मनोरंजन और टैक्स के फेर में फंसा "इंडियन ग्रॉ प्री"

मनोरंजन और टैक्स के फेर में फंसा "इंडियन ग्रॉ प्री"

2008 में जब एक प्रेस वार्ता के दौरान भारतीय ओलंपिक संघ के तत्कालीन अध्यक्ष सुरेश कलमाड़ी ने जब यह कहा कि भारत जल्द ही फ़ॉर्मूला वन का आयोजन करेगा, तो सहसा किसी को विश्वास नही हुआ,

लेकिन 2011 से 2013 के बीच इंडियन ग्रॉ प्री का आयोजन होने के बाद इसे बंद कर दिया गया. आख़िर क्या वजह थी जिस कारण इस रेस को बंद करना पड़ा? बता रहे हैं डीडी न्यूज़ के खेल संवाददाता अशोक मर्तोलिया

 

ग्रेटर नोएडा स्थित बुद्ध इंटरनेशनल सर्किट पर जब पहली बार साल 2011 में फ़ॉर्मूला वन इंडियन ग्रॉ प्री का आयोजन किया गया. एफ वन जैसे महंगे खेलों के आयोजन को  सफलतापूर्वक संपन्न कराने पर इसे भारतीय खेलों के लिए एक बड़ी उपलब्धि के रूप में देखा गया.

अत्याधुनिक तरीके से बनाए गए इस सर्किट पर जब दुनिया के टॉप एफ वन ड्राइवरों ने अपना हुनर दिखाया, तो यह नज़ारा न सिर्फ़ भारतीयों के लिए बल्कि पूरे एशिया के लिए बेहद उत्साहित और रोमांचित करने वाला था. इसके साथ ही भारत ने खुद को दुनिया की खेल महाशक्ति के रूप में भी स्थापित किया.

साल 2011 से लेकर 2013 तक इस रेस के प्रमोटर जेपी ग्रुप ने बुद्ध इंटरनेशनल सर्किट पर इसका सफल आयोजन कर भारत और दक्षिण एशिया के एफ वन प्रशंसकों के बीच एक उम्मीद की किरण जगाई. लेकिन उसके बाद इंडियन ग्रॉ प्री को जैसे ग्रहण लग गया. तब से लेकर 6 साल बीच चुके हैं लेकिन बुद्ध इंटरनेशनल सर्किट खाली पड़ा है,

हालांकि पहली रेस करने से पहले जेपी ग्रुप और एफ वन के आयोजकों के बीच कुल पांच रेस का करार था. चूंकि अब इस सर्किट पर रेस नहीं हो रही है, जिसके चलते करोड़ों की लागत से बने बुद्ध इंटरनेशन सर्किट की स्थिति दिन पर दिन खराब होती जा रही है. इसके रख-रखाव पर ही सालाना करोड़ों रुपये का खर्च आ रहा है, जिसके चलते यह सर्किट जेपी ग्रुप के लिए सफेद हाथी बन चुका है.

अब सवाल उठता है कि आखिर इतने धूम-धड़ाके के साथ शुरू किया गया इंडियन ग्रॉ प्री बीच में ही क्यों बंद करना पड़ा? इसका कारण है तत्कालीन उत्तर प्रदेश सरकार, जिसने एफ वन को खेल के बजाए मनोरंजन की श्रेणी में रख दिया था, जिसके चलते भारत आने वाली एफ वन गाड़ियां उनके पार्ट्स, इंजन, चेसिस से लेकर टायर और इससे जुड़े अन्य उपकरणों पर 100 से 200 फीसदी तक कस्टम ड्यूटी लगा दी गई, आखिरकार आयोजकों और टीमों के लिए यह बेहद खर्चीला हो गया.

जब पहली बार इस रेस का आयोजन बीआईसी पर हुआ तो एफ वन के फैंस ने इसका खूब लुफ्त उठाया. 2011 से लेकर 2013 तक रेडबुल के ड्राइवर सेबेस्टियन वेट्टल इस रेस को जीतने में सफल रहे. 3 सीजन की रेस के ज़रिए 11 अरब रुपयों की कमाई भी हुई और करीब 10 हज़ार लोगों को रोजगार मिला था. लेकन अब आयोजकों के साथ-साथ फैंस भी यह उम्मीद कर रहे हैं एक बार फिर से देश में रफ्तार का रोमांच दिखे.

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