब नहीं। उत्तरप्रदेश में अभी भी 4 प्रतिशत लड़कियां 15-19 वर्ष की आयु में ही माँ बन जाती हैं या गर्भवती होती हैं।


कम उम्र में माँ बनना या ज्यादा बच्चे पैदा करना दोनों ही महिला स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होता हैं। सिर्फ हानिकारक ही नहीं बल्कि इससे उनकी जान जाने का भी खतरा रहता हैं। ऐसे में लड़कियों को सक्षम बनाना कि वह अपने निर्णय खुद ले सके बहुत जरूरी हो जाता हैं।


मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ॰ अशोक शुक्ला का कहना हैं कि स्वास्थ्य की पहली सीढ़ी शिक्षा हैं। क्योंकि लड़कियां अपने निर्णय तब ही ले सकती हैं जब वह शिक्षित होंगी, जैसे कि बहुत से परिवारों में आज भी कम उम्र में लड़कियों की शादी कर दी जाती हैं। यदि वह शिक्षित होंगी तो अपने हक़ में बोल सकेंगी।


डॉ॰ अशोक शुक्ला बताते हैं कि अगर लड़कियों शिक्षित होंगी तो वह न सिर्फ अपने बेहतर स्वास्थ्य बल्कि परिवार नियोजन के लिए भी बेहतर निर्णय ले सकेंगी। इसी के साथ वह अपने स्वास्थ्य संबंधी चीजों के लिए सतर्क रहेंगी। कोई समस्या आने पर वह अपनी बात ससमय रख सकेंगी।


आँकड़ों पर एक नज़र


राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे- 4 के अनुसार उत्तरप्रदेश में 6 वर्ष या उससे ऊपर की उम्र वाली 63 प्रतिशत लड़कियां ही स्कूल जाती हैं। वही कुल 61 प्रतिशत महिलाएं शिक्षित हैं। अगर हम जनपद की बात करे तो कुल 82.2 प्रतिशत महिलाएं ही शिक्षित हैं।


राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे- 4 के ही अनुसार लड़कियों की शिक्षा उनके प्रजनन दर पर असर डालती हैं। जैसे कि जो लड़कियां स्कूल नहीं जाती हैं उनकी प्रजनन दर 3.5 हैं । वही जिन्होने 12 साल या उससे ज्यादा वर्ष तक शिक्षा ग्रहण की उनकी प्रजनन दर 1.9 हैं । यहाँ प्रजनन दर से तात्पर्य हैं कि इन महिलाओं के इतनी की दर में बच्चे हैं। यानि कि जो अशिक्षित लड़कियां या महिलाएं हैं वह ज्यादा बच्चे करके न सिर्फ अपने स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ कर रही हैं बल्कि वह जनसंख्या व्रद्धि के लिए भी दोषी हैं।


यदि हम प्रजनन की ही बात करे तो उत्तरप्रदेश में 38 प्रतिशत पुरुष परिवार नियोजन के लिए पूरी तरह महिलाओं पर निर्भर रहते हैं, उनके अनुसार परिवार नियोजन के तरीकों को अपनाने की ज़िम्मेदारी महिलाओं पर ही हैं। ऐसे में यदि महिला शिक्षित होगी तब ही वह परिवार नियोजन के तरीकों को बेहतर ढंग से समझ पाएगी।
यह भी जानें 


संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 19 दिसंबर 2011 को प्रस्ताव संख्या 66/170 को पारित किया| इस मंजूरी के साथ प्रत्येक वर्ष 11 अक्टूबर को ‘अंतर्राष्ट्रीय बालिका दिवस’ के रूप में मनाने की घोषणा की गई।  इस दिवस का उद्देश्य बालिकाओं के अधिकारों का संरक्षण करना और उनके समक्ष आने वाली चुनौतियों की पहचान करना है।

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