60 माह में देश के युवा 60 दिन की चुनावी रोजगार पाकर, वाकई  में हो चुके हैं खुश

60 माह में देश के युवा 60 दिन की चुनावी रोजगार पाकर, वाकई  में हो चुके हैं खुश

क्या चुनावी मौसम में सिर्फ 60 दिन का रोजगार दे पाने में कामयाब रही बीजेपी सरकार

या बेरोजगारों के आंसू पोछने का काम कर गई, संसदीय चुनाव 2019

हिंदुस्तान की आबादी 136 करोड़ के पार जा चुकी है जबकि रोजगार का ग्राफ देखा जाए तो मुश्किल से मुश्किल 10 से 20% लोग भी रोजगार युक्त नहीं हैं. ऐसे में सरकार कोई भी आती है ज्यादा ध्यान रोजगार के मामले पर नहीं देती और उनके पास कहने को हो जाता है कि हिंदुस्तान की 65 से 70 पर्सेंट आबादी खेती पर निर्भर है और सभी का ध्यान किसानों के तरफ दिलाया जाता है जबकि  देश में किसानों की हालत और भी बदतर है. पहले सरकार कहा करती थी पढ़ाई ना होने की वजह से रोजगार में गिरावट है लेकिन मौजूदा हालात में तो ग्रामीण आबादी से लेकर शहरी आबादी तक सभी ने शिक्षा पर ध्यान तो दिया. जिसकी वजह से अब जो बेरोजगारी दिख रही वह शिक्षित बेरोजगारी देश के भीतर व्यापक रूप से मुंह खोले पनप चुका है. जिसे अब देश के नेता ध्रुवीकरण की राजनीति के लिए उपयोग में ला रहे हैं.

 

मई 2014 से लेकर मार्च 2019 तक बेरोजगारों की स्थिति और भी बदतर हो गई. देश के भीतर लेकिन आखिर ऐसा क्या हुआ जो बेरोजगार युवक एड़ी चोटी का जोर लगाने के बाद भी  रोजगार नहीं पा सके. संसदीय चुनाव के आते ही बेरोजगार युवा खासा खुश नजर आ रहे हैं.

हम आपको बताते हैं अकाल के दौरान बारिश की एक बूंद भी जीवन दे सकता है ऐसा हमारे हिंदुस्तान के लोग उम्मीद जताते हैं. ठीक वैसे ही हालात आज है. 60 माह तक रोजगार के लिए रोजाना हाथ पैर मारने पर जब रोजगार युवाओं को नहीं मिला तो सांसदी चुनाव में कार्यकर्ताओं के तौर पर प्रत्याशियों ने अपने चुनाव प्रचार अभियान के तहत युवाओं को रोजाना दिहाड़ी, खाना-पीना मुफ्त, वाहनों से जनसंपर्क आदि प्रलोभन देकर भारी मात्रा में युवाओं को ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में लगा रखे हैं जो कि युवाओं के लिए 60 दिन, ही सही लेकिन जहां कुछ नहीं वहां बेरोजगार युवाओं के जीवन को सुकून मिलने जैसा है.

60 महीने एड़ी चोटी का जोर के बावजूद नोटबंदी जीएसटी जैसे नियमों ने युवाओं को कहीं ना कहीं बेरोजगार बना रखा. कंपनी अपने को दिवालिया घोषित कर बैंकों का कर्ज तक वापस नहीं दे पाए तो युवाओं को रोजगार कहां से दे पाती. पिछले 45 वर्षों के दौरान माना जा रहा है इस तरह रोजगार पर कभी मार नहीं हुआ जो पीछे 5 सालों के दौरान देखा गया.

एक तरफ देश के पीएम और उनकी केंद्रीय कैबिनेट दावा करते आ रही है कि 5 वर्षों में जो रोजगार व्यवस्था दी गई वह पिछले 70 सालों में किसी सरकार ने नहीं दिया और उनका मानना है कि जो ऋण शिशु ऋण के तौर पर दिया गया वह सभी देश में रोजगार हैं.

जबकि युवाओं की मानें तो मैनेजमेंट इंजीनियरिंग जैसे कोर्सों को करने के बावजूद मौजूदा सरकार चाय पकौड़े के लिए 50000 का ऋण बैंकों से दिलवाने की बात कर रही थी. युवा कहते हैं हमारे मां-बाप जब पहले से जमीन बेच, लोन लेकर साहूकारों से बयाजी उधार लेकर 5 वर्षों तक हमें पढ़ाई और ट्रेनिंग करवाते हैं क्या चाय पकौड़े बेचने के लिए, शायद इसका जवाब मौजूदा सरकार के पास ना हो लेकिन कुल मिलाकर देखा जाए तो मौजूदा वक्त में पढ़े लिखे युवाओं के लिए रोजगार के नाम पर कोई व्यवस्था नहीं दे पाई मौजूदा सरकार.

जिसकी वजह से सरकार तिलमिला भी गई है तभी तो शिक्षा और रोजगार जैसे विषय चुनावी मेनिफेस्टो से ही गायब है या उसका चुनाव प्रचार में जिक्र तक नहीं हो रहा. हिंदुस्तान की जनता भावुक होती है जिसका पूरा लाभ देश के नेताओं के द्वारा गुमराह कर लिया जा रहा है. पढ़े लिखे युवाओं को रोजगार की जगह राष्ट्रद्रोह हिंदू-मुस्लिम अगड़ा पिछड़ा जैसे गुमराह करने वाले भावनात्मक विषयों पर आपस में लड़ा रही. ताकि यह युवा इस पर उलझे रहे और मूलभूत आवश्यकताओं से दूरी बनाए रखें. वह रोजगार ना मांग सके जीवन को नई दिशा ना दे पाए और इसी में गुमराह भरे वातावरण में वह अपना बहुमूल्य वोट देकर गलत लोगों का चुनाव करें.

तो हम बात कर रहे थे 60 दिन के रोजगार की, साथ में धक्के खाने के बाद जो मिला वह जरूर मीठा है जो कि 60 माह के जख्मों पर मरहम लगाने के लिए शायद काफी है. अब आगे देखना काफी दिलचस्प होगा कि देश की नई सरकार क्या फिर देश के युवाओं के लिए 60 दिन का रोजगार लेकर आई है या सरकार के पिटारे में 60 वर्ष तक के लिए युवाओं को रोजगार दे पाने का कोई नया व्यवस्था भी है. 

Support to Swatantra Prabhat Media

T & C Privacy

Comments