कुंडली में नवम भाव में चन्द्रमा....

कुंडली में नवम भाव में चन्द्रमा....

नवम भाव भाग्य-सौभाग्य आदि का होता है।चंद्रमा कल्पना शील ग्रह है ,मन है। भाव बली और शुभ चंद्रमा के होने से जातक की मानसिक प्रवृत्ति जिस तरह के कार्य के रुझान में होती है।

उसी तरह के कार्य से भाग्य का उदय होता है यदि इस भाव में चंद्रमा बलहीन या अशुभ में बैठ जाए तब यह जातक को भाग्यहीन तक बना देता है।चंद्रमा सबसे तेज गति से भाग्य को प्रभावित करने वाला ग्रह है क्योंकि चंद्रमा की गति नवग्रहों में सबसे तेज है।

चन्द्रमा सवा दो दिन तो कभी कभी 2दिन में ही राशि परिवर्तन कर लेता तो अन्य ग्रहो को राशि परिवर्तन करने में महीनो लग जाते है।जब बली और शुभ चंद्रमा नवे भाव में कारक होकर या शुभ भावपति होकर बैठता है तब जातक का भाग्य तेज गति से उदय होता है ।

पूर्णिमा का चंद्रमा या पूर्णिमा के आसपास का चंद्रमा सबसे ज्यादा शुभ और बली होता है और अमावस्या या अमावस्या के आस पास का चन्द्र अशुभ और निर्बल होता है सामान्य भाषा में कहे तो सूर्य से जितना दूर भावो में चंद्रमा कुंडली में होगा उतना बली और शुभ होगा और सूर्य के जितना नजदीक होगा।

उतना अशुभ और निर्बल होता जायेगा चाहे यह अपनी उच्च राशि या स्वराशि में ही क्यों न हो?कुंडली में कई सारे शुभ योग जैसे सुनफा योग, अनफा योग, गजकेसरी योग, लक्ष्मी योग आदि योग यह सब चंद्रमा सहित अन्य ग्रहो के योग से बनते है जब नवे भाव में चंद्रमा बैठता है तब इन योगो के बनने से विशेष शुभ फल और राजयोग की प्राप्ति भाग्य के बल से होती है। नवे भाव में जितने ज्यादा शुभ योग चंद्रमा के सहयोग से बनते है।

जातक का भाग्य उतना ज्यादा ही प्रभावशाली और शुभ फल देने वाला बन जाता है।नवे भाव का चंद्रमा यात्राओं के अवसर बहुत ज्यादा देता है।

जिन जातको का चन्द्रमा अशुभ स्थिति में हो उन्हें शिव उपासना, पूर्णिमा व्रत करने से चन्द्रमा के शुभ फलो में वृद्धि की जा सकती है।चंद्रमा योगकारक या शुभ भाव पति होकर नवे भाव में बैठे तो इसका रत्न मोती धारण करने से भी चंद्र को बल दिया जा सकता है।

ज्योतिष शास्त्र में चन्द्रमा को मन कहा गया है। और फिर मन चंगा तो कठौती में गंगा । इति शुभम्

पंडित अम्बरीष चन्द्र मिश्रा अयोध्या

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