राष्ट्रिय नागरिक रजिस्टर और असम का ट्रांसजेण्डर समुदाय

राष्ट्रिय नागरिक रजिस्टर और असम का ट्रांसजेण्डर समुदाय

असम राष्ट्रिय नागरिक रजिस्टर अर्थात एनआरसी बनाने वाला भारत का एकमात्र राज्य है। यह नागरिक रजिस्टर सबसे पहले 1951 में तैयार हुआ था। तब इसमें 80 लाख नागरिक पंजीकृत हुए थे।

इसके बाद साल 2015 में सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर पुनः एनआरसी की प्रक्रिया शुरू हुई और 2018 तक राज्य के 3.29 करोड़ लोगों ने इस हेतु आवेदन किया।

आवेदन पत्रों की जांच के उपरान्त अब तक प्रकशित हुई एनआरसी की सूची में 3 करोड़ 11 लाख 21 हजार 4 लोगों को वैध करार दिया गया है। शेष 19 लाख 6 हजार 657 लोग एनआरसी से बाहर रखे गए हैं। अनिश्चित भविष्य से जूझ रहे इन नागरिकों में 2000 के लगभग ट्रांसजेण्डर समुदाय के लोग भी शामिल हैं।

उपरोक्त चयन प्रक्रिया में केवल उन्हें ही भारत का नगरिक माना गया है जो 25 मार्च 1971 अर्थात बांग्लादेश बनने के पूर्व से असम में निवास कर रहे हैं या उनके पूर्वज यहाँ के निवासी थे।जीवनपर्यन्त अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष करने वाले ट्रांसजेण्डर समुदाय के समक्ष एनआरसी ने एक नया संकट खड़ा कर दिया है।

आल असम ट्रांसजेण्डर एसोसिएशन ने इस आशय की एक याचिका बीते वर्ष सुप्रीम कोर्ट में दायर की थी। परन्तु उस पर अभी तक सुनवाई शुरू नहीं हुई है। जबकि अनिश्चितता का जीवन जी रहे इन ट्रांसजेण्डरों का एक-एक दिन मुश्किल से कट रहा है। याचिका में दी गई दलीलों में कहा गया है कि एनआरसी से बाहर होने के कारण इस समुदाय के लोगों में आतंक व्याप्त हो गया है।

ये लोग अब इस भय से सड़कों पर नहीं निकलते हैं कि कहीं सरकारी अधिकारी उनको पकड़ कर विदेशी घोषित करते हुए डिटेंशन सेण्टर में न भेज दें। एसोसिएशन की संस्थापक और असम की प्रथम ट्रांसजेण्डर जज स्वाति बिधान बरुआ के अनुसार भीख मांगना ही इस समुदाय का प्रमुख पेशा है।

लेकिन भयवश ये लोग बाहर नहीं निकलते हैं। अब मात्र शादी-विवाह या बच्चा होने पर ही ये लोग नाच-गाकर बख्शीश प्राप्त करके किसी तरह जीवनयापन कर रहे हैं। अधिकांश ट्रांसजेण्डरों से उनके परिवार वाले प्रायः नाता तोड़ लेते हैं। अतः इनके पास अपनी पहचान और नागरिकता का कोई कानूनी दस्तावेज उपलब्ध नहीं है।

स्वाति बरुआ ने एक चैनल को दिए साक्षात्कार में यह भी बताया कि एनआरसी के लिए मांगे गए आवेदन पत्र के लिंग कालम में अन्य वर्ग का विकल्प भी मौजूद नहीं था। सम्बन्धित अधिकारियों ने इस समुदाय के लोगों को अपने लिंग के तौर पर पुरुष या महिला चुनने के लिए विवश किया था।

स्वाति बरुआ इसके लिए राज्य सरकार को जिम्मदार ठहराती हैं। उनके अनुसार सरकार ने यदि इस समुदाय को लिंग परिवर्तन की सुविधा मुहैया करवाई होती तो परिस्थिति इतनी जटिल नहीं होती। इस समुदाय के लोगों को पैन कार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस और दूसरे कागजात उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी राज्य सामाजिक बोर्ड की होती है।

लेकिन उसने इस दिशा में अब तक कोई पहल नहीं की। परिवार से दूर हो चुके इन लोगों के पास नागरिकता सम्बन्धी प्रमाण देने के लिए 1971 के पहले का कोई भी दस्तावेज उपलब्ध नहीं है। एसोसिएशन का कहना है कि वर्ष 2011 में जहां राज्य में ट्रांसजेंडरों की तादाद 11,374 थी वहीं अब यह बढ़ कर 20 हजार तक पहुंच गई है। इनमें से महज 200 ट्रांसजेंडर ही अपने घरवालों के सम्पर्क में हैं।

असम के ट्रांसजेंडर समुदाय की लड़ाई लड़ रहे आल असम ट्रांस जेण्डर एसोसिएशन की स्थापना 25 दिसम्बर 2015 को हुई थी। एसोसिएशन के सूत्रों के अनुसार सोसाइटी अधिनियम के तहत इस संगठन का पंजीकरण इसलिए नहीं होने दिया गया था कि यह संगठन समाज को परेशान करेगा।

अतः ट्रांसजेण्डरों के अधिकार, सम्मान और प्रतिष्ठा की लड़ाई लड़ने के लिए संविधान के भाग-प्प्प् के आर्टिकल 19(ब्) के तहत इस संगठन की स्थापना करनी पड़ी थी। इस संगठन को असम के अनेक प्रसिद्ध चिकित्सकों तथा उच्च एवं सर्वोच्च न्यायालय के कई बड़े अधिवक्ताओं का भी समर्थन प्राप्त है।

ट्रांसजेण्डरों की लड़ाई लड़ने वाला यह संगठन समाज के अन्य पीड़ित व्यक्तियों यथा घरेलू हिंसा, बलात्कार तथा तस्करी की शिकार महिलाओं, बाल मजदूर एवं यौन शोषण के शिकार बच्चों को भी निःशुल्क कानूनी सहायता एवं अन्य प्रकार का यथा सम्भव सहयोग प्रदान करता है।

देश के अन्य राज्यों के ट्रांसजेण्डर समुदायों द्वारा पूर्वोत्तर के ट्रांसजेण्डर समुदाय की उपेक्षा भी इस संगठन की स्थापना के मूल कारणों में से एक है। क्योंकि पूर्वोत्तर के ट्रांसजेण्डर समुदाय को अन्य राज्यों के ट्रांसजेण्डरों द्वारा कभी भी किसी महत्वपूर्ण चर्चा या बैठक में आमन्त्रित नहीं किया गया।

अतः यह संगठन भविष्य में न केवल असम बल्कि सम्पूर्ण पूर्वोत्तर के ट्रांसजेण्डरों के हक की लड़ाई लड़ने का उद्देश्य रखता है। संगठन की संस्थापक गुवाहाटी की ट्रांसजेण्डर स्वाति बिधान बरुआ हैं। जिन्हें इनके सामाजिक कार्यों के दृष्टिगत 14 जुलाई 2018 को कामरूप जिले की लोक अदालत का न्यायाधीश बनाया गया है।

स्वाति बरुआ असम एवं पूर्वोत्तर की प्रथम तथा देश की तीसरी ट्रांसजेण्डर न्यायाधीश हैं। हाल ही में इन्हें पूर्वोत्तर एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया (एएआई) के संवैधानिक परामर्शदाता के रूप में भी चयनित किया गया है। वह इस पद पहुँचने वाली देश की प्रथम ट्रांसजेण्डर हैं। 27 वर्षीय स्वाति बिधान का जन्म गुवाहाटी के बरुआ परिवार में एक लड़के के रूप में हुआ था।

माता-पिता ने इनका नाम बिधान बरुआ रखा था। लेकिन इन्होंने बहुत छोटी उम्र से ही स्वयं में एक ट्रांसजेण्डर को महसूस करना शुरू कर दिया था। पढ़ाई में तेज रहीं स्वाति बताती हैं कि “चूंकि मैं एक लड़के के रूप में पैदा हुई थी। इसलिए स्कूल में नियमानुसार मुझे लड़कों की ड्रेस पहननी पड़ती थी।

लेकिन उस ड्रेस से मैं नफरत करती थी। वह जीवन मुझे जेल की तरह लगता था। अतः युवास्था आते-आते मैंने एक महिला के रूप में रहना शुरू कर दिया। इसलिए मेरे स्कूल के साथी, परिवार के लोग तथा रिश्तेदार मुझसे भेदभाव करने लगे थे।

मुझे कभी भी किसी मेहमान या रिश्तेदार से मिलने नहीं दिया जाता था। ज्यादातर मुझे भोजन और किताबों के साथ कमरे में बन्द रखा जाता था।” स्वाति जब 18 वर्ष की थी तब उनका सम्पर्क एक फ्लाईट लेफ्टिनेंट से हुआ।

धीरे-धीरे दोनों की नजदीकियां बढ़ने लगीं। इस समय तक बिधान बरुआ ने स्वयं को स्वाति बरुआ बनाने का निर्णय ले लिया था। अतः अपने साथी की मदद से वह सेक्स रिअसाइन्मेंट सर्जरी द्वारा स्वयं का जेण्डर बदलवाने मुम्बई जा पहुंची। लेकिन इनके घरवालों को इसकी भनक लग गई

और उन्होंने परिवार के ही एक वकील की मदद से सम्बन्धित डॉक्टर को कानूनी नोटिस भेज दिया। अतः डॉक्टर ने स्वाति से सर्जरी के लिए अदालत का आदेश लाने को कहा। काफी प्रयास के बाद बाम्बे हाईकोर्ट ने 7 मई 2012 को स्वाति को सर्जरी कराने की इजाजत दे दी।

इसके बाद वह अपना जेण्डर बदलवाकर बिधान बरुआ से स्वाति बिधान बरुआ बन गईं। श्री सत्य साईं विद्यालय गुवाहाटी से प्राथमिक और उच्च माध्यमिक शिक्षा प्राप्त करने वाली स्वाति ने वेस्ट गुवाहाटी कॉमर्स कॉलेज से अर्थशास्त्र मेजर के साथ बी. कॉम. किया था।

उसके बाद इंस्टीट्यूट ऑफ कंपनी सेक्रेटरीज ऑफ इंडिया (प्ब्ैप्) से कम्पनी सेक्रटरी का कोर्स पूरा करके गुवाहाटी यूनिवर्सिटी से कानून की उपाधि प्राप्त की। स्वाति बरुआ का नाम विशेष चर्चा में तब आया जब वर्ष 2018 की शुरुआत में इन्होंने ट्रांसजेंडरों के कल्याण हेतु 2014 के सुप्रीम कोर्ट के आदेश (एनएएलएसए) के लागू नहीं ह¨ने पर गुवाहाटी उच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका दायर की।

उस याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायालय ने मई 2018 में राज्य सरकार को इसे छह महीने के भीतर लागू करने का निर्देश दिया था। स्वाति बरुआ बीते कई वर्षों से शहर के विभिन्न स्कूलों, कालेजों तथा पुलिस स्टेशनों में कार्यशालायें एवं जागरूकता कार्यक्रमों का भी आयोजन कर रही हैं।

वह आल असम ट्रांसजेण्डर एसोसिएशन के माध्यम से ट्रांसजेंडर समुदाय को सशक्त बनाने की दिशा में और अधिक आक्रामक तरीके से काम करने की योजना बना रही हैं। फिलहाल उनकी प्रमुख चिन्ता एनआरसी से बाहर हुए असम के 2000 ट्रांसजेण्डरों को लेकर अधिक है।

डॉ.दीपकुमार शुक्ल (स्वतन्त्र पत्रकार )

125/5ए, योगेन्द्र विहार, खाड़ेपुर, नौबस्ता, कानपूर - 208021

 

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