साधरण इंसान और खबरों का जंजाल निष्पक्ष पत्रकारिता-अरुणेश गिरी

साधरण इंसान और खबरों का जंजाल निष्पक्ष पत्रकारिता-अरुणेश गिरी

साधरण इंसान और खबरों का जंजाल निष्पक्ष पत्रकारिता

नमस्कार,

ये मेरा प्रथम लेख है , सोशल मीडिया का जमाना है और सभी लोगो को अपने विचारो को अभिव्यक्त करने की पूरी स्वतंत्रता है l  ये स्वतंत्रता तो पहले भी होनी चाहिए थी लेकिन कुछ तो मजबूरियाँ रही होंगी वार्ना हमारा निष्पक्ष मीडिया इस बारे में जरूर बात करता l

आज जो सबसे बड़ा मुद्दा है वो इस बात का है कि, "क्या मीडिया अभी बिकाऊ हुआ या ये दशकों से ऐसा ही था ?" जो हम जैसे लोगो को सल्फेट शिरोमणि बनाता रहा. अगर सच बोलू तो आपको इस बात का जवाब कोई दे नहीं पायेगा और अगर किसी ने दिया तो शायद आप भरोसा न कर पाए. फिर तरीका क्या है , कैसे पता करे l

मेरे  विचार के अनुसार बहुत आसान है, बस आपको थोड़ा समय विकिपीडिआ या फिर मिले जुले (गोदी और लुटियंस) समाचार पत्रों को पढ़ना या देखना होगा और फिर सब कुछ दर्पण की तरह साफ़ दिखेगा.

आपको हर मीडिया में ऐसे पत्रकार मिलेंगे जिनका अपना कुछ न कुछ झुकाव है कोई लाल झंडा पकड़ के बैठा है , कोई हरा और कोई केसरी..! सफ़ेद झंडे वाले पत्रकार मिलने मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है. हर खबर और पत्रकार के पीछे बहुत बड़ी फंडिंग है. इसलिए एक नागरिक होते हुए ये आपका हक़ है कि आप खुद ही उस सफ़ेद झंडे के लेखक बने और एक लॉजिकल खबर पर पहुंचने के लिए स्वयं विश्लेषण करे

 

२०१४ से पहले बिकी हुई मीडिया पर बहस हुई नहीं क्योकि सब कुछ एक ही आईडिया से चलता था और उसका नाम था लुटियंस मीडिया l फिर अचानक से २०१४ के आस पास एक और मीडिया पैदा हुआ जिसको भविष्य में गोदी मीडिया कहा गया और एक जंग सी छिड़ गयी दोनों में कि कौन जायदा वफादार वो जो ६५ सालो से बिक रहे थे या वो जो अभी बिकना शुरू हुए l

जो मीडिया और पत्रकार दशकों से खुद को निष्पक्ष कह कर अपने आप को बंद कमरों में बेचते रहे उनके अस्तित्व को खतरा पैदा हो गया7 रही सही कसर सोशल मीडिया ने पूरी कर दी , यहाँ  पर आप चाहे कितने भी नकाब क्यों न पहन ले लेकिन आप कौन जात है ये पता चल ही जाता है l

 

जो दर्शक न्यूट्रल होकर खबर जानना चाहता है उसके लिए आज का समय  बहुत कठिन है l दर्शक /पाठक बहुत परेशान है कि कहाँ विश्वास करे और कहाँ नहीं , हर जगह पे हर कोई बिकने को तैयार है खबर भी , पत्रकार भी और समाचार भी l

 

न्यूट्रल /निष्पक्ष पत्रकारिता का जन्म तो दूर की बात है कभी गर्भ धारण भी  नहीं हो पाया भारत में और इसका श्रेय किसे मिलना चाहिए इसके लिए आप अपना खुद का विवेक इस्तेमाल करे अगर मै कुछ व्यक्त करूँगा तो शायद मुझे भी उस जमात में शामिल कर दिया जायेगा.

 

एक साधरण आदमी ("आम" शब्द इस्तेमाल करने से डर रहा हूँ, सब कुछ पोलिटिकल है शब्द भी)  के लिए खबर पे विश्वास करना मुश्किल है. वो समझ नहीं पाता की क्या देखे क्या पढ़े और फिर वो अपने जीवन की व्यस्तता में आधी अधूरी खबरे पढ़ के एक्सपर्ट बनने की कोशिश करता है और यही पे आकर ,वो मीडिया के जाल में फ़स जाता है l एक उदाहरण के तौर पर, बंगाल में कुछ मीडिया हाउसेस के लिए डेमोक्रेसी उतनी ही पवित्र है जितनी एक पोलिटिकल पार्टी जो कह रही है की हम गरीबी दूर कर देंगे और ६५ सालो बाद न्याय देंगे.

 

स्ष्ट वीमेन  का बलात्कार हो जाता है अलवर (राजस्थान ) में , उसके पति के सामने में लेकिन कही भी हैडलाइन वाली खबर नहीं बनती और न ही प्राइम टाइम डिबेट होता है और कोई प्रधानमंत्री को दोष भी नहीं देता , लोग दिन के उजाले में मार दिए जा रहे है बंगाल में लेकिन कोई प्रधानमंत्री को दोष नहीं दे रहा l कारण,  शायद सरकार ने लुटियंस मीडिया को खरीद लिया या फिर लुटियंस के वफादारों की सरकार है इन राज्यों में l या फिर शायद वो ज़िंदगिया और अस्मिता पत्रकारो की बिकी हुई कीमत में फिट नहीं बैठती l

एक मानव शरीर का आजकल के इस युग में निष्पक्ष होना मुश्किल है लेकिन खबरों को दिखाने या छपने में निष्पक्षता लायी जा सकती है. मेरे प्रिय मित्र श्री राजीव शुक्ल जी इस और एक बहुत ही खूबसूरत प्रयास कर रहे है l मै इस आशा और विश्वास के साथ उनके साथ खड़ा हूँ की ये अवेंजर्स  बनकर के उस थानोस मीडिया का मुकाबला कर पाएंगे जो सदियों से अपने मास्क लगाकर घूम रहा है l

स्वतंत्र प्रभात मीडिया इस दिशा में एक छोटी से पहल है , इसे पढ़े जरूर लेकिन औरो को भी पढ़े और फिर अपना विचार बनाये .

 

लेखक,

सत्य की खोज में एक असत्य आत्मा , नाम  है अरुणेश गिरी 

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