#मीटू अभियान- बदलाव की चिंगारी

#मीटू अभियान- बदलाव की चिंगारी

(स्वतंत्र विचार)

हिन्दुस्तान में दशहरे से पहले #मीटू का रावण सामने आया है। रावण के पुतला दहन की परम्परा तो हम सदियों से निभाते आ रहे है, किन्तु दिनोंदिन फल-फूल रहे असली रावणों से निपटने में देश की मौजूदा सरकारें, सुरक्षा व्यवस्था, नियम-कानून नकारा साबित हो रहे हैं। यही कारण है कि देश में ऐसे अपराधों की एक लम्बी फेहरिस्त है, जो कहीं दर्ज ही नहीं है और इन्हीं कमजोरियों का फायदा उठाते हुए तथाकथित रावणों की हिम्मत और हौसला बढ़ता जा रहा है और हम केवल पुतला जलाकर अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर लेते हैं।

फिल्म उद्योग, राजनीतिक गलियारे और मीडिया के न्यूज रुम यह तीनों ही ऐसे क्षेत्र हैं, जिसकी चमक-धमक हर किसी को आकर्षित करती है और यह एक कटु सच है कि शार्ट कट तरीकों से नेम, फेम और पैसों की चाह में उतावली युवतियां इस चकाचौंध में अक्सर यौन उत्पीड़न का शिकार हो जाती हैं। 

देश में इस समय #मीटू अभियान ने भूचाल ला दिया है, कुछेक महिलाओं द्वारा सोशल मीडिया पर चलाये गये इस अभियान से से पूरे देश में खलबली मची हुई है। बालीवुड से लेकर राजनीतिक गलियारों से होते हुए मीडिया जगत में भी एक ऐसी चिंगारी पैदा हुई है, जिसकी ऑच में कई बडे ओहदों पर बैठे लोग तपिश महसूस कर रहे हैं और ऐसी उम्मीद की जाती है कि आने वाले समय में कई और बड़े नाम कटघरे में होंगे।

बदलाव की यह लड़ाई महिलाओं के लिए कितनी कठिन है, इसके कई उदाहरण हमारे सामने आ चुके हैं। आवाज उठाने वालों को धमकी से लेकर कोर्ट कचेहरी में देख लेने तक की धमकियों से रुबरु होना पड़ रहा है। प्रख्यात फिल्म अभिनेता नाना पाटेकर के खिलाफ मिस इण्डिया रही तनुश्री दत्ता द्वारा यौन उत्पीड़न के आरोपों के बाद देश में बहुत कुछ बदला है। तनुश्री दत्ता पर एक तरफ तो आरोपों की बौछार हुई लेकिन दूसरी तरफ समर्थन में भी काफी लोगों का आना एक बदलाव का संकेत है। तनुश्री ने घटना के समय भी अपनी शिकायत दर्ज कराने का प्रयास किया था किन्तु धमकियों और हिंसात्मक हमलों के जरिये उनकी आवाज दबा दी गई, जिसकी पुष्टि कई प्रत्यक्षदर्शियों ने भी की है, और हमले की तो वीडियो फुटेज भी सामने आई है।

इन सबके बावजूद सुखद पहलू यह है कि इस अभियान के समर्थन में दिनोंदिन उठती आवाज ने एक आशा की किरण दिखाई हैं, इस तनुश्री की आवाज के बाद सैकड़ों महिलाएं सामने आई हैं और देश के कई नामी गिरामी कद्दावर  चेहरे इसकी जद में है। कई सामाजिक संगठनों, महिला आयोग, सेलिब्रिटीज, राजनेताओं के मीटू अभियान का साथ देने की घोषणा के बाद से प्रतिदिन नया खुलासा हो रहा है। जिस प्रकार से देश में मीटू अभियान को समर्थन मिल रहा है, उससे यह बात साफ है कि यह अभियान एक बड़े आन्दोलन में तब्दील हो सकता है। शुरुआती दौर में ही नतीजे भी सामने आने लगे हैं, किसी निर्देशक से फिल्म वापस ले ली गई, किसी अभिनेता का बहिष्कार कर दिया गया, किसी बड़े घराने के ऊंचे पद पर बैठे अधिकारी को पदच्युत कर दिया गया, किसी नेता को पार्टी संगठन से बर्खास्त कर दिया गया, किसी अखबार के बड़े पत्रकार को उसके पद से हटा दिया गया और ताजा घटनाक्रम में केन्द्र सरकार के एक मंत्री को अपने पद से इस्तीफा देने के लिए मजबूर होना पड़ा।

किन्तु कोई आश्चर्य नहीं कि फिल्म इंडस्ट्री, राजनीति, मीडिया एवं कारपोरेट जगत का जो भयावह चेहरा समाज के सामने लाने का साहस कुछ महिलाओं ने दिखाया है, असलियत उससे भी ज्यादा घिनौनी और भयावह हो।

सर्वविदित है कि आधी आबादी को पु़रुष प्रधान इस समाज में अपनी जगह बनाने के लिए कठिनाइयों का सामना हमेशा से करना पड़ता रहा है। असल समस्या तो मानसिकता की है, घर की दहलीज लांघकर अपना घर-परिवार चलाने की चाह में बाहर निकलने वाली महिलाओं को समाज के हर गली मोहल्ले, चौक चौराहों पर मौजूद निकम्मे और आवारा किस्म के लोग जिन नजरों से देखते हैं कि मानवता भी शर्मसार हो जाय, कहीं से इसे सभ्य समाज का हिस्सा नहीं कहा जा सकता और महिलाएं भी इसे अपनी नियति मानकर जहॉ तक संभव है, नजरअंदाज करने का प्रयास करती हैं। तमाम कानून एवं बंदिशे भी इस मनोदशा को बदलने में नाकाम रही हैं। लेकिन सबसे दुःखद और गम्भीर पहलू यह है कि राह चलते इन  लोगों को तो नजरअंदाज किया जा सकता है, किन्तु कार्य स्थल पर, उच्च पदों पर बैठे उन लोगों को कैसे नजरअंदाज किया जाये, जिनके रहमोकरम पर उस महिला की दाल रोटी चल रही है। देश में विश्वविद्यालय के कुलपति से लेकर, प्राध्यापक, पुलिस महकमा, अधिकारी, राजनेता, जनप्रतिनिधि लगभग सभी वर्गों पर यौन शोषण के आरोप लग चुके हैं, किन्तु कार्यवाही के नाम पीड़िता के पोस्टमार्टम के सिवाय कुछ भी उल्लेखनीय हासिल नहीं हुआ है। ज्यादातर मामलों में लोक-लज्जा के भयवश पीड़िताओं ने मुंह बन्द रखने में ही भलाई समझी और कई मामलों में तो परिस्थितिवश पीड़िताओं को समझौता कर लेने के अलावा कोई दूसरा रास्ता ही नहीं मिला।

पिछले वर्ष हालीवुड से शुरु हुआ #मीटू अभियान के समर्थन में जानी मानी अभिनेत्री रेणुका शहाणे का बयान कि शायद ही कोई ऐसी महिला हो जिसके पास #मीटू कहानी न हो, हमारे समाज की हकीकत बयान करती है। उनके इस बयान से पूरे देश में एक सनसनी सी फैल गई है। यह बयान देश और समाज में वैचारिक गिरावट को प्रदर्शित करता हैं, जहॉ आज इक्कीसवीं सदी में जहॉ देश की नारियों ने हर मोर्चें पर पुरुषों के साथ कन्धे से कन्धा मिलाकर चलने की पुरजोर कोशिश के साथ यह दर्शा दिया है कि उन्हें किसी भी मामले में कमतर आंकना एक भूल होगी, इसके बावजूद भी महिलाओं के प्रति कुदृष्टि रखने वालों की सोच और मानसिकता में न तो कोई बदलाव आया है और न ही उनकी संख्या कम हुई है।

#मीटू अभियान पुरुषों के खिलाफ महिलाओं की मुहिम कतई नहीं है और न ही यह समूचे पुरुष समाज को कटघरे में खड़ा करने वाला अभियान है। यह मुहिम एक सभ्य समाज बनाने  है, एक सुरक्षित समाज बसाने की है, एक स्वस्थ्य वातावरण में हमारी बच्चियां, हमारी महिलाएं सांस ले सके, ऐसा माहौल बनाने की है। किसी भी बदलाव की शुरुआत तभी होती है, जब उस पर सार्थक चर्चा होती है, बातचीत होती है और प्रारम्भिक स्तर पर इस मामले में #मीटू अभियान की शुरुआत सही दिशा में होती प्रतीत हो रही है। इस अभियान के समर्थन में पुरुष समाज का भी सामने आना एक बड़े बदलाव का संकेत है।

इस मुहिम का ही असर है कि कई कारपोरेट घरानों, बैंकों एवं अन्य कार्यस्थलों पर यौन उत्पीड़न की बन्द पड़ी फाइलों को फिर से खंगाला जा रहा है एवं उसका गम्भीरता से अध्ययन किया जा रहा है। फिल्म इंडस्ट्री में यौन उत्पीड़न का अध्यययन के बाद कार्यवाही हेतु समिति गठित की जा रही है, कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न की शिकायतों को गम्भीरता से लेने की चर्चा जोर पकड़ रही है, इन मामलों में वर्तमान कानून को और प्रभावी बनाने के लिए आवाजें उठ रही हैं और अगर ऐसा हुआ तो यह एक बड़ी जीत होगी।

भारतीय संस्कृति में नारियों का सदैव उच्च स्थान रहा है। प्रत्येक काल में नारियों ने अनेक विपत्तियों, यातनाओं और प्रताड़नाओं को झेलते हुए भारतीय संस्कृति के पावन प्रवाह को अविरल और अक्षुण बनाये रखा, यदि इन्हें भारतीय संस्कृति का आधारस्तंभ कहा जाय तो कोई अतिश्योक्ति न होगी। 21वीं सदी में एक बार फिर नारी जागरण अभियान ने जोर पकड़ा है, नारी सशक्तिकरण की बात की जा रही है, ऐसे में #मीटू अभियान की सार्थकता और सफलता इसी बात पर निर्भर करती है कि समाज के इस घिनौने चेहरे को बेनकाब करने हेतु जिम्मेदार एवं जागरुक नागरिक की भांति, राष्ट्र के सजग प्रहरी के रुप में महिलाओं की आवाज में पुरुषों को भी अपनी आवाज मिलानी होगी। इस अभियान को बल देने की आवश्यकता है, एकजुटता के साथ खड़े होने की आवश्यकता है और यही समाज एवं राष्ट्र के हित में भी है।

लेखक- डॉ0 प्रवीण सिंह दीपक

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