लैंगिक भिन्नता की भावना भी है रेप की बढ़ती कुवृत्ति का एक प्रमुख कारण

 लैंगिक भिन्नता की भावना भी है रेप की बढ़ती कुवृत्ति का एक प्रमुख कारण

डॉ.दीपकुमार शुक्ल (स्वतन्त्र पत्रकार)

समाज के बदलते परिवेश में आज जब महिलाएं बड़ी-बड़ी उपलब्धियाँ प्राप्त करके अपनी योग्यता और क्षमता का लोहा मनवा रही हैं। अनेक जटिलतम प्रतिस्पर्धाओं में वे पुरुषों को मीलों पीछे छोड़कर अपना मुकाम बना रही हैं। देश दुनियां के विभिन्न क्षेत्रों में नित नये कीर्तिमान स्थापित कर रही हैं। फिर भी उनका स्त्री होना आज तक अभिशाप जैसा बना हुआ है।

घर से लेकर सड़क तक असुरक्षा का साया बराबर उनका पीछा करता रहता है। कब, कहाँ और किस युवती या मासूम बच्ची के साथ दरिन्दगी हो जाए, इसका अनुमान कोई नहीं लगा सकता है। हैदराबाद की पशु चिकित्सक के साथ हुई दरिन्दगी ने हैवानियत के एक और चेहरे को पटल पर लाकर प्रस्तुत कर दिया है। आए दिन कहीं न कहीं कोई न कोई स्त्री, स्वयं के स्त्री होने का मूल्य अपनी अस्मिता, प्राण या फिर दोनों ही देकर चुकाती है। 

मानव सभ्यता का इतिहास जितना पुराना है कमोवेश स्त्रियों के साथ होने वाला अन्याय और अमानवीय कृत्यों का इतिहास भी उतना ही पुराना है। मुगलों तथा अंग्रेजों के समय तो स्त्रियों की अस्मिता और भावना लगभग हर रोज तार-तार होती थी। आजादी के बाद जब सब कुछ बदल रहा था

तब स्त्रियों की स्थिति में भी बहुत बड़े बदलाव की परिकल्पना की गई थी। हर क्षेत्र में महिलाओं को अवसर दिए गए। जिसका स्त्रियों ने न केवल लाभ लिया बल्कि पुरुष प्रधान समाज को यह दिखा भी दिया कि वह पुरुषों से किसी भी मामले में कम नहीं हैं। लेकिन पुरुषों का एक बड़ा वर्ग आज भी नारी को दोयम दर्जे की हैसियत देते हुए उसे अपनी दासी तथा भोग की वस्तु समझता है।

ही कारण है कि लाख प्रयासों के बावजूद भी स्त्रियों पर होने वाले विभिन्न प्रकार के अत्याचार रुकने की अपेक्षा दिन प्रतिदिन बढ़ते ही जा रहे हैं। इधर कुछ दशकों से बलात्कार के साथ-साथ अमानवीयता की सारी हदें पार करते हुए जिस तरह से पीड़िताओं की निर्दयतापूर्वक हत्याएं हो रही हैं, वह स्त्रियों के प्रति पुरुषों की अति विकृत मानसिकता को निरुपित करता है। 

सात वर्ष पूर्व दिल दहला देने वाले दिल्ली के निर्भया काण्ड के बाद भारतीय संसद द्वारा बलात्कारियों के लिए सख्त कानून बनाया गया था। तब ऐसा लगा था कि अब शायद ऐसी घटनाओं की पुनातावृत्ति न हो। लेकिन उसके बाद भी मुम्बई काण्ड, कठुआ काण्ड, राजस्थान का भंवरी देवी काण्ड, उ.प्र. का उन्नाव काण्ड और अब हैदराबाद जैसा जघन्य काण्ड हो गया।

इसका अर्थ है कि आधुनिकता की अन्धी दौड़ में शामिल पुरुषों की एक बड़ी आबादी के अन्दर नारी को भोग की वस्तु समझने की कुवृत्ति इस कदर हावी है कि उन्हें न तो कानून का भय रह गया है और न ही अपने परिवार तथा समाज का। निर्भया काण्ड के बाद बीते सात वर्षों में देश में दो लाख से भी अधिक बलात्कार की घटनाएँ घट चुकी हैं।

एक आंकड़े के मुताबिक देश में प्रत्येक वर्ष लगभग 40 हजार, प्रतिदिन लगभग 109 तथा हर घंटे में लगभग 5 लड़कियों के साथ बलात्कार जैसा घृणित और अमानवीय अपराध होता है। पिछले 10 वर्षों के दौरान पूरे देश में लगभग 2 लाख 89 हजार बलात्कार के मामले दर्ज हुए हैं। जिनमें से 25 प्रतिशत के आसपास मामले नाबालिग बच्चियों के साथ हुई हैवानियत के हैं।

प्रतिवर्ष लगभग 2000 अपराध सामूहिक बलात्कार के होते हैं। राह चलते छेड़छाड़ और छीटाकशी की घटनाओं की तो कोई गिनती ही नहीं है। देश के 50 से अधिक जनप्रतिनिधियों के ऊपर महिलाओं के साथ अपराध के मामले विचाराधीन हैं। चार जनप्रतिनिधियों पर तो सीधे-सीधे बलात्कार के ही मुकदमें चल रहे हैं। 

राष्ट्रिय अपराध रिकार्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) द्वारा 21 अक्टूबर 2019 को जारी किये गए तीन वर्ष के आंकड़ों के मुताबिक 2017 में महिलाओं के विरुद्ध हुए अपराध के 3 लाख 59 हजार 849 मामले देश भर में दर्ज किए गए। जो कि 2016 से 6 प्रतिशत अधिक हैं। इन अपराधों में महिलाओं की हत्या, बलात्कार, दहेज हत्या, आत्महत्या के लिए प्रेरित करना, एसिड अटैक, महिलाओं के साथ क्रूरता, घरेलू हिंसा तथा अपहरण के मामले शामिल हैं। वर्ष 2016 में 3 लाख 38 हजार 954 महिलाओं के साथ हुए आपराधिक मामले दर्ज किये गए थे।

जबकि 2015 में इन अपराधों की संख्या 3 लाख 29 हजार 243 थी। इन आंकड़ों के मुताबिक महिलाओं पर हो रहे अत्यचार के मामले निरन्तर बढ़ते ही जा रहे हैं। जिन्हें रोकने के अब तक के सभी प्रयास विफल ही दिखाई दे रहे हैं। 

हैदराबाद काण्ड तथा ऐसे अन्य सभी अपराध के दोषियों ने क्या निर्भया काण्ड के बारे में कुछ भी नहीं सुना या जाना होगा? एक समय जब पूरा देश उन दोषियों के विरुद्ध एकजुट दिखाई दे रहा था। तब इनकी मनःस्थिति क्या रही होगी? क्या तब ये लोग भी उस भीड़ का हिस्सा थे जो बलात्कारियों को सरे आम फांसी देने की मांग कर रही थी। या फिर ये लोग उन दरिन्दों के कुकृत्य को सुकृत्य मानकर उनके बचाव की दुआ कर रहे थे।

निर्भया काण्ड के बाद संसद द्वारा पारित सख्त कानून तथा दोषियों को सुनाई गई फांसी की सजा की जानकारी क्या इनको नहीं थी? अथवा ये लोग इस सबसे अंजान किसी और ही दुनियां में खोये हुए थे। तब फिर इनके अन्दर इस तरह की हैवानियत का बीजारोपण आखिर कब और कैसे हुआ? यह भी दावे के साथ नहीं कहा जा सकता है कि यह उनका पहला कृत्य होगा। क्योंकि जिस तरह से सुनियोजित ढंग से यह वारदात हुई है, उससे स्वतः अन्दाजा लग जाता है कि इस तरह का यह उनका पहला अपराध नहीं था। 

हाल ही में एक टी.वी. चैनल ने देर रात दिल्ली की अलग-अलग सुनसान सड़कों पर अपनी महिला रिपोर्टर को गुप्त कैमरे की निगरानी में अकेले खड़ा करके वहां से निकलने वाले लोगों की प्रतिक्रिया जानने का प्रयास किया। उनमें से किसी भी रिपोर्टर के साथ किसी ने जबरदस्ती करने की कोशिश तो नहीं की,

परन्तु अनेक पुरुषों ने उन्हें कालगर्ल समझकर अपने साथ चलने का निमन्त्रण अवश्य दिया। इससे यह सिद्ध होता है कि समाज में पुरुषों का एक बहुत बड़ा वर्ग ऐसा है जो स्त्रियों की अस्मिता का सौदा वस्तु की तरह बेधड़क होकर करता है। हालाकि इसके लिए महानगरों में तेजी से फल फूल रहा वेश्यावृत्ति का धन्धा ही सबसे अधिक जिम्मेदार है। लेकिन यह धन्धा इसलिए फल फूल पा रहा है। क्योंकि आदर्श और संस्कार की श्वेत चादर ओढ़े अनेक गणमान्य नागरिक इस धन्धे के ग्राहक बनकर घूम रहे हैं।

ऐसे लोगों की दृष्टि में स्त्री केवल एक भोग की वस्तु ही है। महिला पत्रकार को अपने साथ चलने का निमन्त्रण देने वाले लोग प्रथम दृष्टया पढ़े-लिखे और साधन सम्पन्न लग रहे थे। इससे यह भी सिद्ध होता है कि पुरुषों का उच्च शिक्षित होना भी स्त्रियों के प्रति उनका दृष्टिकोण बदलने में सहायक नहीं है। तब फिर अल्प शिक्षित या अशिक्षित लोगों से नारी के सम्मान की अपेक्षा भला कैसे की जा सकती है? सख्त कानून बनाकर लोगों की सोच बदलने का सरकारी प्रयोग पूर्णतया असफल सिद्ध हो रहा है।

आशाराम, राम रहीम, नित्यानन्द और चिन्मयानन्द जैसे अनेक धर्माचार्यों पर लगे बलात्कार के आरोपों से भी स्त्रियों के प्रति समाज के दृष्टिकोण का बहुत हद तक अनुमान लगाया जा सकता है। ऐसे लोग बड़े-बड़े मंचों से प्रबचन देकर समाज का मार्गदर्शन करने का दावा करते हैं।

चिल्ला-चिल्लाकर लोगों का आह्वान करते हैं कि संसार की प्रत्येक स्त्री को माता की तरह सम्मान देना चाहिए। लेकिन स्वयं नारियों के प्रति किस तरह का भाव रखते हैं, यह सभी को पता है। जिन नेताओं के कन्धों पर देश को आगे ले जाने की जिम्मदारी है,

उनमें से भी अधिकांश नारियों के प्रति कलुषित मानसिकता के शिकार हैं। देवियों को पूजने वाले देश में बेटियों के साथ भेदभाव तथा अत्याचार का सिलसिला आखिर कब तक बन्द होगा?

डॉ.दीपकुमार शुक्ल (स्वतन्त्र टिप्पणीकार)
125/5ए, योगेन्द्र विहार, खाड़ेपुर, नौबस्ता, कानपूर - 208021
 मो. 9450329314 

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