ऊदल......

ऊदल......

ऊदल भविष्य नामक महाकल्पके वैवस्वत मन्वन्तर के अट्ठाईसवें द्वापर युग के अंत में कुरुक्षेत्र का प्रसिद्ध महायुद्ध हुआ। जिसमें युद्ध कर दुरभिमानी सभी कौरवों और पाण्डवों के अठारहवें दिन पूर्ण विजय प्राप्त की।

अन्तिम दिन भगवान श्रीकृष्ण ने के कालकी दुर्गतिको जानकर योगरूपी सनातन शिवजीकी मनसे इस प्रकार स्तुति की और उन से पाण्डवों की रक्षा का निवेदन किया ।

स्तुतिको सुनकर भगवान शंकर नंदी पर आरूढ़ हो हाथमें त्रिशूल लिये पांडवों के शिविर की रक्षाके लिये आ गये। उस समय महाराज युधिष्ठिर की आज्ञासे भगवान् श्रीकृष्ण हस्तिनापुर गये थे और पाण्डव सरस्वती के किनारे रहते थे। मध्यरात्रिमें अश्वत्थामा, भोज (कृतवर्मा) और कृपाचार्य-ये तीनों पाण्डव-शिविरके पास आये और उन्होंने मनसे भगवान् रुद्र की स्तुति कर उन्हें प्रसन्न कर लिया।

इसपर भगवान् शंकरने उन्हें पांडव-शिविर में प्रवेश करनेकी आज्ञा दे दी ।अश्वत्थामा ने भगवान शंकर द्वारा प्राप्त तलवार से धृष्टद्युम्न आदि वीरोंकी हत्या कर दी, फिर वह कृपाचार्य और कृतवर्मा के साथ वापस चला गया।

वहाँ एकमात्र पार्षद सूत ही बचा रहा, उसने इस घटना की सूचना पांडवों को दी । पांडवों ने इसे शिवजी का ही कृत्य समझा और क्रुद्ध हो अपने आयुधोंसे देवाधिदेव पिनाकीसे युद्ध करने लगे। भीम आदि द्वारा प्रयुक्त अस्त्र-शस्त्र शिव जी के शरीर में समाहित हो गये।

इस पर भगवान शिव ने कहा कि- " तुम श्रीकृष्ण के उपासक हो अत: हमारे द्वारा तुमलोग रक्षित हो, अन्यथा तुमलोग वधके योग्य थे। इस अपराध के फल तुम्हें कलयुग में जन्म लेकर भोगना पड़ेगा।" ऐसा कहकर वे अदृश्य हो गये और पाण्डव बहुत दुःखी हुए। वे अपराध से मुक्त होनेके लिये भगवान श्रीकृष्ण की शरण में आये।

नि:शस्त्र पांडवों ने श्रीकृष्ण के साथ एकाग्र मन से शंकर जी की स्तुति की जिससे भगवान् शंकरने प्रत्यक्ष प्रकट होकर उनसे वर माँगनेको कहा। भगवान श्री कृष्ण बोले- "देव ! पाण्डवों के -जो शस्त्रास्त्र आपके शरीरमें लीन हो गये हैं,

उन्हें पांडवों को वापस कर दीजिये और इन्हें शापसेभी मुक्त कर दीजिये।" श्री शिवजी ने कहा- श्रीकृष्णचन्द्र ! मैं आपकी माया से मोहित हो गया था और मैंने यह शाप दे दिया। मेरा वचन तो मिथ्या नहीं होगा तथापि यह पांडव तथा कौरव नाम से अपने अंशों से कलयुग में उत्पन्न होकर अपने पापों का फल भोगकर मुक्त हो जाएँगे।" वे बताते है कि युधिष्ठिर वत्सराज के पुत्र होगा, उसका नाम मलखान होगा, वह शिरीष नगरका अधिपति होगा। भीम का नाम वीरण होगा और वह वनरसक राजा होगा।

अर्जुन के अंश से जो जन्म लेगा, वह महान बुद्धिमान और मेरा भक्त होगा, उसका जन्म परिमलके यहाँ होगा और नाम ब्रह्मानन्द होंगा। महाबलशाली नकुल का जन्म कान्यकुब्जमें रत्नभानु के पुत्र लक्षण के रुप में होगा ।

सहदेव भीम सिंह का पुत्र देवसिंह, धृतराष्ट्र के अंश से अजमेर में पृथ्वीराज जन्म लेगा और द्रौपदी पृथ्वीराज की कन्याके रूपमें वेला नाम से प्रसिद्ध होगी। महादानी कर्ण तारक नाम से जन्म लेगा । उस समय रक्तबीज के रूप में पृथ्वी पर मेरा भी अवतार होगा। कौरव माया युद्ध में निष्णात होंगे तथा पाण्डु-पक्षके योद्धा धार्मिक और बलशाली होंगे।

यह सब बातें सुनकर श्रीकृष्ण मुस्कराये और उन्होंने कहा 'मैं भी अपनी शक्ति-विशेषसे अवतार लेकर पांडवों की सहायता करूँगा। मायादेवी द्वारा निर्मित मायावती नाम की पुरी में देशराज के पुत्र-रूप में मेरा अंश उत्पन्न होगा, जो उदयसिंह (ऊदल) कहलायेगा । मेरे वैकुण्ठधामका अंश आह्लाद नाम से जन्म लेगा, वह मेरा गुरु होगा। अग्निवंश से उत्पन्न राजाओंका विनाश कर मैं (श्रीकृष्ण- उदयसिंह) धर्म की स्थापना करूँगा।'

( भविष्यपुराण, प्रतिसर्गपर्व,तृतीय खंड)

Anand Vedanti Tripathi

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