असुरक्षित गर्भपात भी है मातृ मृत्यु का कारण सुरक्षित गर्भ समापन विषय पर जिला स्तरीय कार्यशाला का हुआ आयोजन

असुरक्षित गर्भपात भी है मातृ मृत्यु का कारण सुरक्षित गर्भ समापन विषय पर जिला स्तरीय कार्यशाला का हुआ आयोजन
असुरक्षित गर्भपात भी है मातृ मृत्यु का कारण

सुरक्षित गर्भ समापन विषय पर जिला स्तरीय कार्यशाला का हुआ आयोजन


गर्भपात पर बदलें बातचीत का तरीका - सीएमओ 

संवाददाता नरेश गुप्ता


कानपुर 25 अक्टूबर 2019 


सुरक्षित गर्भपात के बारे में युवा पीढ़ी को जागरूक करने के लिए पूरे परिवार की काउंसिलिंग की जानी चाहिये । लड़का व लड़की को साथ बैठाकर बात की जाये । पुरुषों को खास तौर पर जागरूक किया जाये। कुछ इस तरह के सुझाव दिये गए प्रजनन स्वास्थ्य एवं गर्भ समापन विषय उत्तरप्रदेश वोलन्टरी हेल्थ एसोसिएशन के सहयोग से आयोजित कार्यशाला में।  
मुख्य चिकित्सा अधिकारी सभागार में सुभाष चिल्ड्रन सोसाइटी के तत्वाधान में प्रजनन स्वास्थ्य एवं गर्भसमापन  सेवाओं को सृदढ़ करने हेतु साँझा प्रयास कार्यक्रम के अंतर्गत जिला स्तरीय कार्यशाला का आयोजन शुक्रवार को किया गया। मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ अशोक शुक्ला द्वारा दीप प्रज्वलन कर इस कार्यशाला का शुभारम्भ किया गया। 


परिवार नियोजन के नोडल अधिकारी व एसीएमओ डॉ राजेश कटियार ने कहा प्रसव के दौरान गर्भवती महिला के शरीर से अत्यधिक खून बह जाना, उसको हाई ब्लडप्रेशर, संक्रामण, झटके आना और उसको खून की कमी हो जाना मातृ मृत्यु अहम कारण हो सकता है। लेकिन एक ऐसा कारण भी है जिसकी वजह से मातृ मृत्यु दर में तेजी से कमी लाई जा सकती है। वह है असुरक्षित गर्भपात। उन्होंने बताया कि विश्व स्वास्थ्य संगठन (डबल्यूएचओ) के अनुसार हर साल भारत में 1.5 करोड़ से अधिक गर्भपात होते हैं।  असुरक्षित गर्भपात मातृ मृत्यु के कारणों में सबसे प्रमुख कारण है, जहां हर दिन लगभग 10 महिलाएं इसके कारण अपनी जान गवा देती है।


उत्तरप्रदेश वोलन्टरी हेल्थ एसोसिएशन की प्रतिनिधि श्वेता ने पीपीटी के माध्यम से बताया की लेसेन्ट की प्रकशित रिपोर्ट के अनुसार भारत में प्रतिवर्ष 1.56 करोड़ गर्भपात होते हैं जिसमें से 2/3 फैसिलिटी के बहार होते हैं। उत्तर प्रदेश में 49 प्रतिशत अनचाहे गर्भपात होते हैं जिसमें से 64 प्रतिशत गर्भपात के द्वारा समाप्त की जाती है। उत्तरप्रदेश में 31 लाख वार्षिक गर्भपात होते हैं जिसमें से सिर्फ 11 प्रतिशत स्वास्थ्य केंद्रों पर होते हैं। 32 प्रतिशत गर्भपात केंद्रों पर ही होते हैं। 


आईपास डेवलपमेंट फाउंडेशन की प्रोग्राम ऑफिसर ,पारुल ने बताया कि भारत में गर्भपात कराना कानूनी रूप से मान्य है।  चिकित्सीय विधि से गर्भावस्था समाप्ति का कानून 1971 में ही बन गया था। यह एक्ट 20 सप्ताह के गर्भ समापन की अनुमति देता है।इस एक्ट के अंतर्गत कुछ खास प्रकार की गर्भावस्था (गर्भवती महिला को जीवन का खतरा, गर्भवती महिलाओं के अतिरिक्त स्वास्थ्य को गंभीर क्षति, गर्भवती महिलाओं के मानसिक स्वास्थ्य को गंभीर क्षति, इस बात का पर्याप्त जोखिम की यदि बच्चा हुआ तो वह शारीरिक व मानसिक रूप से पीड़ित विकलांग हो, गर्भ निरोधक की असफलता आदि) को पंजीकृत चिकित्सक द्वारा समाप्त करने की अनुमति है। यदि गर्भावस्था को पंजीकृत चिकित्सक के अलावा किसी अन्य व्यक्ति द्वारा समाप्त किया जाता है तो यह भारतीय दण्ड संहिता के अंतर्गत दंडनीय अपराध की श्रेणी में आता है।


मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ अशोक शुक्ला ने इन सुझावों का स्वागत करते हुए कहा कि हमें परिवारों के साथ बातचीत का तरीका बदलना चाहिए। बजाय उनको यह बताने कि सरकार यह चाहती है, उनसे पूछिए कि आप क्या चाहते हैं। ज्यादा बच्चे होंगे तो आप उन्हें कहां से खिलाएंगे…कैसे पढ़ाएंगे और बच्चों की देखभाल कैसे होगी। उन्होंने कहा कि सरकार का उद्देश्य गर्भपात कराना नहीं है। हम सब की कोशिश यह होनी चाहिए कि ऐसी स्थिति ही न आए। लोग इतने जागरूक हो जाएं कि अपने हिसाब से अपने परिवार की प्लानिंग करें।


कार्यशाला में सुभाष चिल्ड्रन सोसाइटी के संस्था प्रमुख कमलकांत तिवारी, आईपास डेवलपमेंट फाउंडेशन की प्रोग्राम ऑफिसर पारुल, राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के डीपीएम, डीसीपीएम, जिला प्रतिरक्षण अधिकारी, नोडल आरबीएसके, डीएचईआईओ, स्वाथ्य केंद्रों के बीसीपीएम, चिकित्सा अधीक्षक, यूनिसेफ और उत्तर प्रदेश तकनीकी सहयोग इकाई के प्रतिनिधि व सीडीपीओ व अन्य स्वास्थ्य कर्मी मौजूद रहें।

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